UNU-INWEH की रिपोर्ट के अनुसार AI के बढ़ते उपयोग से प्राकृतिक संसाधनों का खतरा उत्पन्न हो गया है | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • यूएनयू-आईएनडब्ल्यूईएच की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि एआई डेटा सेंटर 2030 तक 945 किलोवाट-घंटे बिजली की खपत करेंगे, जिनका कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 399 मिलियन टन टन होगा, जो उप-सहारा अफ्रीका की जल आवश्यकताओं के बराबर होगा और भूमि का क्षेत्रफल 14,500 वर्ग किलोमीटर से अधिक होगा।
  • एआई इंफ्रास्ट्रक्चर 2030 तक सालाना 2.5 मिलियन टन ई-कचरा उत्पन्न कर सकता है, जिससे वैश्विक डिजिटल विभाजन और भी बढ़ जाएगा क्योंकि 90% एआई कंप्यूटिंग अमेरिका और चीन में है।
  • आगे बढ़ने के तरीकों में समग्र मापदंड (कार्बन, जल, भूमि), मांग-पक्षीय सुरक्षा उपाय (टोकन सीमा), न्यायसंगत शासन और एआई विस्तार के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक शामिल हैं।

In Summary

‘संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय-जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान (UNU-INWEH) ने अपनी 30वीं वर्षगांठ पर "AI के ऊर्जा उपयोग की पर्यावरणीय लागत: कार्बन, जल और भूमि फुटप्रिंट" शीर्षक वाली यह रिपोर्ट जारी की है।  

  • UNU-INWEH संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की 13 संस्थाओं में से एक है। यह कनाडा के ओंटारियो में स्थित है।

AI की पर्यावरणीय लागत

  • बिजली: अनुमान है कि 2030 तक AI को चलाने वाले डेटा सेंटरों की बिजली खपत 945 टेरावाट प्रति घंटे (TWh) तक पहुंच जाएगी।
  • कार्बन उत्सर्जन: इतनी बिजली के उत्पादन से 39.9 करोड़ टन CO₂ समतुल्य का कार्बन फुटप्रिंट उत्पन्न होगा। इसकी भरपाई के लिए 110 वर्षों में 6.7 अरब पेड़ लगाने होंगे।
  • संसाधनों की कमी: AI के कारण जल की खपत इतनी होगी कि वह उप-सहारा अफ्रीका के 1.3 अरब लोगों की वार्षिक जल की न्यूनतम मांग को पूरा कर सकती है। साथ ही, इसके लिए 14,500 वर्ग किलोमीटर से अधिक भूमि की आवश्यकता होगी।
  • ई-अपशिष्ट संकट: वर्ष 2030 तक AI अवसंरचना से प्रत्येक वर्ष 25 लाख टन ई-अपशिष्ट उत्पन्न हो सकता है, जिसका सबसे बुरा प्रभाव ग्लोबल साउथ के देशों पर पड़ेगा।
  • रिबाउंड प्रभाव (जेवन्स विरोधाभास): तकनीकी दक्षता में वृद्धि AI को किफायती बनाती है, जिससे इसका उपयोग अत्यधिक बढ़ जाता है और कुल ऊर्जा बचत का लाभ समाप्त हो जाता है।
  • डिजिटल असमानता: विश्व की 90% AI कंप्यूटिंग क्षमता केवल दो देशों (संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन) में केंद्रित है, जिससे पर्यावरणीय संसाधनों के दोहन का बोझ विकासशील देशों पर स्थानांतरित हो रहा है।

आगे की राह

  • समग्र मापदंड: अब केवल कार्बन उत्सर्जन ही नहीं, बल्कि इसके साथ जल और जमीन के उपयोग की मात्रा को भी सार्वजनिक तौर पर प्रकट करना अनिवार्य होना चाहिए।
  • उपयोग पर सीमा: AI के असंधारणीय उपयोग को सीमित करने के लिए टोकन, रिज़ॉल्यूशन और आउटपुट की लंबाई पर नियम लागू करने चाहिए ताकि अनावश्यक खपत रुक सके।
  • न्यायसंगत शासन: AI के विस्तार को राष्ट्रीय जल और ऊर्जा नीतियों के साथ जोड़ना चाहिए, ताकि जिन समुदायों के आसपास डेटा सेंटर हों, उन्हें निर्णय में शामिल किया जा सके और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय मानक: अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ऐसे समान मापदंड और सूचना साझा करने की व्यवस्था को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे पर्यावरणीय बोझ को एक देश से दूसरे देश में स्थानांतरित करने की प्रवृत्ति कम हो तथा AI कंप्यूटिंग से वंचित क्षेत्रों की भागीदारी और क्षमता निर्माण को समर्थन मिल सके। 
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ग्लोबल साउथ

यह उन विकासशील देशों के एक समूह को संदर्भित करता है जो मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध में स्थित विकसित देशों के विपरीत, मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध में स्थित हैं। इसमें अक्सर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश शामिल होते हैं।

डिजिटल असमानता

डिजिटल असमानता विभिन्न देशों या समुदायों के बीच डिजिटल प्रौद्योगिकियों, सूचना और संचार तक पहुंच, उपयोग और प्रभाव में अंतर को संदर्भित करती है। AI कंप्यूटिंग शक्ति का कुछ देशों में अत्यधिक केंद्रीकरण इस असमानता को बढ़ाता है।

रिबाउंड प्रभाव (जेवन्स विरोधाभास)

रिबाउंड प्रभाव, जिसे जेवन्स विरोधाभास (Jevons Paradox) के रूप में भी जाना जाता है, यह बताता है कि जब तकनीकी दक्षता में वृद्धि से किसी संसाधन का उपयोग अधिक किफायती हो जाता है, तो उस संसाधन की कुल खपत घटती नहीं है, बल्कि बढ़ जाती है। AI के संदर्भ में, दक्षता वृद्धि से इसका अत्यधिक उपयोग हो सकता है।

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