पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, लोकसभा ने अपने निर्धारित समय का केवल 15% ही कार्य किया, जबकि राज्यसभा ने केवल 33% निर्धारित समय तक कार्य किया।
संसदीय कार्यों में कमी के कारण
- बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण: राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाने की कमी के कारण संसद में व्यवधान एक सामान्य रणनीति बन गया है। उदाहरण के लिए: NEET पेपर लीक का मुद्दा।
- संसदीय समितियों की भूमिका में कमी: 18वीं लोकसभा में 2026 के मानसून सत्र तक केवल 21% विधेयकों को संसदीय समितियों के पास भेजा गया।
- लोकसभा द्वारा पारित 11 विधेयकों में से 9 विधेयक ऐसे थे, जिन पर किसी मंत्री के अलावा किसी अन्य सांसद ने चर्चा नहीं की।
- कार्यपालिका का अतिक्रमण: सरकार ने विधेयकों को पारित कराने के लिए बार-बार अध्यादेश का सहारा लिया और धन विधेयक के प्रावधान का दुरुपयोग करके राज्यसभा की जांच और समीक्षा की शक्ति की उपेक्षा की।
- लॉजिस्टिक/सहायक संसाधनों की कमी: भारतीय सांसदों के पास अमेरिका की कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (CRS) जैसी स्वतंत्र और सुदृढ़ अनुसंधान एवं सूचना सेवाओं तक पर्याप्त पहुँच नहीं है।
- राजनीति का अपराधीकरण: ADR के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में 46% उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे।
संसदीय कार्यों में कमी का प्रभाव
- शीघ्रता में कानून बनना: पर्याप्त बहस और चर्चा के बिना कानून बनाने से कानून या अधिनियम की भाषा अस्पष्ट, प्रावधान कमजोर और उनका क्रियान्वयन प्रभावी नहीं हो पाता है।
- वित्तीय जवाबदेही में कमी: 2023 में बजट के केवल 11% व्यय की विस्तृत जांच हुई। वहीं, 75% से अधिक अनुदान मांगें बिना चर्चा के पारित कर दी गई।
- न्यायिक अतिक्रमण: जब विधायिका किसी विषय पर कानून बनाने में विफल रहती है, तो विधिक रिक्तता को भरने के लिए न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, विशाखा दिशानिर्देश।
- कार्यपालिका की जवाबदेही कमजोर होना: प्रश्नकाल और शून्यकाल में व्यवधान या इनके सीमित होने से सरकार के कार्यों की समुचित जांच नहीं हो पाती है और कार्यपालिका की संसद के प्रति जवाबदेही कम होती है।
संसदीय कार्य-संचालन में सुधार के उपाय |
न्यूनतम बैठक दिवस अनिवार्य करना: संविधान के कार्यकरण की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) ने सिफारिश की थी कि संसद को संवैधानिक रूप से प्रत्येक वर्ष कम-से-कम 100 दिनों के लिए बैठक करना अनिवार्य किया जाना चाहिए। |
दल-बदल विरोधी कानून में सुधार: विधि आयोग ने सुझाव दिया है कि दल-बदल विरोधी प्रावधानों को केवल अविश्वास प्रस्ताव और धन विधेयकों पर मतदान के दौरान लागू करने तक सीमित किया जाना चाहिए। |
आचार संहिता को संस्थागत बनाना: संसदीय कार्यवाही को जानबूझकर बाधित करने वाले सदस्यों के वेतन में कटौती जैसे उपायों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। |
'विपक्षी दिवस' संबंधी ब्रिटिश मॉडल को अपनाना चाहिए: ऐसे निर्धारित दिवस होने चाहिए, जिनमें विपक्ष अपना एजेंडा तय करे। उदाहरण के लिए, ब्रिटिश संसद में विपक्ष को प्रतिवर्ष 20 दिवस आवंटित किए जाते हैं। |