उच्चतम न्यायालय ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश राज्य सरकारों को सभी मार्गों पर CCTV कैमरे लगाने और खनन गतिविधियों में उपयोग किए जाने वाले सभी वाहनों और मशीनरी पर GPS डिवाइस लगाने का निर्देश दिया है।
भारत में अवैध रेत खनन जारी रहने के कारण
- तेजी से बढ़ता निर्माण क्षेत्र: शहरीकरण के कारण रेत की मांग बहुत बढ़ गई है; जल के बाद रेत सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला संसाधन है।
- नदी की रेत को प्राथमिकता: M-सैंड जैसे आधुनिक विकल्पों की तुलना में नदी की रेत को बेहतर माना जाता है क्योंकि इसका आकार और बनावट कंक्रीट को मजबूत बनाती है।
- विनियमन संबंधी मुद्दे: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत रेत 'लघु खनिज' (Minor Mineral) है। इसलिए इसका विनियमन राज्यों के पास है, जिससे पूरे देश में एक समान नियम नहीं हैं।
- अन्य कारण:
- दूरदराज के क्षेत्रों में निगरानी की चुनौतियां;
- राजनीतिक-आपराधिक सांठगांठ और अत्यधिक संगठित "रेत माफिया" आदि।
भारत में अनियंत्रित रेत खनन के दुष्प्रभाव:
- पर्यावरण पर प्रभाव:
- नदी आकारिकी: अत्यधिक रेत खनन नदियों के प्राकृतिक मार्ग को बदल देता है, जिससे नदी किनारों का कटाव और धंसाव होता है।
- जल की गुणवत्ता में गिरावट: भारी धातु और रसायन (जैसे फॉस्फेट) जल में मिल जाते हैं
- जैव विविधता और पर्यावास को नुकसान: अवैध रेत खनन से मछलियों के प्रजनन और प्रवास मार्ग में बाधा उत्पन्न होती है।
- नदियों की बाढ़ नियंत्रण क्षमता में कमी: इससे तटीय क्षेत्रों में तूफान, चक्रवात और सुनामी से अधिक नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।
- सार्वजनिक अवसंरचनाओं को नुकसान: नदी नितल के क्षरण से पुल, पाइपलाइन और सुरक्षा दीवारें (साइड प्रोटेक्शन वाल) जैसी महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग संरचनाएं अस्थिर हो जाती हैं।
- राजस्व की हानि: अवैध खनन से रॉयल्टी, टैक्स और पर्यावरण शुल्क का नुकसान होता है।
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य
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