यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत उच्चतर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
उच्चतर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता क्यों है?
- प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) रोकने के लिए: शिक्षा प्राप्ति के लिए वर्ष 2021-22 में भारत में केवल 46,878 विदेशी विद्यार्थी आए, जबकि 11.59 लाख भारतीय विद्यार्थी विदेश गए।
- भारत से धन-निकासी रोकने के लिए: शिक्षा के लिए विदेश भेजी जाने वाली राशि 2013-14 में 0.16 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी, जो बढ़कर 2023-24 में 3.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई। इस तरह शिक्षा के लिए धन निकासी में 2,000% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।
- भारतीय विद्यार्थियों को विश्व स्तरीय शिक्षा प्रदान करने के लिए: देश में स्थित शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले 97% भारतीय विद्यार्थी वैश्विक मानकों वाली विश्व स्तरीय शिक्षा-प्राप्ति का लाभ उठा सकते हैं।
- अन्य:
- अनुसंधान और विकास (R&D) में सहयोग बढ़ाने के लिए,
- 'सॉफ्ट पावर' (भारत को वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करना) बढ़ाने के लिए,
- प्रवासी भारतीयों की क्षमता का उपयोग करने के लिए, और
- संस्थाओं की वैश्विक रैंकिंग व भारतीय शिक्षा पर अंतरराष्ट्रीय धारणा के बीच के संबंध को बेहतर करने के लिए।
मुख्य चुनौतियां
- विनियामकीय अनुमति प्राप्त करने में जटिलता: UGC और AICTE जैसे कई निकायों का होना नियमों के अनुपालन में उलझन उत्पन्न करता है।
- शिक्षा से संबंधित क्रेडिट ट्रांसफर की कमी: यूरोप के 'यूरोपियन क्रेडिट ट्रांसफर एंड एक्युमुलेशन सिस्टम' के समान भारत में किसी सार्वभौमिक क्रेडिट मान्यता फ्रेमवर्क का अभाव है।
- वित्तपोषण की कमी: शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण में बहुत अधिक वित्तीय संसाधनों की जरुरत पड़ती है।
- गुणवत्ता की धारणा: कई विदेशी भागीदार अभी भी भारतीय शिक्षण संस्थानों को कम गुणवत्ता वाला मानते हैं।
शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख पहलें
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निष्कर्ष
जैसे-जैसे विदेशी विश्वविद्यालयों के ब्रांच कैंपस मॉडल का विकास होगा, विनियामकीय स्वायत्तता और क्रेडिट ट्रांसफर के बीच संतुलन की प्रभावी व्यवस्था तथा उद्योग जगत के साथ मजबूत अनुसंधान सहयोग भारत को एकीकृत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में बदल सकता है।