यह राज्य वित्त रिपोर्ट का दूसरा संस्करण है, जो वित्त वर्ष 2023-24 में सभी 28 राज्यों की वित्तीय स्थिति का विवरण प्रस्तुत करता है।
- इस रिपोर्ट का पहला संस्करण, 'राज्य वित्त 2022-23', सितंबर 2025 में जारी किया गया था। (अधिक जानकारी के लिए 20 सितंबर, 2025 की न्यूज़ टुडे पढ़िए)
रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर
- राज्यों का सार्वजनिक ऋण: 31 मार्च, 2024 तक राज्यों पर कुल कर्ज ₹67.87 लाख करोड़ था। यह सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का लगभग 23% है।
- राजकोषीय घाटा: 15वें वित्त आयोग ने इसकी सीमा GSDP का 3.0% निर्धारित की थी। इस सीमा को वित्त वर्ष 2023-24 में 18 राज्यों ने पार कर लिया है।
- अत्यधिक राजकोषीय कठोरता: राज्यों के पास नए विकास कार्यों के लिए "वित्तीय स्रोतों की कमी है। ऐसा इस कारण, क्योंकि प्रतिबद्ध व्यय (वेतन, पेंशन, ब्याज आदि) कुल राजस्व व्यय का लगभग 60% हिस्सा है।
- केंद्रीय कर अंतरण पर निर्भरता: 2014-15 में राज्यों के कुल राजस्व का लगभग 21% हिस्सा केंद्र से मिलने वाले करों से आता था। 2023-24 में यह निर्भरता बढ़कर लगभग 30% हो गई है।
- इससे राज्यों के बजट राष्ट्रीय आर्थिक उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो गए हैं।
- कम पूंजीगत व्यय (Capex): राज्यों के खर्च में राजस्व व्यय (रखरखाव और वेतन) का आधिक्य (लगभग 83%) बना हुआ है, जबकि पूंजीगत व्यय केवल लगभग 16% है। राज्य दीर्घावधि के निवेश की बजाय तत्काल उपभोग को प्राथमिकता दे रहे हैं।
- पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे विभिन्न राज्यों में कर्ज का उपयोग संपत्ति सृजन की बजाय दैनिक खर्चों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है।
- पारदर्शिता की कमी: प्रशासनिक कार्यों के रूप में "शैडो बजटिंग" की समस्या वित्त की वास्तविक स्थिति को अस्पष्ट कर रही है। उदाहरण के लिए- त्रुटिपूर्ण वर्गीकरण।
कैग (CAG) की सिफारिशराज्यों द्वारा व्ययों के वर्गीकरण में एकरूपता की कमी को दूर करने के लिए, कैग ने 'ऑब्जेक्ट हेड्स' (Object Heads) के सामंजस्य की सिफारिश की है। इसे केंद्र और राज्यों द्वारा वित्त वर्ष 2027-28 तक अपना लेना चाहिए। |
