उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि अवैध अप्रवासियों के पास भारत में कोई कानूनी अधिकार नहीं है | Current Affairs | Vision IAS
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न्यायालय ने कहा कि रोहिंग्या जैसे अवैध आप्रवासियों के पास कानूनी अधिकार नहीं हैं, वे नागरिकों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता देते हैं, तथा अनधिकृत प्रवेशकों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने की अपेक्षा सीमा सुरक्षा पर अधिक जोर देते हैं।

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बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) रिट याचिका में रोहिंग्याओं की गिरफ्तारी के बाद उनकी कोई जानकारी न मिलने का मुद्दा उठाया गया था। इसी याचिका पर सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधाएं और अन्य लाभ देश के नागरिकों के लिए हैं, न कि अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर गए लोगों के लिए

उच्चतम न्यायालय की मुख्य टिप्पणियाँ

  • भारत में रोहिंग्याओं की वैधानिक स्थिति: शीर्ष न्यायालय ने रोहिंग्याओं को शरणार्थी के रूप में वर्गीकृत करने की मांग पर सवाल उठाया, और कहा कि इसके लिए सरकार के स्तर से आधिकारिक घोषणा आवश्यक है।
    • न्यायालय ने कहा कि रोहिंग्या अवैध घुसपैठिए हैं, इसलिए, भारत में उनके पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
  • देश में अवैध रूप से प्रवेश करने वाले के प्रति दायित्व: न्यायालय ने उनके साथ मूलभूत मानवीय व्यवहार करने की आवश्यकता को स्वीकार किया। हालांकि, इस विचार पर सवाल किया कि कोई विदेशी नागरिक गैर-कानूनी रूप से भारत में प्रवेश करने के बाद कानूनी अधिकारों की मांग करे।
  • राष्ट्रीय प्राथमिकता और सुरक्षा: न्यायालय ने कहा कि भारत की अपनी आबादी की ज़रूरतें पूरी करना, अवैध प्रवासियों की जरूरतों से अधिक महत्वपूर्ण है। साथ ही, न्यायालय ने विशेष रूप से पूर्वोत्तर क्षेत्र में सीमा सुरक्षा की सख्त निगरानी के सामरिक महत्व को भी दोहराया। 

भारत में शरणार्थियों से संबंधित कानूनी प्रावधान

  • अंतरराष्ट्रीय कानून:
    • शरणार्थी अभिसमय, 1951 (Refugee Convention): इसमें 'शरणार्थी' की परिभाषा दी गई है। साथ ही, इसमें उनके अधिकारों व उनकी सुरक्षा हेतु अंतर्राष्ट्रीय व्यवहार मानकों का भी उल्लेख है।  
      • भारत इस अभिसमय (कन्वेंशन) और इसके 1967 के प्रोटोकॉल का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।
      • प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून (कस्टमरी लॉ') के तहत “गैर-वापसी” यानी ‘नॉन-रिफाउलमेंट’ सिद्धांत को भारत मानता है। 
        • नॉन-रिफाउलमेंट अंतरराष्ट्रीय कानून का एक मूलभूत सिद्धांत है। यह राष्ट्रों को किसी व्यक्ति को ऐसे देश वापस भेजने से रोकता है जहाँ उसे उत्पीड़न, यातना या अन्य गंभीर नुकसान का खतरा हो।
  • भारत में कानून: भारत में शरणार्थियों को अग्रलिखित कानूनों के तहत प्रशासित किया जाता है: विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (Foreigners Act, 1946); विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम, 1939; पासपोर्ट अधिनियम, 1967 ;और नागरिकता अधिनियम, 1955. 
    • तदर्थ (Ad-hoc) व्यवस्था: भारत में शरणार्थी दर्जा किसी कानून के तहत नहीं, बल्कि कार्यपालिका/प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से दिया जाता है। इसे "रणनीतिक अस्पष्टता (Strategic Ambiguity)" की संज्ञा दी गई है। 
    • शरणार्थियों के प्रबंधन का विभाजन: 
      • केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) श्रीलंकाई तमिल और तिब्बती शरणार्थियों से जुड़े मामलों को देखता है।
      • संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ‘UNHCR’ रोहिंग्या, अफ़ग़ान, म्यांमार और अफ्रीकी नागरिकों से जुड़े शरणार्थियों के मामले को प्रशासित करती है।
    • भारत ने निम्नलिखित समूहों को शरणार्थी का दर्जा दिया है:
      • तिब्बती शरणार्थी;
      • श्रीलंकाई तमिल शरणार्थी’
      • चकमा और हाजोंग शरणार्थी, आदि। 
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