निर्यात संवर्धन मिशन के तहत ऋण से संबद्ध (Credit-linked) दो उप-योजनाएं शुरू की गईं | Current Affairs | Vision IAS
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In Summary

  • निर्यात प्रोत्साहन मिशन (ईपीएम) : 25,060 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ 6 वर्षों (वित्त वर्ष 2025-26 से 2030-31) के लिए शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए किफायती व्यापार वित्त और गैर-वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
  • निर्यात प्रोत्साहन घटक : इसमें रुपये के निर्यात ऋण पर 2.75% की ब्याज सब्सिडी और संपार्श्विक सहायता (सूक्ष्म/लघु निर्यातकों के लिए 85%, मध्यम निर्यातकों के लिए 65%) 10 करोड़ रुपये तक शामिल है, जिसमें वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 50 लाख रुपये की वार्षिक सीमा निर्धारित है।
  • ईपीएम का महत्व : इसका उद्देश्य निर्यात लागत को कम करके, वित्त तक पहुंच का विस्तार करके, भारत के निर्यात ब्रांड को मजबूत करके, बाजारों में विविधता लाकर और श्रम-प्रधान उद्योगों और पहली बार निर्यात करने वालों को समर्थन देकर रोजगार सृजन को बढ़ावा देकर वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है।

In Summary

ये पायलट उप-योजनाएं ‘निर्यात संवर्धन मिशन (Export Promotion Mission)’ के  निर्यात प्रोत्साहन घटक का हिस्सा हैं। 

नई उप-योजनाओं के बारे में

  • प्री- और पोस्ट-शिपमेंट निर्यात ऋण पर ब्याज सहायता:
    • भारतीय रुपये में लिए गए निर्यात ऋण पर 2.75% (आधार दर) की ब्याज सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
    • अधिसूचित कम-प्रतिनिधित्व वाले या उभरते बाजारों में निर्यात के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन
    • वार्षिक सीमा: प्रत्येक निर्यातक वित्त वर्ष 2025–26 के लिए 50 लाख रुपये की अधिकतम सहायता ले सकता है।
    • पात्रता: हार्मोनाइज़्ड सिस्टम (HS) 6-अंकीय स्तर पर अधिसूचित सकारात्मक सूची के अंतर्गत आने वाली टैरिफ लाइनें तक सीमित। यह सूची भारत की लगभग 75% टैरिफ लाइनों (मदों) को शामिल करती है। 
  • निर्यात ऋण के लिए संपार्श्विक (कोलेटरल) सहायता:
    • यह योजना सूक्ष्म एवं लघु उद्यम क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट (CGTMSE) के साथ साझेदारी में लागू की जाएगी।
    • गारंटी कवरेज:
      • सूक्ष्म और लघु निर्यातकों के लिए 85% तक।
      • मध्यम श्रेणी के निर्यातकों के लिए 65% तक।
      • अधिकतम सीमा: प्रति वित्तीय वर्ष प्रति निर्यातक 10 करोड़ रुपये तक की बकाया गारंटीकृत ऋण राशि।
    • पात्रता: प्रथम (ऊपर उल्लिखित) उप-योजना की शर्तों के अनुसार। 

निर्यात संवर्धन मिशन (EPM) के बारे में

  • शुरुआत: नवंबर 2025 में6 वर्षों के लिए (वित्त वर्ष 2025–26 से 2030–31 तक)।
  • वित्तीय परिव्यय: 25,060 करोड़ रुपये।
  • उद्देश्य: विशेष रूप से MSME, श्रम-प्रधान क्षेत्रकों (जैसे वस्त्र क्षेत्रक) आदि को कम ब्याज दर पर व्यापार हेतु ऋण उपलब्ध कराना
  • मिशन की संरचना: दो अलग-अलग, किंतु परस्पर एकीकृत घटक:
    • निर्यात प्रोत्साहन (वित्तीय सहायता): ब्याज सब्सिडी, संपार्श्विक (कोलेटरल) गारंटी, और ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए क्रेडिट कार्ड जैसे साधनों के माध्यम से।
  • निर्यात दिशा (गैर-वित्तीय सहायता): इसके तहत निर्यात गुणवत्ता सुनिश्चित करने, नियमों का अनुपालन करने, अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और लॉजिस्टिक्स के लिए सहायता दी जाएगी।  

निर्यात संवर्धन मिशन (EPM) का महत्व

  • यह मिशन भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाने में निम्नलिखित प्रकार से सहायता करेगा:
    • निर्यात की लागत कम करेगा और ऋण उपलब्धता बढ़ाएगा।
    • नियमों या मानकों का अनुपालन, प्रमाणन और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग में सहायता करके भारत के निर्यात ब्रांड को मजबूत करेगा तथा निर्यात के लिए अधिक बाजार उपलब्ध कराएगा।
    • श्रम-प्रधान उद्योगों और पहली बार निर्यात करने वालों को सहायता प्रदान करके रोजगार सृजन को बढ़ावा देगा।
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MSME

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (Micro, Small and Medium Enterprises) भारतीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। निर्यात संवर्धन में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण है, और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भाग लेने और प्रक्रियाओं को समझने में सहायता की आवश्यकता होती है।

निर्यात दिशा (गैर-वित्तीय सहायता)

निर्यात संवर्धन मिशन (EPM) का वह भाग जो निर्यातकों को गैर-वित्तीय सहायता प्रदान करता है, जैसे कि निर्यात गुणवत्ता सुनिश्चित करना, नियमों का अनुपालन, अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग और लॉजिस्टिक्स में सहायता।

संपार्श्विक (कोलेटरल) सहायता

यह योजना निर्यातकों के लिए ऋण की गारंटी प्रदान करती है, जिससे वित्तीय संस्थानों से ऋण प्राप्त करना आसान हो जाता है। सूक्ष्म और लघु निर्यातकों के लिए 85% तक की गारंटी कवरेज प्रदान की जाती है।

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