यह रिपोर्ट कार्ड नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने जारी किया है। यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि आर्कटिक क्षेत्र शेष विश्व की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है।
आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर
- आर्कटिक सतह की वायु का तापमान: विगत वर्ष (अक्टूबर 2024 - सितंबर 2025) के दौरान 1900 के बाद से अब तक का सर्वाधिक तापमान दर्ज किया गया है।
- पिछले 10 वर्ष आर्कटिक के इतिहास के 10 सबसे गर्म वर्ष रहे हैं।
- अटलांटिफिकेशन (Atlantification): निचले अक्षांशों से असामान्य जल गुणों और जीवों का मध्य आर्कटिक महासागर में प्रवाह बढ़ रहा है।
- यह आर्कटिक महासागर के स्तरीकरण (stratification) को कमजोर करता है। इससे ऊष्मा का स्थानांतरण बढ़ता है, समुद्री बर्फ पिघलती है और समुद्री परिसंचरण पैटर्न के समक्ष खतरा उत्पन्न होता है।
- नदियों में रस्टिंग होना: आर्कटिक अलास्का में 200 से अधिक जलक्षेत्रों (watersheds) में सतह का जल नारंगी हो गया है। ऐसा पिघलते हुए पर्माफ्रॉस्ट से लौह धातु के निकलने के कारण हो रहा है, जो मछलियों और स्थानीय समुदायों को जलापूर्ति को प्रभावित कर रहा है।
- आर्कटिक में हरित आवरण उत्पन्न होना: इस परिवर्तन के बारे में पहली बार 1990 के दशक के अंत में पता चला था। यह बदलाव टुंड्रा वनस्पतियों की प्रचुरता और उत्पादकता में एक दीर्घकालिक वृद्धि है।
- इसका आर्कटिक परिदृश्य, वन्यजीव पर्यावास, जैव विविधता, पर्माफ्रॉस्ट की स्थिति और वहां के लोगों की आजीविका पर दूरगामी प्रभाव पड़ रहा है।
आर्कटिक में हिम के पिघलने के प्रमुख भू-राजनीतिक निहितार्थ
- नए पोत परिवहन मार्ग: पहले अगम्य रहे क्षेत्र अब तेजी से व्यवहार्य हो रहे हैं। उदाहरण के लिए- रूस के आर्कटिक तट से सटे कारा सागर से बेरिंग जलडमरूमध्य तक का उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR)।
- आर्कटिक परिषद की भूमिका: यह देशज समुदायों के संरक्षण और सहयोग बढ़ाने के लिए एक प्रमुख अंतर-सरकारी मंच है।
- 1996 में स्थापित इस परिषद में आठ सदस्य देश शामिल हैं। ये हैं- कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे, रूस, स्वीडन और संयुक्त राज्य अमेरिका।
- भारत के लिए महत्त्व: अपने अनुसंधान केंद्र 'हिमाद्रि' एवं आर्कटिक नीति के साथ, भारत इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी व अनुसंधान को और मजबूत कर सकता है।