एक मामले की सुनवाई के दौरान एक न्यायाधीश ने कहा कि जनहित याचिका (PIL), जिसे मूल रूप से सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने और न्याय तक पहुंच आसान बनाने के लिए शुरू की गई, अब धीरे-धीरे गलत तरीके से इस्तेमाल हो रही है। इसे निजी स्वार्थ, प्रचार (पब्लिसिटी), राजनीतिक लाभ और यहां तक कि पैसे कमाने (पैसा हित याचिका) के उद्देश्य से भी दाखिल की जा रही है।
जनहित याचिका (PIL) के बारे में
- परिभाषा: यह ऐसी याचिका होती है, जिसे कोई भी व्यक्ति या संस्था, भले ही वह प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित न हो, लोक हित की रक्षा के लिए न्यायालय में दाखिल कर सकती है।
- उत्पत्ति: PIL की अवधारणा का विकास 19वीं शताब्दी के अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका में हुआ, जिसमें ‘गिदोन का मामला (Gideon’s case)’ एक महत्वपूर्ण आधार बना।
- भारत में PIL के विकास में न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती और न्यायमूर्ति वी. आर. कृष्ण अय्यर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- भारत में जनहित याचिका (PIL) का पहला प्रमुख उदाहरण 1979 के हुसैनारा खातून वाद में देखा गया, जब न्यायमूर्ति पी. एन. भगवती ने 70 विचाराधीन कैदियों की रिहाई का आदेश दिया।
- संवैधानिक प्रावधान: उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को क्रमशः अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत PIL स्वीकार करने का अधिकार है।
मुख्य चुनौतियां
- PIL का दुरुपयोग: अक्सर प्रचार पाने, व्यक्तिगत लाभ या प्रतिशोध की राजनीति के लिए PIL का दुरुपयोग किया जाता है। इससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कमजोर होता है।
- न्यायपालिका पर बोझ: PIL मामलों को अन्य लंबित मामलों की तुलना में प्राथमिकता दी जाती है। इससे न्यायालयों पर दबाव बढ़ता है और अन्य मामलों के निस्तारण में देरी होती है।
- न्यायिक अतिक्रमण से संबंधित चिंताएं: PIL को लेकर यह आलोचना होती है कि न्यायपालिका कभी-कभी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर चली जाती है। साथ ही, न्यायालय के आदेशों के क्रियान्वयन में भी कई बार कठिनाइयां आती हैं।
- अन्य चुनौतियां:
- तुच्छ याचिकाएं: बिना ठोस आधार के या केवल समय और संसाधनों को बर्बाद करने के लिए दाखिल की गई याचिकाएं।
- उदार 'लोकस स्टैंडी’ का दुरुपयोग: PIL में किसी भी व्यक्ति को याचिका दायर करने की छूट देने का गलत इस्तेमाल होता है, जिससे निजी या स्वार्थपूर्ण मामलों को जनहित के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
