केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के तहत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने 'भारत ऊर्जा सांख्यिकी 2026' जारी की है।
भारत ऊर्जा सांख्यिकी 2026 रिपोर्ट के मुख्य बिंदु:
- कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति (TPES): वित्तीय वर्ष 2024-25 में इसमें 2.95% की वृद्धि हुई है। यह लगभग 9.3 लाख किलो टन तेल समतुल्य (KToE) तक पहुंच गई है।
- अक्षय ऊर्जा: 31 मार्च, 2025 तक इसका उत्पादन लगभग 47 लाख मेगावाट है।
- शीर्ष 3 राज्य: राजस्थान (23.70%), इसके बाद महाराष्ट्र और गुजरात का स्थान है।
- सबसे बड़े घटक: सौर ऊर्जा (लगभग 71%) शीर्ष पर है। इसके बाद पवन ऊर्जा और बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का स्थान आता है।
- कोयला अभी भी ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना हुआ है।
केंद्र सरकार ने OALP के तहत 21 ब्लॉकों की पेशकश करते हुए 11वें अन्वेषण लाइसेंसिंग चक्र की शुरुआत की है।
OALP के बारे में:
- प्रारंभ: यह नीति 2016 में हाइड्रोकार्बन अन्वेषण और लाइसेंसिंग नीति (HELP) के हिस्से के रूप में प्रस्तुत की गई थी।
- उद्देश्य: यह नीति हाइड्रोकार्बन अन्वेषण करने के इच्छुक निवेशकों को राष्ट्रीय डेटा रिपॉजिटरी (NDR) के माध्यम से डेटा का अध्ययन करने के बाद स्वयं ब्लॉक चुनने की अनुमति देती है। इसके लिए उन्हें सरकार की ओर से किसी औपचारिक बोली चक्र की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होती है।
- HELP के तहत OALP-XI की मुख्य विशेषताएं: इसमें राजस्व साझाकरण मॉडल और कम रॉयल्टी दरें शामिल हैं। इसमें तेल उपकर (सेस) की अनुपस्थिति और सभी हाइड्रोकार्बन (पारंपरिक और गैर-पारंपरिक) के लिए एकल लाइसेंस की सुविधा दी गई है। साथ ही, मार्केटिंग और मूल्य निर्धारण की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई है।
भारत में उर्वरक क्षेत्रक की स्थिति:
- भारत उर्वरकों के सबसे बड़े आयातकों में से एक है।
- भारत यूरिया की मांग का लगभग 13–20% हिस्सा और DAP (डाईअमोनियम फॉस्फेट) की मांग का लगभग 60% आयात करता है।
- खाड़ी क्षेत्र आयात का एक प्रमुख स्रोत बना हुआ है। यूरिया के 20-30% और DAP के 30% आयात इसी क्षेत्र से किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त, यह क्षेत्र भारत के लगभग 50% LNG आयात की आपूर्ति भी करता है, जो यूरिया उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण फीडस्टॉक है।
- आयात स्रोतों का विविधीकरण: रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र, फ़िनलैंड, टोगो जैसे देशों से आयात करने पर विचार किया जा रहा है।
- भारत वैश्विक स्तर पर उर्वरकों का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता और तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है।
- यूरिया, DAP, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश (NPKs) तथा सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) सहित उर्वरकों का कुल घरेलू उत्पादन 2025 में बढ़कर 524.62 लाख टन हो गया है।
Article Sources
1 sourceभारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) ने बीमा क्षेत्रक के लिए Ind AS आधारित वित्तीय रिपोर्टिंग ढांचा पेश किया है।
- इसका उद्देश्य भारतीय बीमा क्षेत्रक को विश्व स्तर पर स्वीकृत मानकों के अनुरूप करना है।
- यह जीवन, सामान्य, स्वास्थ्य बीमाकर्ताओं और पुनर्बीमाकर्ताओं सहित सभी श्रेणियों पर लागू होता है।
Ind AS ढांचे के बारे में:
- परिचय: ये भारत में स्थानीय लेखांकन प्रणालियों को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग मानकों (IFRS) के साथ सामंजस्य स्थापित करने के लिए लागू किए गए मानक हैं।
- प्राथमिक लक्ष्य: भारतीय कंपनियों द्वारा तैयार किए गए वित्तीय विवरणों को वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कराना सुगम बनाना, पारदर्शिता और विश्वसनीयता बढ़ाना।
- कार्यान्वयन: इसे कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय (MCA) द्वारा कार्यान्वित किया जाता है।
एक अध्ययन में 'रेडिएटिव फोर्सिंग-आधारित लेखांकन' (RFA) नामक एक नए फ्रेमवर्क का प्रस्ताव दिया गया है। यह कार्बन ऑफसेट क्रेडिट में अलग-अलग गैसों की तुलना करने के लिए एक नया तरीका प्रदान करता है।
- जलवायु कार्यवाही नीति वर्तमान में विभिन्न ग्रीनहाउस गैसों की तुलना करने के लिए "कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य" (CO2e) का उपयोग करती है। यह मानक 100 वर्षों के 'ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल' (GWP100) नामक मेट्रिक पर निर्भर करता है।
रेडिएटिव फोर्सिंग फ्रेमवर्क के बारे में:
- रेडिएटिव फोर्सिंग: यह पृथ्वी द्वारा अवशोषित सौर ऊर्जा और अंतरिक्ष में वापस विकीर्ण होने वाली ऊर्जा के बीच का कुल अंतर है।
- पारंपरिक तरीकों में एक तय 100 साल का निश्चित गुणांक (multiplier) का उपयोग किया जाता है। लेकिन RFA में ग्रीनहाउस गैसों के असर को उनके वास्तविक समय के अनुसार मापा जाता है।
- यानी यह देखा जाता है कि गैस समय के साथ कितनी गर्मी (विकिरण बल/radiative forcing) उत्पन्न कर रही है। और इसे एक तय नीतिगत समय सीमा के आधार पर आंका जाता है।
- पारंपरिक तरीकों में एक तय 100 साल का निश्चित गुणांक (multiplier) का उपयोग किया जाता है। लेकिन RFA में ग्रीनहाउस गैसों के असर को उनके वास्तविक समय के अनुसार मापा जाता है।
- इस नए फ्रेमवर्क (RFA) का एक बड़ा लाभ यह है कि यह मीथेन के प्रभाव को सटीक तरीके से मापता है। इसके कारण, पुराने तरीकों की तुलना में 36% से 40% तक ज्यादा कार्बन क्रेडिट मिल सकते हैं।
वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) ने एक स्वदेशी बायो-बिटुमेन तकनीक हस्तांतरित की है, ताकि इसे उद्योगों द्वारा बड़े पैमाने पर अपनाया जा सके।
- यह तकनीक CSIR-CRRI (केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान) और CSIR-IIP (भारतीय पेट्रोलियम संस्थान) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई है।
- इस तकनीक को विशेष रूप से केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) द्वारा पूरे भारत में सड़क निर्माण में उपयोग के लिए विकसित किया गया है।
बायो-बिटुमेन के बारे में:
- प्रक्रिया: यह पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन के नवीकरणीय और पर्यावरण अनुकूल विकल्प के रूप में विकसित किया गया है। इसके उत्पादन के लिए कृषि बायोमास और फसल अवशेषों का उपयोग फीडस्टॉक के रूप में किया जाता है।
- बिटुमेन: यह कच्चे तेल के शोधन (या प्राकृतिक निक्षेप) से प्राप्त अत्यधिक चिपचिपा, काला और जलरोधक हाइड्रोकार्बन पदार्थ है।
- महत्व:
- लागत और आयात पर निर्भरता में कमी,
- कार्बन उत्सर्जन में कमी, तथा
- ग्रामीण/कृषि अपशिष्ट का उपयोग।
Article Sources
1 sourceकेंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने 'भवसागर रेफरल सेंटर' को आधिकारिक तौर पर 'गहरे समुद्री जीवों के लिए राष्ट्रीय रिपॉजिटरी' का दर्जा दिया है।
- यह मान्यता जैव-विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत प्रदान की गई है।
भवसागर के बारे में:
- यह कोच्चि (केरल) में 'सेंटर फॉर मरीन लिविंग रिसोर्सेज एंड इकोलॉजी' (CMLRE) में स्थित है।
- CMLRE केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत कार्य करता है।
- उद्देश्य: यह भारत की गहरे समुद्र की जैविक विरासत के संरक्षण, अध्ययन और दस्तावेजीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय केंद्र के रूप में कार्य करेगा।
- महत्व: यह भारत की "ब्लू इकोनॉमी" (नीली अर्थव्यवस्था) और समुद्री जैव विविधता फ्रेमवर्क को मजबूत करता है।
- मुख्य दायित्व:
- सुरक्षित संरक्षण: जैविक नमूनों एवं DNA अनुक्रमों का भविष्य के वैज्ञानिक संदर्भ हेतु संरक्षण।
- टाइप स्पेसिमेन का संरक्षण: भारतीय जलक्षेत्र में खोजी गई गहरे समुद्र की नई प्रजातियों के आधिकारिक संरक्षक के रूप में कार्य करना।
- क्षमता निर्माण: गहरे समुद्र की प्रजातियों की वर्गिकी में विशेषज्ञता का विकास, ताकि संयुक्त राष्ट्र महासागर विज्ञान दशक (2021–2030) के अनुरूप प्रगति हो सके।
- गहरे समुद्र की जीव-जंतुओं की स्थिति: भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के अनुसार 2021 तक भारत में गहरे समुद्र की 4,371 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें 1,032 प्रजातियाँ प्रोटिस्टा (Protista) तथा 3,339 प्रजातियाँ ऐनिमेलिया (Animalia) वर्ग के अंतर्गत आती हैं।
Article Sources
1 sourceकेंद्र सरकार ने ECMS के तहत ₹7,104 करोड़ के 29 निवेश प्रस्तावों को मंजूरी दी है।
इलेक्ट्रॉनिक्स घटक विनिर्माण योजना के बारे में:
- शुभारंभ: इसे केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा 2025 में प्रारंभ किया गया था। इसके लिए छह साल की अवधि (वित्तीय वर्ष 2026-2032) हेतु ₹40,000 करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया है।
- उद्देश्य: इसका उद्देश्य घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उद्योग को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (GVCs) के साथ एकीकृत करना है। इसके तहत मूल्य श्रृंखला में वैश्विक और घरेलू निवेश को आकर्षित करके एक सुदृढ़ इलेक्ट्रॉनिक्स-घटक विनिर्माण प्रणाली विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
- प्रोत्साहन के प्रकार: यह योजना उप-संयोजनों (सब-असेंबली), एकल घटकों और आपूर्ति श्रृंखला प्रणाली के विकास के लिए टर्नओवर से संबद्ध, पूंजीगत व्यय से संबद्ध और हाइब्रिड प्रोत्साहन प्रदान करती है।
- लक्षित क्षेत्र: यह उच्च-मूल्य वाले घटकों पर ध्यान केंद्रित करती है। उदाहरण के लिए, इसमें PCBs, कैमरा/डिस्प्ले मॉड्यूल और लिथियम-आयन सेल शामिल हैं।
Article Sources
1 sourceरमन रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRI) के वैज्ञानिकों ने एक दूरस्थ ULX से ऊर्जा के दुर्लभ और बार-बार होने वाले विस्फोटों का विश्लेषण किया है।
ULX के बारे में:
- ULXs ऐसी प्रणालियां हैं, जिनमें एक सघन पिंड (जैसे ब्लैक होल या न्यूट्रॉन स्टार) अपने साथी तारे से पदार्थ को खींचता है।
- "इस प्रक्रिया को अक्रीशन के रूप में जाना जाता है। इसके माध्यम से भारी मात्रा में ऊर्जा निर्मुक्त होती है।"
- कुछ मामलों में, ये स्रोत एडिंगटन सीमा (Eddington limit) से 100 गुना अधिक चमक प्राप्त कर लेते हैं। सैद्धांतिक रूप से "एडिंगटन सीमा” किसी वस्तु द्वारा प्राप्त की जा सकने वाली अधिकतम चमक है। यह सीमा भौतिकी के सिद्धांतों पर आधारित है।