इस विधेयक पर विचार करने के लिए प्रारंभ में इसे एक चयन समिति को भेजा गया था। समिति के विचारोपरांत इसे संसद में पेश किया गया था। इस विधेयक के द्वारा दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 में संशोधन किया गया है।
- इस संशोधन के निम्नलिखित उद्देश्य हैं;
- दिवाला समाधान प्रक्रिया में देरी को कम करना,
- सभी हितधारकों के लिए अधिकतम संपत्ति वापसी (रिकवरी) सुनिश्चित करना, और
- दिवाला समाधान के लिए वैश्विक सर्वोत्तम कार्य-प्रणालियों को लागू करना।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान
- नई ‘ऋणदाता-प्रेरित दिवाला समाधान प्रक्रिया (Creditor-Initiated Insolvency Resolution Process: CIIRP): इसमें पहले की कम उपयोग की जाने वाली “फास्ट-ट्रैक” प्रक्रिया की जगह ‘आउट-ऑफ-कोर्ट’ प्रक्रिया प्रारंभ मॉडल का प्रावधान किया गया है।
- समूह दिवाला समाधान फ्रेमवर्क: इसमें “स्वैच्छिक समूह दिवाला समाधान फ्रेमवर्क” का प्रावधान है। इसके तहत जब एक ही कॉर्पोरेट समूह की कई कंपनियां आर्थिक परेशानी (दिवाला) में हों, तो उन्हें अलग-अलग नहीं बल्कि साथ में दिवाला-समाधान की सुविधा दी जाएगी।
- सीमा-पार दिवाला-समाधान फ्रेमवर्क: इसमें सीमा-पार (विदेशों में) दिवाला-समाधान के लिए एक बुनियादी व्यवस्था का प्रावधान है। यदि कोई कंपनी भारत में दिवालिया होती है लेकिन उसकी संपत्ति विदेशों में भी है, तो अब उन संपत्तियों तक पहुँचना और उनका उपयोग करना आसान होगा। यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है।
- क्लीन स्लेट सिद्धांत (Clean Slate Principle) को मजबूती: जब किसी कंपनी के लिए समाधान योजना स्वीकृत हो जाती है, तो उस कंपनी के खिलाफ पुराने सभी दावे खत्म माने जाएंगे — जब तक कि योजना में अलग से कुछ न लिखा हो।
- राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) के लिए सख्त समय-सीमा:
- NCLT को डिफॉल्ट के पुख्ता प्रमाण मिलने पर 14 दिनों के भीतर ‘कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP)’ से जुड़े मामले स्वीकार करने होंगे।
- राष्ट्रीय कम्पनी विधि अपील अधिकरण (NCLAT) को 3 महीने में अपीलों का निपटारा करना होगा।
- अन्य प्रावधान
- परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया को 180 दिनों में पूरा करने की समय-सीमा तय की गई है, जिसे आगे अधिकतम 90 दिनों तक बढ़ाया जा सकता है।
- दिवाला समाधान पेशेवरों की स्वतः नियुक्ति नहीं होगी।
- ऋणदाताओं की समिति (Committee of Creditors: CoC) को और अधिक सशक्त और जवाबदेह बनाया गया है।