दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों को अयोग्य ठहराने में देरी के लिए उच्चतम न्यायालय ने तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को आगाह किया | Current Affairs | Vision IAS
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सुप्रीम कोर्ट ने दसवीं अनुसूची के तहत विधायकों की अयोग्यता में देरी के लिए तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष की आलोचना की और ज़ोर देकर कहा कि अध्यक्ष एक न्यायाधिकरण की तरह काम करते हैं और उन्हें कोई संवैधानिक छूट नहीं है। इस कानून का उद्देश्य दलबदल को रोकना और सरकार की स्थिरता सुनिश्चित करना है।

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‘पदी कौशिक रेड्डी बनाम तेलंगाना राज्य’ मामले में सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के तहत अधिकरण (ट्रिब्यूनल) के रूप में कार्य करते समय विधानसभा अध्यक्ष को संवैधानिक उन्मुक्ति प्राप्त नहीं है।

दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी कानून) के बारे में

  • संविधान में यह अनुसूची 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ी गई थी। यह अनुसूची उन आधारों और प्रक्रियाओं को निर्धारित करती है जिनके तहत सांसदों और विधायकों को उनकी सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है। निम्नलिखित आधारों पर सदस्यता समाप्त हो सकती है:
    • यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी मूल राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग देता है,
    • यदि कोई सदस्य सदन में अपने राजनीतिक दल के निर्देशों (व्हिप) के खिलाफ जाकर मतदान करता है,
    • मनोनीत (नॉमिनेटेड) सदस्यों के मामले में, यदि वह सदस्य बनने के बाद संसद/विधानमंडल की पहली बैठक के छह महीने पश्चात किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है,
    • निर्दलीय सदस्य के मामले में यदि वह निर्वाचन के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।
  • किन पर लागू नहीं होगी: यदि किसी राजनीतिक दल के कम से कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य विलय के पक्ष में हों, तो वह दल किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय कर सकता है।
  • महत्व:
    • यह अनुसूची धन और बल के प्रभाव में राजनीतिक दल-बदल पर अंकुश लगाती है।
    • यह अनुसूची ‘आया राम गया राम’ प्रवृत्ति को हतोत्साहित करके निर्वाचित सरकार की स्थिरता को बढ़ावा देती है। गौरतलब है कि दल-बदल (floor-crossing) प्रवृत्ति मतदाता के जनादेश को कमजोर करती है और लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाती है। 

लोक सभा-अध्यक्ष/ विधान सभा-अध्यक्ष की भूमिका  

  • सदस्य की अयोग्यता वाली याचिकाओं पर संबंधित सदन के अध्यक्ष/सभापति या पीठासीन अधिकारी द्वारा निर्णय लिया जाता है।
    • हालांकि, अध्यक्ष या सभापति अक्सर सत्तारूढ़ दल के होते हैं। इसलिए उन पर अपने दल के हित को ध्यान में रखते हुए याचिकाओं पर निर्णय लेने में देरी करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।
  • किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हु (1992) मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सदन का अध्यक्ष/सभापति अधिकरण के रूप में कार्य करता है और इसलिए उसके निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।

दल-बदल विरोधी कानून से संबंधित अन्य प्रमुख निर्णय 

  • सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग (1971) वाद: उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए तीन-परीक्षण सूत्र निर्धारित किया कि किस गुट को निर्वाचन आयोग द्वारा मूल राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। ये तीन-परीक्षण सूत्र हैं:
    • संबंधित राजनीतिक दल के उद्देश्य, 
    • संबंधित राजनीतिक दल का संविधान, और 
    • संबंधित राजनीतिक दल के विधायी सदस्यों व संगठन के सदस्यों का बहुमत। 
  • राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007) वाद: संबंधित सदन का अध्यक्ष/सभापति सदस्य की अयोग्यता पर निर्णय को अनिश्चितकाल तक स्थगित नहीं कर सकता।
  • कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम विधान-सभा अध्यक्ष, मणिपुर (2020) वाद: संबंधित सदन का अध्यक्ष/सभापति को असाधारण मामलों को छोड़कर, आदर्श रूप से 3 महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए।
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