केरल पर 5.07 लाख करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां (कर्ज) है। यह सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 35.5% है।
- साथ ही, वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे प्रतिबद्ध व्यय (Committed expenditures) उसके राजस्व व्यय का 77% हिस्सा खर्च कर देते हैं।
- उपर्युक्त कारणों से राज्य का पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) घटकर GSDP के केवल 1.3% तक सीमित रह गया है।
भारतीय राज्यों पर ऋण संकट
- नीति आयोग के 'वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक' के अनुसार, राज्यों का ऋण भारत के कुल सरकारी ऋण का लगभग एक-तिहाई है।
- पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य लगातार राजस्व घाटे, राजकोषीय घाटे, उच्च कर्ज स्तर (GSDP का 35-45%) और उच्च ब्याज के भुगतान के बोझ का सामना कर रहे हैं।
- RBI के अनुसार मार्च 2024 तक भारतीय राज्यों का समेकित राजकोषीय घाटा बढ़कर GDP के 3.3% तक पहुंच गया। साथ ही, बकाया देनदारियाँ GDP के लगभग 28% तक पहुँच गईं।
राज्यों पर बढ़ते ऋण बोझ के मुख्य कारण
- लोकलुभावन घोषणाएं और योजनाएं : सब्सिडी, कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ी (फ्रीबीज) पर भारी व्यय बजट पर दबाव डालता है।
- प्रतिबद्ध व्यय अधिक होना: वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान पर राज्यों की राजस्व प्राप्तियों का 50–60% से अधिक व्यय हो जाता है (जैसे पंजाब और केरल में यह 70–80% से भी अधिक है)। इस वजह से पूंजीगत निवेश के लिए उपलब्ध संसाधन कम पड़ जाते हैं।
- केरल जैसे राज्यों में आबादी में वृद्धजनों (60 वर्ष से ऊपर) का अनुपात 15% से अधिक होने के कारण पेंशन और स्वास्थ्य-देखभाल जैसी सेवाओं पर व्यय बढ़ता जा रहा है।
- राजस्व प्रबंधन की खामियां: इनमें शामिल हैं; केंद्रीय GST हस्तांतरण पर अधिक निर्भरता; स्वयं के कर राजस्व स्रोत में वृद्धि कम होना।
- अन्य कारक: राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम की उधारी सीमाओं से बचने के लिए ऑफ-बजट उधारियां, कोविड-काल के आपातकालीन ऋण, तथा बढ़ती उधारी लागत (उच्च ब्याज दर) भी राज्यों के ऋण बोझ को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं।
आगे की राह
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