वैश्य टेकरी में मौर्य काल का एक विशाल बौद्ध स्तूप है, जिसकी 1938–39 में आंशिक खुदाई की गई थी। माना जाता है कि यह स्तूप सांची के महान स्तूप से भी बड़ा हो सकता है।
- यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा संरक्षित केंद्रीय संरक्षित पुरातात्विक स्थल है।
स्तूप के बारे में
- स्तूप मूल रूप से एक मिट्टी का टीला है, जिसमें बुद्ध के अवशेष, उनके शरीर के अवशेष या उनसे जुड़ी वस्तुएं रखी गईं होती हैं।
- स्तूप बनाने की परंपरा संभवतः बौद्ध धर्म से भी पहले की रही होगी।
- अशोकावदान के अनुसार, सम्राट अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर महत्वपूर्ण नगरों में भेजा और उन पर स्तूप बनवाने का आदेश दिया।
स्तूप के प्रमुख भाग

- अंड (Anda): अर्धगोलाकार टीला, जो मूल मिट्टी के टीले से विकसित हुआ।
- हर्मिका: अंड के ऊपर बनी बालकनी (जंगला) जैसी संरचना, जिसे देवताओं के निवास का प्रतीक माना जाता है।
- यष्टि: हर्मिका से ऊपर उठने वाला खंभा या स्तंभ।
- छत्री: यष्टि के ऊपर बनी छतरी।
- वेदिका/रेलिंग: पवित्र क्षेत्र को सामान्य या सांसारिक क्षेत्र से अलग करती थी।
- तोरण: प्रवेश द्वार, जिस पर प्रायः सुंदर नक्काशी की जाती थी।
- प्रदक्षिणापथ: स्तूप के चारों ओर परिक्रमा के लिए बनाया गया मार्ग।
स्तूपों के प्रमुख प्रकार
- अवशेष स्तूप: इनमें बुद्ध, उनके शिष्यों या बौद्ध भिक्षुओं के अवशेष रखे गए हैं। उदाहरण के लिए: पिपरहवा स्तूप, उत्तर प्रदेश।
- वस्तु स्तूप/परिभोगिक स्तूप: इनमें बुद्ध या बौद्ध आचार्यों से जुड़ी पवित्र वस्तुओं को सुरक्षित रखा जाता है। उदाहरण के लिए: केसरिया स्तूप, बिहार।
- स्मारक स्तूप/उद्देशिका स्तूप: बुद्ध के जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण घटनाओं या स्थानों की स्मृति में बनाए गए हैं। उदाहरण के लिए: सारनाथ का धर्मराजिका स्तूप और बोधगया का अशोककालीन स्तूप।
- प्रतीकात्मक स्तूप: ये बुद्ध और उनके धम्म के प्रतीक के रूप में बनाए गए हैं। इनमें अवशेष होना आवश्यक नहीं है।
- पूजार्थक/संकल्पित स्तूप: ये तीर्थयात्रियों या उपासकों द्वारा महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों पर लघु स्तूपों के रूप में बनाए गए हैं।