‘यूनिवर्सिटी ऑफ लिवरपूल’ को बेंगलुरु में कैंपस स्थापित करने के लिए अनुमति पत्र (लेटर ऑफ अप्रूवल) मिला | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • एनईपी 2020 का उद्देश्य वैश्विक सहयोग और धारणा को बढ़ाकर उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना, प्रतिभा पलायन और विदेश भेजे जाने वाले धन की समस्या का समाधान करना है।
  • चुनौतियों में नियामक जटिलता, ऋण हस्तांतरण में अंतराल, वित्तपोषण संबंधी बाधाएं और भारतीय संस्थानों के लिए गुणवत्ता संबंधी धारणा के मुद्दे शामिल हैं।
  • यूजीसी विनियम और एफएचईआई विनियम जैसी पहलें भारत में शैक्षणिक सहयोग और विदेशी विश्वविद्यालयों के संचालन को सुगम बनाती हैं।

In Summary

यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के तहत उच्चतर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

उच्चतर शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण की आवश्यकता क्यों है?

  • प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) रोकने के लिए: शिक्षा प्राप्ति के लिए वर्ष 2021-22 में भारत में केवल 46,878 विदेशी विद्यार्थी आए, जबकि 11.59 लाख भारतीय विद्यार्थी विदेश गए।
  • भारत से धन-निकासी रोकने के लिए: शिक्षा के लिए विदेश भेजी जाने वाली राशि 2013-14 में 0.16 बिलियन अमेरिकी डॉलर थी, जो बढ़कर 2023-24 में 3.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गई। इस तरह शिक्षा के लिए धन निकासी में 2,000% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।
  • भारतीय विद्यार्थियों को विश्व स्तरीय शिक्षा प्रदान करने के लिए: देश में स्थित शिक्षण  संस्थानों में पढ़ने वाले 97% भारतीय विद्यार्थी वैश्विक मानकों वाली विश्व स्तरीय शिक्षा-प्राप्ति का लाभ उठा सकते हैं।
  • अन्य: 
    • अनुसंधान और विकास (R&D) में सहयोग बढ़ाने के लिए, 
    • 'सॉफ्ट पावर' (भारत को वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करना) बढ़ाने के लिए, 
    • प्रवासी भारतीयों की क्षमता का उपयोग करने के लिए, और 
    • संस्थाओं की वैश्विक रैंकिंग व भारतीय शिक्षा पर अंतरराष्ट्रीय धारणा के बीच के संबंध को बेहतर करने के लिए।

मुख्य चुनौतियां

  • विनियामकीय अनुमति प्राप्त करने में जटिलता: UGC और AICTE जैसे कई निकायों का होना नियमों के अनुपालन में उलझन उत्पन्न करता है।
  • शिक्षा से संबंधित क्रेडिट ट्रांसफर की कमी: यूरोप के 'यूरोपियन क्रेडिट ट्रांसफर एंड एक्युमुलेशन सिस्टम' के समान भारत में किसी सार्वभौमिक क्रेडिट मान्यता फ्रेमवर्क का अभाव है।
  • वित्तपोषण की कमी: शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण में बहुत अधिक वित्तीय संसाधनों की जरुरत पड़ती है।
  • गुणवत्ता की धारणा: कई विदेशी भागीदार अभी भी भारतीय शिक्षण संस्थानों को कम गुणवत्ता वाला मानते हैं

शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख पहलें

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020: इसने अंतरराष्ट्रीय ज्ञान, कौशल और शिक्षण पद्धतियों को भारतीय शिक्षा प्रणाली में एकीकृत करने के लिए एक व्यापक रूपरेखा तैयार की है।
  • UGC का अकादमिक सहयोग विनियमन (2022): इसके तहत भारतीय शिक्षण संस्थानों को विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ ट्विनिंग, संयुक्त और दोहरी (ड्यूल) डिग्री कार्यक्रम प्रारंभ करने की अनुमति दी गई।
  • विदेशी उच्चतर शिक्षण संस्थानों (FHEI) का विनियमन: यह विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में संचालन के लिए विधिक और विनियामक आधार प्रदान करता है।
  • भारतीय शिक्षण संस्थानों की विदेशों में शाखाएं: जैसे IIT द्वारा अबू धाबी और तंजानिया में कैंपस स्थापित करना।

 

निष्कर्ष

जैसे-जैसे विदेशी विश्वविद्यालयों के ब्रांच कैंपस मॉडल का विकास होगा, विनियामकीय स्वायत्तता और क्रेडिट ट्रांसफर के बीच संतुलन की प्रभावी व्यवस्था तथा उद्योग जगत के साथ मजबूत अनुसंधान सहयोग भारत को एकीकृत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में बदल सकता है।   

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विनियामकीय स्वायत्तता

यह किसी शैक्षणिक संस्थान को अपने संचालन, पाठ्यक्रम और शैक्षणिक निर्णयों में स्वतंत्र रूप से कार्य करने की शक्ति है, जिसमें सरकारी हस्तक्षेप कम होता है।

विदेशी उच्चतर शिक्षण संस्थान (FHEI)

यह एक ऐसा संस्थान है जो भारत के बाहर स्थापित है लेकिन भारत में अपनी शैक्षिक सेवाएं या परिसर संचालित करने का प्रयास कर रहा है।

ड्यूल डिग्री कार्यक्रम

यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसमें छात्र दो अलग-अलग डिग्री एक साथ या क्रमिक रूप से प्राप्त करते हैं, अक्सर एक ही विश्वविद्यालय या विभिन्न विश्वविद्यालयों के सहयोग से।

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