न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा का इस्तीफा
दिल्ली स्थित अपने आधिकारिक आवास से जले हुए नोटों की कथित बरामदगी से जुड़े विवाद में फंसे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दिया है।
पृष्ठभूमि
- न्यायमूर्ति वर्मा की अंतिम तैनाती इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हुई थी।
- 9 अप्रैल को लिखे अपने इस्तीफे पत्र में उन्होंने अपने इस फैसले पर गहरी पीड़ा व्यक्त की।
- लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पिछले वर्ष न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था।
आरोप और कार्यवाही
- न्यायमूर्ति वर्मा ने चल रही महाभियोग कार्यवाही से अपना नाम वापस ले लिया है।
- न्यायाधीश जांच समिति को लिखे 13 पन्नों के पत्र में उन्होंने बुनियादी निष्पक्षता और उचित प्रक्रिया से वंचित किए जाने का दावा किया।
- उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी आधारभूत मामले के सबूत का भार उलट दिया गया है।
- उन्होंने कार्यवाही की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें केवल भंडारगृह और नकदी की मौजूदगी पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिससे उनकी संलिप्तता के अनुमान लगाए जा रहे हैं।
- वह गवाहों की जांच के दौरान उपस्थित नहीं था और न ही उसे उनसे जिरह करने की अनुमति दी गई थी।
- 54 गवाहों में से 27 को बिना किसी स्पष्टीकरण के हटा दिया गया।
इस्तीफे की ओर ले जाने वाली घटनाएं
- पिछले साल 14 मार्च को हुई आग की घटना के दौरान दमकलकर्मियों को कथित तौर पर उनके आवास से नकदी मिली थी।
- इसके बाद नकदी के बंडलों को जलाते हुए दिखाने वाला एक वीडियो सामने आया।
- तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने आंतरिक जांच शुरू की।
न्यायपालिका द्वारा की गई कार्रवाई
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की तीन सदस्यीय समिति ने 4 मई की रिपोर्ट में न्यायमूर्ति वर्मा को दोषी ठहराया।
- मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने न्यायमूर्ति वर्मा को इस्तीफा देने या महाभियोग का सामना करने के लिए कहा।
- उनके इस्तीफे से इनकार करने के कारण रिपोर्ट और उनके जवाब को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पद से हटाने की कार्यवाही के लिए भेज दिया गया।
- उन्हें इलाहाबाद स्थित उनके मूल उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया और आगे की कार्रवाई लंबित रहने तक न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया।