नीति आयोग ने “किसानों का सशक्तीकरण: प्राकृतिक कृषि प्रशिक्षण टूलकिट और सर्वोत्तम अभ्यास मार्गदर्शिका” (Empowering Farmers: Natural Farming Training Toolkit & Best Practices Guide) शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है।
प्राकृतिक कृषि के बारे में
- यह एक रसायन मुक्त, पशुधन आधारित खेती प्रणाली है, जो पारिस्थितिक सिद्धांतों पर आधारित है।
- यह विधि जैव विविधता को अधिकतम करने के लिए फसलों, वृक्षों और जानवरों को एकीकृत करती है, जिससे पर्यावरणीय संरक्षण बना रहता है।
- यह खेत में और आसपास होने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करती है, जिससे बाहरी रासायनिक इनपुट की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
- यह इसे जैविक खेती (Organic Farming) से अलग करता है, क्योंकि जैविक खेती में बाहरी रूप से प्राप्त, प्रमाणित जैविक उर्वरकों और जैव-कीटनाशकों के उपयोग की अनुमति होती है।

प्राकृतिक कृषि के लाभ
- आर्थिक लाभ: प्रमुख फसलों में खेती की लागत को कम से कम 5-10% और कई मामलों में 20-55% तक कम करती है।
- विविध प्राकृतिक कृषि वाले खेत, पारंपरिक एकल-फसल (monocropped) वाले खेतों की तुलना में 20-40% अधिक निवल आय अर्जित कर सकते हैं।
- पर्यावरण और पारिस्थितिकी: ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को 55-85% तक कम करती है।
- यह संसाधनों का महत्वपूर्ण रूप से संरक्षण करती है, जिससे जल और बिजली में 50-60% की बचत होती है।
- मृदा स्वास्थ्य और अनुकूलन: यह मृदा जैविक कार्बन (SOC) को 45% तक बढ़ाती है और मृदा के लाभकारी सूक्ष्मजीवों का संवर्धन करती है।
- बेहतर मृदा स्वास्थ्य से जड़ों का विकास मजबूत होता है।
- स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा: सिंथेटिक कीटनाशकों और उर्वरकों से पूरी तरह बचाकर किसानों एवं उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की रक्षा करती है।
- पशुधन एकीकरण: पशुधन को कृषि-पारिस्थितिकी खेती प्रणाली में सीधे एकीकृत करके उन्हें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाती है, जहां उनके उप-उत्पादों (गोबर व मूत्र) का उपयोग खेत के आदानों (इनपुट) के रूप में किया जाता है।
प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर की पहलें
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