इस विधेयक का नाम 'द सैंक्शिनिंग रशिया एक्ट ऑफ 2025' है। यह विधेयक लागू होने के बाद अमेरिकी प्रशासन को रूसी तेल, गैस, यूरेनियम आदि खरीदने वाले देशों पर भारी प्रशुल्क और 'द्वितीयक प्रतिबंध’ लगाने में सक्षम बनाएगा।
- अमेरिकी राष्ट्रपति के पास इन प्रशुल्कों को 180 दिनों तक के लिए माफ करने की शक्ति होगी, यदि इसे अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में समझा जाता है।
भारत के लिए संभावित प्रभाव
- व्यापार में रुकावट: वस्तुओं और संभावित रूप से सेवाओं पर इतना अधिक प्रशुल्क लगने से संयुक्त राज्य अमेरिका को होने वाला भारत का 120 अरब डॉलर का वार्षिक निर्यात प्रभावी रूप से रुक सकता है।
- क्षेत्रकों को नुकसान: वस्त्र, फुटवियर और समुद्री उत्पादों जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रकों की प्रतिस्पर्धात्मकता व निर्यात व्यवहार्यता में और भी कमी आ सकती है। ये क्षेत्रक पहले से ही 50% तक के अमेरिकी प्रशुल्क के बोझ तले दबे हुए हैं।
- सौदेबाजी की शक्ति में कमी: यह यूरोपीय संघ (EU), खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) आदि सहित विभिन्न संस्थाओं के साथ भविष्य के व्यापार समझौतों की वार्ताओं को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।
- अन्य प्रभाव: भारत-अमेरिका संबंधों में गिरावट, आर्थिक संवृद्धि पर प्रभाव आदि।
भारत के लिए आगे की राह
- निर्यात का विविधीकरण: एकतरफा प्रशुल्क वृद्धि के प्रति सुभेद्यता को कम करने के लिए वस्तु निर्यात को अमेरिका से हटाकर अन्य देशों की ओर विविधीकृत करना चाहिए।
- निर्यात संवर्धन मिशन: प्रशुल्क बढ़ोतरी से प्रभावित भारत के निर्यात तंत्र को मजबूत करने के लिए परिव्यय में वृद्धि करनी चाहिए।
- व्यापार सौदों में तेजी लाना: जैसे कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (India-EU FTA) की वार्ताओं में तेजी लाना।
- विनियामक सुधार: विनियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना चाहिए और कपास, चमड़ा व रत्न जैसे महत्वपूर्ण कच्चे माल पर शुल्क को तर्कसंगत बनाना चाहिए।