प्रधान मंत्री ने भारत में केयर इकोनॉमी (देखभाल अर्थव्यवस्था) के बढ़ते महत्व पर जोर दिया | Current Affairs | Vision IAS

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केयर इकोनॉमी क्या है?

  • केयर इकोनॉमी में वे सभी आवश्यक गतिविधियां शामिल हैं, जो लोगों की देखभाल और दैनिक जीवन को बनाए रखने के लिए संपन्न की जाती हैं, जैसे कि बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की देखभाल, घरेलू कार्य आदि।
  • यह भुगतान आधारित (जैसे घरेलू कामगार या नर्स) और बिना भुगतान वाला (जैसे घर की महिलाओं द्वारा खाना बनाना, सफाई या बच्चों की देखभाल) दोनों हो सकता है।
    • केयर इकोनॉमी का बड़ा हिस्सा बिना-भुगतान वाला है, इसलिए इसे जीडीपी में नहीं गिना जाता है। इसमें महिलाओं का बाहुल्य है। 
      • ILO के अनुसार वैश्विक स्तर पर 76% बिना-भुगतान वाला देखभाल कार्य महिलाओं द्वारा किया जाता है।

भारत में केयर इकोनॉमी के औपचारिकरण की आवश्यकता

  • जीडीपी में योगदान: महिलाओं के बिना-भुगतान वाले घरेलू और देखभाल कार्यों का आर्थिक मूल्य भारत की जीडीपी के 15% से 17% के बीच होने का अनुमान है। 
    • इसके अतिरिक्त, एक पेशेवर देखभाल तंत्र बनाने से भारत विश्व स्तर पर कुशल प्रतिभाओं का निर्यात कर सकेगा, जिससे विप्रेषण (remittances) के माध्यम से आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।
  • जनसांख्यिकीय परिवर्तन: 2050 तक, बुजुर्गों (60+ वर्ष) की आबादी दोगुनी होकर लगभग 21% होने का अनुमान है, जिन्हें देखभाल की आवश्यकता होगी।
  • महिला श्रम बल भागीदारी में वृद्धि: देखभाल कार्य का असमान बोझ (81% महिलाएं बनाम 26% पुरुष) महिलाओं को सवेतन कार्यबल से बाहर रखता है। 
    • सुलभ और किफायती देखभाल अवसंरचना महिलाओं की "समय आधारित गरीबी" (Time Poverty) को कम करने के लिए आवश्यक है, जिससे वे शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण में भाग ले सकेंगी।
  • रोजगार सृजन की क्षमता: भारत की जीडीपी के 2% के बराबर प्रत्यक्ष सार्वजनिक निवेश 11 मिलियन (1.1 करोड़) नौकरियां सृजित कर सकता है, जिनमें से लगभग 70% पद महिलाओं के लिए होंगे।

भारत में केयर इकोनॉमी के लिए की गई पहलें

  • सरकारी योजनाएं:
    • सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0: प्रारंभिक शिक्षा और पोषण के लिए।
    • मिशन शक्ति कार्यक्रम: इसमें पालना योजना शामिल है, जिसका लक्ष्य 17,000 नई आंगनवाड़ी-सह-क्रेच (शिशु गृह) स्थापित करना है।
    • अटल वयो अभ्युदय योजना: यह बुजुर्गों की सहायता के लिए है।
    • केंद्रीय बजट 2026-27: घरेलू जरूरतों और वैश्विक कमी को पूरा करने के लिए 1.5 लाख बहु-कुशल देखभालकर्ता को प्रशिक्षित करने के लिए एक रणनीतिक पहल की घोषणा की गई।
  • विधायी अधिदेश: 
    • मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम (2017): इसके तहत सवेतन मातृत्व अवकाश को दोगुना करके 26 सप्ताह कर दिया गया है और बड़े नियोक्ताओं के लिए क्रेच (शिशुगृह) सुविधा प्रदान करना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है।
  • गैर-सरकारी हस्तक्षेप: 
    • SEWA (सेवा): इसने अनौपचारिक श्रमिकों के लिए बाल देखभाल सहकारी समितियां स्थापित की हैं। 
    • मोबाइल क्रेच (Mobile Creches): इसने निर्माण स्थलों पर प्रवासी श्रमिकों के बच्चों के लिए डे-केयर केंद्र शुरू करने में अग्रणी भूमिका निभाई है।
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मोबाइल क्रेच (Mobile Creches)

यह एक गैर-सरकारी संगठन है जिसने विशेष रूप से निर्माण स्थलों पर प्रवासी श्रमिकों के बच्चों के लिए डे-केयर केंद्र स्थापित करने में अग्रणी भूमिका निभाई है, ताकि उनके माता-पिता काम कर सकें।

SEWA (सेवा)

Self-Employed Women's Association (SEWA) भारत में एक ट्रेड यूनियन और गैर-सरकारी संगठन है जो अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत महिला श्रमिकों के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए काम करता है। इसने बाल देखभाल सहकारी समितियों की स्थापना में भी भूमिका निभाई है।

मातृत्व लाभ संशोधन अधिनियम, 2017 (Maternity Benefit (Amendment) Act, 2017)

यह कानून भारत में महिला कर्मचारियों के लिए सवेतन मातृत्व अवकाश की अवधि को बढ़ाकर 26 सप्ताह करता है और बड़े नियोक्ताओं के लिए क्रेच (शिशुगृह) सुविधा प्रदान करना अनिवार्य बनाता है।

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