केरल ने 5 लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज होने के बाद राज्य की वित्तीय स्थिति पर 'श्वेत पत्र (व्हाइट पेपर)' पेश किया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • केरल पर ₹5.07 लाख करोड़ का कर्ज है (जो सकल घरेलू उत्पाद का 35.5% है), जिसमें राजस्व का 77% हिस्सा प्रतिबद्ध व्यय में खर्च हो जाता है।
  • भारत के कुल सरकारी ऋण का लगभग एक तिहाई हिस्सा राज्य ऋण है, जिसमें पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र प्रदेश वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं।
  • प्रमुख कारकों में लोकलुभावन उपाय, उच्च निर्धारित व्यय, राजस्व की कमजोरियां और बजट से बाहर के उधार शामिल हैं; आगे का रास्ता व्यापक विवेकपूर्ण सीमाओं और राजस्व स्रोतों के विस्तार में निहित है।

In Summary

केरल पर 5.07 लाख करोड़ रुपये की बकाया देनदारियां (कर्ज) है। यह सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 35.5% है। 

  • साथ ही, वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे प्रतिबद्ध व्यय (Committed expenditures) उसके राजस्व व्यय का 77% हिस्सा खर्च कर देते हैं। 
  • उपर्युक्त कारणों से राज्य का पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) घटकर GSDP के केवल 1.3% तक सीमित रह गया है।

भारतीय राज्यों पर ऋण संकट

  • नीति आयोग के 'वित्तीय स्वास्थ्य सूचकांक' के अनुसार, राज्यों का ऋण भारत के कुल सरकारी ऋण का लगभग एक-तिहाई है।
    • पंजाब, पश्चिम बंगाल, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य लगातार राजस्व घाटे, राजकोषीय घाटेउच्च कर्ज स्तर (GSDP का 35-45%) और उच्च ब्याज के भुगतान के बोझ का सामना कर रहे हैं।
  • RBI के अनुसार मार्च 2024 तक भारतीय राज्यों का समेकित राजकोषीय घाटा बढ़कर GDP के 3.3% तक पहुंच गया। साथ ही, बकाया देनदारियाँ GDP के लगभग 28% तक पहुँच गईं।

राज्यों पर बढ़ते ऋण बोझ के मुख्य कारण

  • लोकलुभावन घोषणाएं और योजनाएं : सब्सिडी, कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ी (फ्रीबीज) पर भारी व्यय बजट पर दबाव डालता है।
  • प्रतिबद्ध व्यय अधिक होना: वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान पर राज्यों की राजस्व प्राप्तियों का 50–60% से अधिक व्यय हो जाता है (जैसे पंजाब और केरल में यह 70–80% से भी अधिक है)। इस वजह से पूंजीगत निवेश के लिए उपलब्ध संसाधन कम पड़ जाते हैं।
    • केरल जैसे राज्यों में आबादी में वृद्धजनों (60 वर्ष से ऊपर) का अनुपात 15% से अधिक होने के कारण पेंशन और स्वास्थ्य-देखभाल जैसी सेवाओं पर व्यय बढ़ता जा रहा है।
  • राजस्व प्रबंधन की खामियां: इनमें शामिल हैं; केंद्रीय GST हस्तांतरण पर अधिक निर्भरता; स्वयं के कर राजस्व स्रोत में वृद्धि कम होना।
  • अन्य कारक: राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम की उधारी सीमाओं से बचने के लिए ऑफ-बजट उधारियां, कोविड-काल के आपातकालीन ऋण, तथा बढ़ती उधारी लागत (उच्च ब्याज दर) भी राज्यों के ऋण बोझ को बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हैं।

आगे की राह

  • मैक्रो-प्रूडेंशियल सीमाओं का सख्ती से अनुपालन: FRBM के लक्ष्यों का अधिक सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करना चाहिए तथा राज्यों के लिए वास्तविक GSDP आकलन के आधार पर ऋण सीमा निर्धारित करनी चाहिए।
  • स्वयं के राजस्व स्रोतों का विस्तार: स्थानीय कर आधार को बढ़ाना चाहिए, GST के अनुपालन में सुधार करना चाहिए और गैर-कर राजस्व संग्रह को अधिक प्रभावी बनाना चाहिए।
  • सार्वजनिक उपयोगिता (पब्लिक यूटिलिटी) सेवाओं पर शुल्क की समीक्षा: बिजली और जल आपूर्ति जैसी राज्य-प्रदत्त सेवाओं पर उचित उपयोगकर्ता शुल्क (यूजर चार्जेज) लगाकर उनके संचालन और रखरखाव की लागत की पूर्ण वसूली सुनिश्चित करनी चाहिए।
  • कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सुधार: 
    • उन्नत प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) मॉडल का उपयोग करके लाभार्थियों की सटीक पहचान करनी चाहिए, 
    • फर्जी या दोहरी पहचान वाले लाभार्थियों को लाभार्थी-सूची से बाहर कर देना चाहिए, और
    • योजनाओं के लाभ के वितरण में होने वाली लीकेज (रिसाव) को कम करना चाहिए।
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प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT)

A system to transfer subsidies and welfare benefits directly into the bank accounts of beneficiaries, thereby reducing leakages and corruption. Programmable payments through CBDC can further enhance DBT effectiveness.

ऑफ-बजट उधारियां

ये उधारियां हैं जो सीधे सरकार के बजट के बाहर ली जाती हैं, अक्सर सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाओं के माध्यम से। इनका उपयोग FRBM अधिनियम की उधार सीमाओं से बचने के लिए किया जा सकता है, जिससे उधार की वास्तविक सीमा अस्पष्ट हो जाती है।

राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम

यह अधिनियम केंद्र और राज्य सरकारों के लिए राजकोषीय घाटे, राजस्व घाटे और ऋण के स्तर को निर्धारित सीमा के भीतर रखने के लिए कानून स्थापित करता है। इसका उद्देश्य राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करना और सरकारी ऋण के टिकाऊ स्तर को बनाए रखना है।

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