केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय ने सहकारी समितियों में वित्तीय संकट को रेखांकित किया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • भारत की 8.48 लाख सहकारी समितियों में से लगभग 24.8% घाटे में हैं, 16.6% निष्क्रिय हैं और 5.5% परिसमापन की प्रक्रिया में हैं।
  • प्रमुख चुनौतियों में कमजोर शासन व्यवस्था, वित्तीय अस्थिरता, संविदात्मक अक्षमताएं और सदस्यों की घटती भागीदारी शामिल हैं, जो डेयरी, आवास और ऋण जैसे क्षेत्रों को प्रभावित करती हैं।
  • राष्ट्रीय सहकारी नीति 2025, मार्गदर्शक योजना और विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना जैसी पहलों का उद्देश्य सहकारी समितियों की भागीदारी और बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देना है।

In Summary

सहकारिता मंत्रालय के अनुसार, देश में कुल 8.48 लाख सहकारी समितियों में से 2.11 लाख (लगभग 24.8%) घाटे में चल रही हैं, 1.41 लाख (लगभग 16.6%) निष्क्रिय हैं, और 47,688 (लगभग 5.5%) परिसमापन यानी लिक्विडेशन की प्रक्रिया में हैं।

  • उत्तर प्रदेश में निष्क्रिय सहकारी समितियों का प्रतिशत सर्वाधिक (41.8%) है, इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल का स्थान है।

भारत में सहकारी क्षेत्र के समक्ष चुनौतियां

  • शासन प्रणाली में कमियां: सहकारी समिति के बोर्डों पर प्रभावशाली राजनेताओं का प्रभुत्व रहता है। इसके परिणामस्वरूप होने वाला कुप्रबंधन वित्तीय अस्थिरता को बढ़ाता है। इससे समिति के सदस्यों का विश्वास और भागीदारी कम होती है। 
    • उदाहरण के लिए: महाराष्ट्र में पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव (PMC) बैंक घोटाला
  • वित्तीय बाधाएं: ये समितियां गंभीर वित्तीय समस्याओं का सामना करती हैं। इसकी वजहें हैं; सदस्यों के लघु अंशदान पर अधिक निर्भरता, सीमित कार्यशील पूंजी, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) का बढ़ना और दिवालियापन। 
  • अनुबंधों को लागू करने में अक्षमता: अनुबंधों का सही ढंग से पालन नहीं होता, सदस्यता/लाभ के नियम स्पष्ट नहीं होते, और बिचौलियों का प्रभाव अधिक होता है। इन कारणों से सहकारी समितियों के सदस्यों को अक्सर बाज़ार से कम कीमत मिलती है 
    • चीनी क्षेत्रक की समितियों के विश्लेषण से यह समस्या स्पष्ट होती है।
  • सदस्यों की भागीदारी पर निर्भरता: जब सहकारी समितियों के सदस्यों की भागीदारी कम हो जाती है, तो उनकी सौदेबाजी की शक्ति घट जाती है, वित्तीय स्थिति खराब होने लगती है, और मुफ्त लाभ उठाने की प्रवृत्ति (free-riding) बढ़ जाती है।
  • क्षेत्रक-विशेष समितियों की समस्याएं: 
    • डेयरी क्षेत्रक: बेमौसम बारिश, एशिया में भू-राजनीतिक अशांति और त्योहारों में ही अधिक मांग होना।
    • आवासन क्षेत्रक: घोटालों से प्रभावित सहकारी बैंकों के कारण वित्तीय संकट, धन का कुप्रबंधन।
    • ऋण देने में संलग्न सहकारी क्षेत्रक: पर्याप्त निगरानी की कमी, क्रेडिट संघों का कुप्रबंधन।
    • महिला कल्याण से संबंधित समितियां: औपचारिक संस्थाओं (बैंकों)  से ऋण लेने में समस्या, महिलाओं के आवागमन पर कई तरह के प्रतिबंध, सामाजिक बाधाएं, आदि।

सहकारी क्षेत्रक के लिए शुरू की गई पहलें

  • राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025: इसका उद्देश्य 50 करोड़ नागरिकों को सहकारिता में सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना है।
  • मार्गदर्शिका योजना: इसका उद्देश्य 2 लाख नई प्राथमिक कृषि साख समितियों (PACS), डेयरी और मत्स्य पालन सहकारी समितियों की स्थापना करना है।
  • सहकारी क्षेत्रक में विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना: अवसंरचना के निर्माण (जैसे गोदाम, प्रसंस्करण इकाइयां आदि) के लिए।
  • राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC): यह केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है। इसका उद्देश्य सहकारी समितियों को संस्थागत सहायता प्रदान करना है।  
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राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (National Cooperative Development Corporation - NCDC)

यह भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय है, जिसका मुख्य उद्देश्य सहकारी समितियों को संस्थागत और वित्तीय सहायता प्रदान करना है ताकि वे ग्रामीण विकास में योगदान कर सकें।

प्राथमिक कृषि साख समितियां (Primary Agricultural Credit Societies - PACS)

ये सहकारी समितियों का सबसे निचला स्तर हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को अल्पकालिक और मध्यम अवधि के ऋण प्रदान करती हैं, और अन्य आवश्यक कृषि इनपुट और सेवाएं भी उपलब्ध कराती हैं।

मुफ्त लाभ उठाने की प्रवृत्ति (Free-riding)

यह एक आर्थिक अवधारणा है जहाँ कोई व्यक्ति या संस्था किसी सार्वजनिक वस्तु या सेवा का लाभ उठाता है बिना उसके निर्माण या रखरखाव में योगदान दिए। सहकारी समितियों में, इससे सदस्यों की भागीदारी कम हो सकती है।

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