उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने जनहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • सामाजिक न्याय के उद्देश्य से दायर की गई जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग व्यक्तिगत, प्रचार या राजनीतिक लाभ के लिए तेजी से किया जा रहा है, जिससे जनता का विश्वास कम हो रहा है।
  • जनहित याचिकाओं की शुरुआत अमेरिका में हुई थी, लेकिन भारत में इनकी शुरुआत न्यायमूर्ति भगवती और अय्यर ने की थी, जिनमें पहला मामला हुसैनारा खातून (1979) था।
  • चुनौतियों में न्यायिक बोझ, संभावित अतिचार और अनुच्छेद 32/226 के तहत सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट की शक्तियों के बावजूद उदार लोकस स्टैंडी का दुरुपयोग शामिल है।

In Summary

एक मामले की सुनवाई के दौरान एक न्यायाधीश ने कहा कि जनहित याचिका (PIL), जिसे मूल रूप से सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने और न्याय तक पहुंच आसान बनाने के लिए शुरू की गई, अब धीरे-धीरे गलत तरीके से इस्तेमाल हो रही है। इसे निजी स्वार्थप्रचार (पब्लिसिटी), राजनीतिक लाभ और यहां तक कि पैसे कमाने (पैसा हित याचिका) के उद्देश्य से भी दाखिल की जा रही है। 

जनहित याचिका (PIL) के बारे में

  • परिभाषा: यह ऐसी याचिका होती है, जिसे कोई भी व्यक्ति या संस्था, भले ही वह प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित न हो, लोक हित की रक्षा के लिए न्यायालय में दाखिल कर सकती है।
  • उत्पत्ति: PIL की अवधारणा का विकास 19वीं शताब्दी के अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ, जिसमें ‘गिदोन का मामला (Gideon’s case)’ एक महत्वपूर्ण आधार बना।
    • भारत में PIL के विकास में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • भारत में जनहित याचिका (PIL) का पहला प्रमुख उदाहरण 1979 के हुसैनारा खातून वाद में देखा गया, जब न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती ने 70 विचाराधीन कैदियों की रिहाई का आदेश दिया। 
  • संवैधानिक प्रावधान: उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को क्रमशः अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत PIL स्वीकार करने का अधिकार है। 

मुख्य चुनौतियां

  • PIL का दुरुपयोग: अक्सर प्रचार पाने, व्यक्तिगत लाभ या प्रतिशोध की राजनीति के लिए PIL का दुरुपयोग किया जाता है। इससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर होता है। 
  • न्यायपालिका पर बोझ: PIL मामलों को अन्य लंबित मामलों की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है। इससे न्यायालयों पर दबाव बढ़ता है और अन्य मामलों के निस्तारण में देरी होती है।
  • न्यायिक अतिक्रमण से संबंधित चिंताएं: PIL को लेकर यह आलोचना होती है कि न्यायपालिका कभी-कभी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर चली जाती है। साथ ही, न्यायालय के आदेशों के क्रियान्वयन में भी कई बार कठिनाइयां आती हैं।
  • अन्य चुनौतियां: 
    • तुच्छ याचिकाएं: बिना ठोस आधार के या केवल समय और संसाधनों को बर्बाद करने के लिए दाखिल की गई याचिकाएं।
    • उदार 'लोकस स्टैंडी’ का दुरुपयोग: PIL में किसी भी व्यक्ति को याचिका दायर करने की छूट देने का गलत इस्तेमाल होता है, जिससे निजी या स्वार्थपूर्ण मामलों को जनहित के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। 
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लोकस स्टैंडी

किसी मामले में याचिका दायर करने या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होने का अधिकार। PIL के तहत, 'उदार लोकस स्टैंडी' का अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति जनहित में याचिका दायर कर सकता है, जिसका कभी-कभी दुरुपयोग होता है।

अनुच्छेद 226

भारतीय संविधान का वह अनुच्छेद जो उच्च न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार देता है, जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के प्रवर्तन के लिए जनहित याचिका (PIL) स्वीकार करने की शक्ति शामिल है।

अनुच्छेद 32

भारतीय संविधान का वह अनुच्छेद जो सर्वोच्च न्यायालय को रिट जारी करने का अधिकार देता है, जिसमें नागरिकों के मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए जनहित याचिका (PIL) स्वीकार करने की शक्ति शामिल है।

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