इस विधेयक के माध्यम से खान और खनिज (विकास और विनियमन) (MMDR) अधिनियम, 1957 में संशोधन किया गया है। इस विधेयक का उद्देश्य राज्यों की खनिजों पर कर लगाने की शक्तियों को सीमित करना और खनिज क्षेत्र में वित्तीय एकरूपता सुनिश्चित करना है।
MMDR अधिनियम, 1957 के बारे में
- MMDR अधिनियम, 1957 केंद्र सरकार को कोयला, लौह अयस्क और बॉक्साइट जैसे प्रमुख खनिजों (मेजर मिनरल्स) को विनियमित करने का अधिकार देता है। वहीं, इमारती (भवन निर्माण) पत्थर, बजरी, साधारण मिट्टी जैसे लघु खनिजों (माइनर मिनरल्स) का विनियमन राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है।
विधेयक के प्रमुख प्रावधान
- खनिज-वाली भूमि: केंद्र सरकार को खनिज-युक्त भूमि को विनियमित करने का अधिकार दिया जाएगा। खनिज-युक्त भूमि का अर्थ ऐसी भूमि है, जिसमें खनिज उपस्थित हों और जिसे केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार पहचाना जाए।
- MMDR अधिनियम में नई धारा 9D: इस नई धारा के अनुसार राज्यों को खनिज अधिकारों या खनिज युक्त भूमि पर किसी भी प्रकार का कर, उपकर (Cess) या अन्य शुल्क लगाने से रोकती है। यह रोक खनिज की मात्रा, खनिज के मूल्य, रॉयल्टी या किसी अन्य आधार पर लगाए जाने वाले शुल्क पर भी लागू होगी।
- हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों या प्रतिबंधों के अनुसार ऐसे कर या शुल्क लगाने की अनुमति दी जा सकती है।
- पुराने कर/शुल्क: संशोधन से पहले राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए लेकिन अभी तक वसूले नहीं गए या बकाया कर/शुल्क को अमान्य माना जाएगा। लेकिन जो राशि पहले ही जमा या वसूल की जा चुकी है, उसे वापस नहीं किया जाएगा।
- नियम बनाने की शक्ति (धारा 13): केंद्र सरकार यह निर्धारित करेगी कि राज्य सरकारें कर, उपकर या अन्य शुल्क किन शर्तों और प्रतिबंधों के तहत लगा सकती हैं।
अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
- उच्च और असमान कर बोझ: राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले अलग-अलग और एक के बाद एक लगने वाले करों के कारण खनन की लागत बढ़ गई। इससे लघु और मध्यम स्तर के खनन व्ययसायों पर अधिक बोझ पड़ा और कुछ खनन कार्य आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं रह गए।
- व्यवसाय और निवेश में अनिश्चितता: अचानक और पिछली अवधि से लागू (भूतलक्षी प्रभाव) कराधान ने खनन कंपनियों के संचालन को प्रभावित किया, निवेश को हतोत्साहित किया और निवेशकों का विश्वास कम किया।
- मुद्रास्फीति पर प्रभाव: खनिज निकालने की लागत बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ी, जिसका प्रभाव आगे चलकर उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ा।
- राज्यों के बीच करों में असमानता: अलग-अलग राज्यों में करों की दरों में अधिक अंतर होने के कारण खनन क्षेत्र में समान परिस्थितियां नहीं रहीं। इससे विभिन्न राज्यों में खनन की लागत और प्रतिस्पर्धा में असमानता पैदा हुई।
संवैधानिक रूपरेखा
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