विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक और 2026 में बाजार की गतिशीलता
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने 2026 में भारतीय इक्विटी बाजार में मिश्रित गतिविधि दिखाई है। हालांकि हाल ही में वे शुद्ध खरीदार बन गए हैं, लेकिन उनका संचयी बहिर्वाह काफी महत्वपूर्ण रहा है।
प्रमुख रुझान और आँकड़े
- FPI को 2026 में लगभग ₹1.68 ट्रिलियन की शुद्ध बिकवाली का सामना करना पड़ा है।
- मार्च महीने में भारी बिकवाली देखने को मिली, जिसमें FPI ने मुख्य रूप से पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के कारण तेल की कीमतों में उछाल के चलते ₹1.1 ट्रिलियन मूल्य के भारतीय शेयरों की बिक्री की।
भू-राजनीतिक संघर्ष और आर्थिक प्रभाव
- अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने ऊर्जा बाजारों को बाधित कर दिया, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और गैस के प्रवाह पर असर पड़ा।
- संघर्ष के बाद से ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 22% से अधिक की वृद्धि हुई है और यह लगभग 90.1 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है।
- तेल की बढ़ती कीमतें भारत की अर्थव्यवस्था को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रही हैं, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है और मुद्रास्फीति में वृद्धि हो रही है।
बाजार की प्रतिक्रियाएँ
- 2026 में सेंसेक्स में 7.9% और निफ्टी में 6.8% की गिरावट दर्ज की गई।
- BSE में सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 10.1 ट्रिलियन रुपये घटकर 465.7 ट्रिलियन रुपये रह गया।
- इस वर्ष भारतीय रुपया 3.5% कमजोर हुआ, जिसके परिणामस्वरूप विदेशी निवेशकों के लिए रिटर्न में कमी आई।
मूल्यांकन और भविष्य की संभावनाएं
- भारत के उच्च बाजार मूल्यांकन को मजबूत आय वृद्धि से समर्थन मिला, लेकिन तेल की बढ़ती कीमतें और आयात पर निर्भरता इस प्रीमियम को चुनौती दे रही हैं।
- FPI के बहिर्वाह को पलटने के लिए चल रहे संघर्ष का समाधान और ऊर्जा की कीमतों में स्थिरता आना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- मुद्रा के अवमूल्यन ने रुपये में संरचनात्मक स्थिरता की महत्वपूर्ण आवश्यकता को उजागर किया है।
संक्षेप में, भू-राजनीतिक तनावों का समाधान और तेल की कीमतों का स्थिरीकरण FPI प्रवाह में तेजी लाने, रुपये को स्थिर करने और भारत के बाजार मूल्यांकन प्रीमियम को उचित ठहराने के लिए महत्वपूर्ण हैं।