प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने केयर इकोनॉमी पर वर्किंग पेपर जारी किया | Current Affairs | Vision IAS

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In Summary

  • भुगतान सहित/बिना भुगतान वाली कल्याणकारी गतिविधियों को समाहित करने वाली देखभाल अर्थव्यवस्था महत्वपूर्ण है, जिसमें अवैतनिक देखभाल का मूल्य भारत के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15-17% है।
  • सिफारिशों में अभिनव वित्तपोषण (परिवार सेवा कोष, केयरप्रेन्योर फंड), पीपीपी, लिंग-तटस्थ अवकाश और शहरी नियोजन में देखभाल सुविधाओं को एकीकृत करना शामिल है।
  • औपचारिक देखभाल अर्थव्यवस्था का विकास आर्थिक अवसर प्रदान करता है, लैंगिक असंतुलन और जनसांख्यिकीय बदलावों को संबोधित करता है, साथ ही अनौपचारिक देखभाल कार्यबल को औपचारिक रूप देता है।

In Summary

इस कार्यपत्र (वर्किंग पेपर) में एक व्यापक बदलाव की सिफारिश की गई है। इसमें ‘देखभाल’ यानी ‘केयर’ को निजी घरेलू जिम्मेदारी के बजाय एक मूलभूत सामाजिक और आर्थिक अवसंरचना के रूप में मानने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। 

केयर इकोनॉमी के बारे में

  • इसे ‘पर्पल इकोनॉमी’ भी कहा जाता है। 
  • इसमें बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों (PwDs) के कल्याण के लिए आवश्यक कार्य (सवैतनिक या अवैतनिक) शामिल हैं।
  • जीडीपी में योगदान: अवैतनिक घरेलू और देखभाल कार्य (मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाने वाला) का मूल्य, भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 15-17% के बराबर है। 

EAC-PM की सिफारिशें

  • नवाचारी वित्तपोषण व्यवस्था:
    • परिवार सेवा कोष (Family Care Fund) की स्थापना: इससे समुदाय द्वारा संचालित देखभाल अवसंरचनाओं और सेवाओं को वित्तपोषण प्रदान किया जाएगा।
    • केयरप्रेन्योर फंड: केयर इकोनॉमी क्षेत्रक के उद्यमियों के लिए रियायती दर पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।
    • PPP (सार्वजनिक-निजी भागीदारी) का लाभ उठाना: जैसे, विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित तमिलनाडु का “महिला रोजगार और सुरक्षा कार्यक्रम”, जिसका उद्देश्य कामकाजी महिलाओं के बच्चों की देखभाल (चाइल्डकेयर) की सुविधा उपलब्ध कराना है।
  • केयर वर्कफोर्स (देखभाल कार्यबल) तैयार करना: आवश्यक कौशल में कमी का आकलन करना चाहिए तथा मानकीकृत प्रशिक्षण और प्रमाणन प्रदान करने चाहिए। 
  • नीतिगत सुधार:
    • लैंगिक-तटस्थ यानी महिलाओं और पुरुषों को चाइल्डकेयर अवकाश: चरणबद्ध सुधार के तहत पितृत्व अवकाश को निजी क्षेत्र में भी लागू करना चाहिए और आगे चलकर संतुलित अभिभावकीय (parental) अवकाश की सुविधा दी जानी चाहिए।
    • शहरी योजना में समावेशन: देखभाल से जुड़ी सुविधाओं को आवश्यक सामाजिक अवसंरचना के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
    • मातृत्व लाभ की सुविधा को सुदृढ़ करना: उदाहरण के लिए, सिक्किम में निजी क्षेत्र में कार्य करने वाली माताओं को मासिक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। यह मॉडल देश भर में लागू किया जा सकता है। 
    • अन्य: 
      • केयर कोऑपरेटिव्स (देखभाल सहकारी समितियों) के गठन का समर्थन किया गया है; 
      • सरकारी स्कूलों के भीतर ही बाल-देखभाल केंद्रों की स्थापना करनी चाहिए; 
      • गुणवत्ता आश्वासन तंत्र की स्थापना करनी चाहिए, आदि। 

औपचारिक क्षेत्र के रूप में ‘केयर इकोनॉमी’ के विकास की आवश्यकता

  • आर्थिक अवसर: इस क्षेत्रक में जीडीपी का 2% निवेश करने से 1.1 करोड़ रोजगार के अवसर उत्पन्न हो सकते हैं (मुख्य रूप से महिलाओं के लिए)।
    • उदाहरण के लिए: भारत को 2050 तक 3.1-3.8 करोड़ औपचारिक देखभाल कर्मियों की आवश्यकता होगी।
  • लैंगिक असंतुलन: महिलाएं अवैतनिक घरेलू कार्य पर प्रतिदिन लगभग 289 मिनट व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष केवल 88 मिनट व्यतीत करते हैं। इससे महिलाओं के पास शिक्षा और रोजगार के लिए समय कम बचता है। इसे ‘टाइम पावर्टी’ कहा जाता है।
  • जनसांख्यिकीय बदलाव और वृद्धावस्था: वर्ष 2050 तक कुल आबादी में  बुजुर्गों की आबादी लगभग 10% से बढ़कर 21% हो जाएगी, जबकि बच्चों की हिस्सेदारी 24% से घटकर 18% रह जाएगी।
  • पारंपरिक सहायता व्यवस्था  का कमजोर होना: शहरीकरण और एकल परिवारों के कारण अतिरिक्त देखभाल अवसंरचना की आवश्यकता है। 
  • अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यबल: देखभाल कार्य करने वाले जैसे- आशा कार्यकर्ताओं और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को कार्य का भारी बोझ झेलना पड़ता है, उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का सीमित लाभ मिलता है, और नियमित वेतन की जगह केवल मानदेय दिया जाता है।
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