केंद्र सरकार के अनुसार, भारत की अकाउंट एग्रीगेटर प्रणाली के अब 11.2 करोड़ उपयोगकर्ता हैं।
- अकाउंट एग्रीगेटर (AA) फ्रेमवर्क 2021 में लॉन्च किया गया।
- यह देश के सबसे तेजी से बढ़ते डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के स्तंभों में से एक है।
अकाउंट एग्रीगेटर (AA) के बारे में
- वे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा लाइसेंस प्राप्त संस्थाएँ हैं।
- वे सहमति प्राप्त करके वित्तीय डेटा संग्रह करते हैं और वित्तीय संस्थानों के साथ साझा करते हैं।
एक हालिया रिपोर्ट में कार्बन को भंडारित करने में कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) तकनीक की सीमित क्षमताओं को रेखांकित किया गया।
कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) के बारे में
- CCS प्रक्रिया में उद्योगों, बिजली उत्पादन संयंत्रों और अन्य स्रोतों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को कैप्चर करके जमीन के नीचे भंडारित किया जाता है।
- मुख्य चुनौतियां:
- वाणिज्यिक: यह तकनीक बहुत महंगी है।
- भंडारण: भूमिगत भूवैज्ञानिक संरचनाओं की CO2 भंडारण क्षमता सीमित है, और सभी स्थल लंबे समय तक इनके भंडारण के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते हैं।
- पृथ्वी केवल लगभग 1,460 बिलियन टन CO₂ ही सुरक्षित रूप से जमीन के नीचे भंडारित कर सकती है।
- बुनियादी ढांचा: CO₂ ले जाने के लिए पाइपलाइन बनाने और रखरखाव की लागत बहुत अधिक है। जनता के विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है।
- CO₂ के दुष्प्रभाव: पाइपलाइन और संरचनाओं में जंग लगना, क्षरण होना और रिसाव की समस्या।
चाय के बढ़ते आयात के कारण असम चाय उद्योग संकट का सामना कर रहा है।
एक फसल के रूप में ‘चाय’ के बारे में
- अनुकूल तापमान: 18°C से 30°C तक। अत्यधिक तापमान इसके विकास और उपज पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
- वर्षा: 1200 से 2500 मिलीमीटर तक। फसल वृद्धि वाले मौसम के दौरान पर्याप्त वर्षा लाभकारी साबित होता है।
- अनुकूल आर्द्रता: उच्च आर्द्रता का स्तर (70% से ऊपर)।
- अनुकूल मृदा: अच्छी जल निकासी वाली व अम्लीय मृदा, जिसमें कार्बनिक पदार्थ प्रचुर हो और जिसमें पानी को रोक कर रखने की अच्छी क्षमता हो।
- देश में चाय उत्पादक प्रमुख राज्य: असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, आदि।
ओपेक+ (OPEC+) ने तेल उत्पादन को बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की।
OPEC+ के बारे में
- ओपेक ने 10 अन्य तेल उत्पादक देशों के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसी से ओपेक+ का गठन हुआ।
- ओपेक और ओपेक+ देश मिलकर विश्व में लगभग 59% कच्चे तेल का उत्पादन करते हैं।
- सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश संयुक्त राज्य अमेरिका ओपेक+ का हिस्सा नहीं है।
- ओपेक का गठन 1960 में इराक, ईरान, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने मिलकर किया था।
हाल ही में, श्रीलंका के राष्ट्रपति ने कच्चातिवु द्वीप का दौरा किया। उनका दौरा ऐसे समय में हुआ जब कई भारतीय राजनेता इस द्वीप को फिर से भारत को लौटाने की मांग करने लगे हैं।
कच्चातिवु द्वीप के बारे में
- अवस्थिति: यह पाक जलडमरूमध्य में स्थित एक छोटा और निर्जन द्वीप है।
- यह तमिलनाडु के रामेश्वरम शहर के उत्तर-पूर्व और श्रीलंका के जाफना शहर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
- यह द्वीप बंजर है, जहां पीने के पानी के साधन या स्वच्छता सुविधाएं नहीं है। सेंट एंथोनी कैथोलिक श्राइन ही यहां एकमात्र स्थायी संरचना है।
- राजनीतिक विवाद: यह द्वीप भारत और श्रीलंका के बीच विवादित था।
- 1974 में, दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ था। इसके तहत अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा का सीमांकन किया जिसमें कच्चातिवु को श्रीलंका के हिस्से में रखा गया।
- इसके बदले में, भारत को कन्याकुमारी के पास स्थित वेड्ज बैंक (Wadge Bank) मिला।
Article Sources
1 sourceहाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत की शर्तों का उल्लंघन होने पर जमानत रद्द नहीं करने के लिए साक्षी संरक्षण स्कीम, 2018 का विकल्प के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता।
साक्षी संरक्षण स्कीम, 2018 के बारे में
उद्देश्य:
- गवाहों और उनके परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना, ताकि वे बिना डर या दबाव के स्वतंत्र रूप से गवाही दे सकें।
- इसका उद्देश्य कानून-व्यवस्था लागू करना है, ताकि आपराधिक मामलों में गवाह पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों की मदद कर सकें।
7 और 8 सितंबर को पूरे विश्व में पूर्ण चंद्र ग्रहण देखा गया। इस ग्रहण के दौरान चाँद को रक्त की तरह लाल देखा गया।
पूर्ण चंद्र ग्रहण के बारे में
- ग्रहण तब होता है, जब कोई ग्रह या चंद्रमा सूर्य के प्रकाश के मार्ग में आ जाता है।
- चंद्र ग्रहण तब होता है, जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच सीधी रेखा में आ जाती है, और चंद्रमा पृथ्वी की छाया में आ जाता है।
- जब पूरा चंद्रमा पृथ्वी की छाया के सबसे गहरे हिस्से प्रच्छाया (Umbra) में आ जाता है, तो यह लाल रंग का हो जाता है, इसलिए इसे ब्लड मून (Blood Moons) कहा जाता है।
MIT के शोधकर्ताओं की एक टीम ने यह समझने के लिए एक नई तकनीक विकसित की है कि ‘लैंग्वेज मॉडल’ प्रोटीन की संरचना और इसके कार्य का पूर्वानुमान कैसे लगाते हैं।
प्रोटीन लैंग्वेज मॉडल्स (PLMs) के बारे में
- PLMs, एक प्रकार का लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) है, जिन्हें नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) के आधार पर विकसित किया गया है।
- शब्दों की जगह ये अमीनो एसिड्स को "टोकन" और प्रोटीन को "वाक्य" की तरह देखते हैं।
- लाखों प्रोटीन अनुक्रमों (sequences) पर प्रशिक्षण प्राप्त करके ये प्रोटीन की संरचना सीखते हैं।
- इससे पारंपरिक और समय लेने वाले लैब प्रयोगों से बचते हुए दवाइयों और टीकों के विकास में तेजी लाई जा सकती है।