भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (CPI) 2025 में भारत की रैंक 182 देशों और क्षेत्रों में से 96वें से सुधरकर 91वें स्थान पर पहुंच गई है (39 के स्कोर के साथ)।

भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक के बारे में
- जारीकर्ता: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल।
- कार्यप्रणाली: यह सूचकांक 180 देशों और क्षेत्रों को उनके सार्वजनिक क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के स्तर के आधार पर रैंक करता है। यह रैंकिंग 0 (अत्यधिक भ्रष्ट) से 100 (बेहद साफ) के पैमाने पर दी जाती है।
- यह एक मिश्रित सूचकांक है। यह प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा एकत्र किए गए कम-से-कम 3 और अधिकतम 13 सर्वेक्षणों और भ्रष्टाचार के आकलनों का मिश्रण है।
- CPI में क्या शामिल नहीं है: नागरिकों की भ्रष्टाचार पर सीधी धारणा या अनुभव; टैक्स धोखाधड़ी; अवैध वित्तीय प्रवाह; भ्रष्टाचार के एनेब्लर्स (वकील, लेखाकार, वित्तीय सलाहकार आदि); मनी लॉन्ड्रिंग; निजी क्षेत्र का भ्रष्टाचार; अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और बाजार।
- CPI 2025 की मुख्य विशेषताएं
- शीर्ष स्थान: डेनमार्क (स्कोर 89) लगातार आठवीं बार पहले स्थान पर रहा।
- सबसे निचली रैंक: अधिकतर संघर्ष-प्रभावित और अत्यधिक दमनकारी देश सबसे कम स्कोर करने वालों में शामिल हैं। इनमें वेनेजुएला (स्कोर 10) और सोमालिया तथा दक्षिण सूडान (दोनों का स्कोर 9) शामिल हैं।
- भ्रष्टाचार के मुख्य कारक: लोकतांत्रिक नियंत्रण और संतुलन की कमी या उनका कमजोर होना; न्याय प्रणालियों का राजनीतिकरण; राजनीतिक प्रक्रियाओं पर अनुचित प्रभाव; और नागरिक क्षेत्र की सुरक्षा करने में विफलता।
Article Sources
1 sourceहालिया दिनों में, पर्यावरण संरक्षण में व्यवस्थित रूप से "कमी" देखी गई है। इसके कुछ उदाहरण हैं; प्रगतिशील न्यायिक निर्णयों को वापस लेना और संरक्षित क्षेत्रों (जैसे अरावली पहाड़ियों) के लिए संकुचित परिभाषाओं को अपनाना है।
पर्यावरण विनियमन का व्यवस्थित क्षरण
- EIA प्रक्रिया का कमजोर होना: 18 दिसंबर, 2025 से, गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए, पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) से पहले भूमि अधिग्रहण किया जा सकता है। इसके अलावा, अवस्थिति और क्षेत्र के विशिष्ट विवरणों के बिना भी EIA संपन्न किए जा सकते हैं।
- न्यायिक निर्णयों की वापसी: वनशक्ति बनाम भारत संघ (2025) के फैसले को वापस लेने से 'पूर्वप्रभावी मंजूरी' (retrospective clearances) पर लगा प्रतिबंध कमजोर हो गया है। यह पर्यावरण-समर्थक न्यायशास्त्र से पीछे हटने का संकेत है।
- अरावली पहाड़ियों से संबंधित विवाद: न्यायालय ने 100 मीटर की ऊंचाई-आधारित परिभाषा को स्वीकार किया। इससे कई महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र संरक्षण के दायरे से बाहर हो गए। यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है और अनुच्छेद 48A को कमजोर करता है।
- अनुच्छेद 21: प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण का संरक्षण व संवर्धन संबंधी राज्य का कर्तव्य।
- मैंग्रोव और तटीय पारिस्थितिकी: मैंग्रोव के विनाश के लिए न्यायिक स्वीकृति (जैसे- अडाणी सीमेंटेशन लिमिटेड के लिए रायगढ़, महाराष्ट्र में) 'प्रतिपूरक वनीकरण' (compensatory afforestation) पर निर्भरता दर्शाती है। यह पारिस्थितिकी विज्ञान की अनदेखी करता है।
- सामरिक रक्षा बनाम पारिस्थितिकी: न्यायालय ने क्षेत्र के पारिस्थितिक महत्त्व को स्वीकार करने के बावजूद सामरिक रक्षा आवश्यकताओं के आधार पर सड़कों को चौड़ा करने की अनुमति दी (सिटीजन्स फॉर ग्रीन दून बनाम भारत संघ, 2021 वाद)।
- इस "संतुलनकारी कार्य" को उत्तराखंड में आने वाली आकस्मिक बाढ़ और पारिस्थितिकी गड़बड़ी से जोड़कर देखा गया है।
संवैधानिक और न्यायिक निहितार्थ
- जोखिम में संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 14 (गैर-मनमानेपन और कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत), अनुच्छेद 21 (स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार), तथा अनुच्छेद 51A(g) (पर्यावरण की रक्षा करना नागरिकों का मौलिक कर्तव्य)।
- 'सार्वजनिक न्यास सिद्धांत' का क्षरण: यह सिद्धांत एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ वाद (1996) में स्थापित किया गया था। यह स्पष्ट करता है कि प्राकृतिक संसाधन जनता के विश्वास में राज्य के पास अमानत हैं और इन्हें निजी दोहन के लिए नहीं बेचा जा सकता।
- वर्तमान में पर्यावरण क्षरण को मंजूरी देने वाले न्यायिक रुझान इस बुनियादी न्यायशास्त्र के विपरीत प्रतीत होते हैं।
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1 sourceकुल केंद्रीय बजट में जेंडर बजट की हिस्सेदारी बढ़कर 9.37% हो गई है। इस वर्ष कुल 53 मंत्रालयों/विभागों और पांच संघ राज्यक्षेत्रों ने आवंटन की रिपोर्ट दी है।
भारत में जेंडर बजट
- अर्थ: यह एक ऐसी प्रणाली है, जो यह सुनिश्चित करती है कि लैंगिक समानता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धताएँ वास्तविक बजटीय आवंटन में परिवर्तित हों।
- इसका उद्देश्य जेंडर संबंधी चिंताओं के लिए अलग विशेषीकृत बजट बनाना नहीं है, बल्कि सरकारी बजट को 'लैंगिक संवेदनशील दृष्टिकोण' से देखना है।
- भारत में अपनाना: भारत ने औपचारिक रूप से 2004-05 में जेंडर बजट को अपनाया था।
- भारत ने इसे राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर लागू किया है। इसके लिए विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों में जेंडर बजट प्रकोष्ठ स्थापित किए गए हैं।
- जेंडर बजटिंग योजना: यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MWCD) की 'मिशन शक्ति' योजना की 'सामर्थ्य' उप-योजना के अंतर्गत आती है।
- इसका लक्ष्य सभी केंद्रीय और राज्य मंत्रालयों/ विभागों, ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय निकायों में 100% जेंडर बजट कवरेज सुनिश्चित करना है।
- ओडिशा और कर्नाटक जैसे राज्यों ने भी जेंडर बजटिंग को अपनाया है।
- जेंडर बजट के भाग:
- भाग A: वे योजनाएं, जिनमें महिलाओं के लिए 100% प्रावधान हैं।
- भाग B: वे योजनाएं, जहां महिलाओं के लिए आवंटन कम-से-कम 30% है।
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1 sourceहाल ही में, विपक्ष ने लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ पद से हटाने से संबंधित संकल्प प्रस्तुत किया।

लोकसभा में विरोध-प्रदर्शन के कारण राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of Thanks) प्रधान मंत्री के जवाब के बिना पारित हो गया।
धन्यवाद प्रस्ताव के बारे में
- संविधान के अनुच्छेद 87(1) के अनुसार राष्ट्रपति:
- लोकसभा के प्रत्येक आम चुनाव के बाद पहले सत्र के प्रारंभ में तथा प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र के प्रारंभ में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में अभिभाषण करेगा।
- संसद को उसके सत्र आहूत किए जाने के कारणों की जानकारी देगा।
- लोकसभा की कार्यप्रणाली एवं कार्य संचालन नियमावली के नियम 17 के तहत राष्ट्रपति के अभिभाषण में उल्लिखित विषयों पर धन्यवाद प्रस्ताव के माध्यम से चर्चा की जाती है। धन्यवाद प्रस्ताव एक सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है और दूसरे सदस्य द्वारा अनुमोदित किया जाता है।
- संशोधन की अनुमति: विपक्षी सदस्य ऐसे संशोधन प्रस्तावित कर सकते हैं, जिनमें यह व्यक्त किया जाए कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को शामिल नहीं किया गया या उन्हें अपर्याप्त रूप से प्रस्तुत किया गया है।
हाल ही में राज्यसभा के एक सांसद ने भारत के संसदीय लोकतंत्र में 'वापस बुलाने का अधिकार' यानी राइट टू रिकॉल पेश करने का विचार रखा है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने को स्वीकृति दी है।
संविधान के अनुच्छेद 3 के बारे में
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 संसद को निम्नलिखित शक्तियां प्रदान करता है:
- नए राज्यों का निर्माण करना,
- वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों को बढ़ाना या घटाना,
- वर्तमान राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करना,
- किसी राज्य के नाम में परिवर्तन करना।
- प्रक्रिया:
- राष्ट्रपति की अनुशंसा: इस प्रकार का विधेयक प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व-अनुशंसा आवश्यक होती है।
- राज्य विधानमंडल का मत: राष्ट्रपति संबंधित राज्य के विधानमंडल से निर्धारित समय-सीमा के भीतर अपना मत देने के लिए संदर्भित करते हैं।
- राष्ट्रपति (या संसद) राज्य विधानमंडल की राय मानने के लिए बाध्य नहीं होते।
- संसद में पारित होना: राज्य का नाम बदलने हेतु विधेयक साधारण बहुमत से संसद में पारित किया जाता है।
- नाम परिवर्तन के लिए अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं होती है।