सुर्खियों में क्यों?
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने हाल ही में देखभाल अर्थव्यवस्था पर एक कार्य-पत्र जारी किया है।
अन्य संबंधित तथ्य
- इस कार्यपत्र में प्रतिमान परिवर्तन का आह्वान किया गया है, जिसके अंतर्गत देखभाल को निजी घरेलू जिम्मेदारी के बजाय सामाजिक और आर्थिक सार्वजनिक अवसंरचना के एक मूलभूत आधार के रूप में देखा जाना चाहिए।
देखभाल अर्थव्यवस्था या पर्पल इकोनॉमी के बारे में
- देखभाल अर्थव्यवस्था में सभी प्रकार की गतिविधियां शामिल होती हैं, चाहे वे सवैतनिक हों या अवैतनिक तथा प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष। इन गतिविधियों का उद्देश्य बच्चों, बुजुर्गों, दिव्यांग व्यक्तियों और अन्य लोगों की शारीरिक, मनोवैज्ञानिक तथा भावनात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है।
- अवैतनिक कार्य: रोगी जीवनसाथी की देखभाल करना, भोजन पकाना, सफाई करना, बच्चों की देखभाल करना, बिना पारिश्रमिक के कृषि कार्य करना तथा बुजुर्गों की देखभाल करना आदि। ये कार्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किए जाते हैं।
- सवैतनिक कार्य: बाल देखभाल केंद्रों, वृद्ध देखभाल संस्थानों और घरेलू कामगारों द्वारा मासिक वेतन के बदले किए जाने वाले कार्य आदि। पुरुषों द्वारा सवैतनिक कार्यों में महिलाओं की तुलना में लगभग 0.57 गुना अधिक समय व्यतीत किया जाता है।
प्रमुख चुनौतियां

- प्रणालीगत अदृश्यता: चूंकि देखभाल को प्रायः "प्रेम और स्नेह से किया गया अवैतनिक कार्य" माना जाता है, इसलिए इसे GDP की गणना में शामिल नहीं किया जाता है। उदाहरण के लिए, महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों का मूल्य भारत की GDP के लगभग 15 से 17 प्रतिशत के बराबर आंकलित किया गया है।
- लैंगिक असमानता: उदाहरण के लिए, महिलाएं प्रतिदिन लगभग 289 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्यों में व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुष केवल लगभग 88 मिनट ही व्यतीत करते हैं। इससे महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं तथा उन पर समय संबंधी दबाव बढ़ता है। (टाइम यूज सर्वेक्षण, 2024)
- नीतिगत समस्याएं: मातृत्व-केंद्रित नीतियां महिलाओं को मुख्य देखभालकर्ता के रूप में स्थापित करती हैं, जिससे भर्ती से संबंधित प्रोत्साहनों में असंतुलन उत्पन्न होता है, करियर में रुकावट आती है और वेतन असमानता बढ़ती है। उदाहरण के लिए, मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 के मुकाबले पितृत्व अवकाश से संबंधित कोई कानून मौजूद नहीं है।
- निजी क्षेत्रक में पितृत्व अवकाश की व्यवस्था नहीं है और केंद्रीय सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1999 के अंतर्गत केवल केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों को ही 15 दिनों का पितृत्व अवकाश दिया जाता है। वहीं, 10 से अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों में महिलाओं को 26 सप्ताह का मातृत्व अवकाश प्रदान किया जाता है।
- बाल देखभाल और वृद्ध देखभाल को रोजगार-सक्षम बनाने वाली आधारभूत संरचना के रूप में मान्यता नहीं दी गई है।
- सामाजिक सुरक्षा का अभाव: आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं जैसे अग्रिम पंक्ति के देखभाल कर्मियों को निश्चित वेतन और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। वहीं, घरेलू कामगारों को एक समर्पित कानून के अभाव में नियोक्ताओं पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता है।
- समर्पित वित्तपोषण का अभाव: भारत अपनी GDP का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा देखभाल अर्थव्यवस्था पर व्यय करता है। इसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक अवसंरचना कमजोर बनी हुई है और निजी देखभाल सेवाएं शहरी क्षेत्रों तक सीमित तथा आम लोगों के लिए महंगी हो गई हैं।
- खंडित शासन व्यवस्था: देखभाल को वित्त, श्रम और शहरी नियोजन मंत्रालयों से संबंधित एक व्यापक नीतिगत प्राथमिकता के बजाय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MoWCD) के अंतर्गत एक सीमित कल्याणकारी हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है।
- मानव संसाधनों की कमी: उदाहरण के लिए, भारत में 65 वर्ष या उससे अधिक आयु के प्रत्येक 100 व्यक्तियों पर केवल लगभग 5 औपचारिक देखभाल कर्मी उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त, देखभालकर्ता और बच्चों का अनुपात 1:50 है, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह अनुपात सामान्यतः 1:10 से 1:15 के बीच पाया जाता है।
देखभाल अर्थव्यवस्था के लिए सरकार की पहलें
- अटल वयो अभ्युदय योजना: यह बुजुर्गों के कल्याण के लिए एक व्यापक योजना है। इसके अंतर्गत आवासीय देखभाल सुविधाएं, राष्ट्रीय वयोश्री योजना (कम आय वाले वरिष्ठ नागरिकों को सहायक उपकरण उपलब्ध कराना) आदि शामिल हैं।
- पालना योजना (मिशन शक्ति के अंतर्गत): यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसके तहत 6 माह से 6 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए संस्थागत डे-केयर सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु आंगनवाड़ी-सह-क्रेच केंद्र स्थापित किए जाते हैं।
- सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0: यह योजना प्रारंभिक बाल देखभाल के लिए संचालित की जाती है, जिसके माध्यम से 6 वर्ष तक की आयु के बच्चों को पूरक पोषण, टीकाकरण और पूर्व-प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाती है।
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना: राष्ट्रीय कौशल विकास निगम (NSDC) के माध्यम से गृह प्रबंधन और देखभालकर्ता क्षेत्र कौशल परिषद जैसे संस्थानों द्वारा देखभाल संबंधी कार्यों के लिए प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है।
- भारत-जापान तकनीकी प्रशिक्षु प्रशिक्षण कार्यक्रम: इस कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय देखभाल कर्मियों को जापान के वृद्ध देखभाल क्षेत्र में कार्यस्थल पर प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिलता है, जिसके बाद वे भारत लौट आते हैं।
आगे की राह
देखभाल को सामाजिक और आर्थिक अवसंरचना में परिवर्तित करने के लिए प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) ने चार स्तंभों पर आधारित एक रूपरेखा प्रस्तुत की है।
स्तंभ 1: अभिनव वित्तपोषण
- परिवार सेवा कोष की स्थापना: वित्त मंत्रालय के अंतर्गत परिणाम-आधारित कोष स्थापित किया जाए, जिसका उद्देश्य समुदाय-आधारित बहु-पीढ़ी देखभाल सुविधाओं (केंद्र-आधारित तथा घर-आधारित बाल एवं वृद्ध देखभाल सेवाओं) को प्रोत्साहित करना हो।
- "केयरप्रेन्योर फंड" की स्थापना: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) द्वारा देखभाल क्षेत्र से जुड़े स्टार्टअप और सहकारी संस्थानों को रियायती वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।
स्तंभ 2: देखभाल कार्यबल का विकास
- प्रशिक्षण और प्रमाणन का मानकीकरण: देखभाल कार्यबल के पेशेवर विकास और विस्तार के लिए कौशल विकास मंत्रालय द्वारा प्रशिक्षण और प्रमाणन प्रक्रियाओं को मानकीकृत किया जाए।
- वैश्विक साझेदारियां: उदाहरण के लिए, विश्व बैंक द्वारा वित्तपोषित तमिलनाडु महिला रोजगार एवं सुरक्षा कार्यक्रम के माध्यम से कामकाजी महिलाओं के लिए बाल देखभाल सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
स्तंभ 3: नीतिगत सुधार
- साझा अभिभावकीय अवकाश: उदाहरण के लिए, सिक्किम में पितृत्व अवकाश की अवधि बढ़ाई गई है तथा निजी क्षेत्र में कार्यरत माताओं को मासिक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- शहरी नियोजन: नगरों की मास्टर योजनाओं में देखभाल सुविधाओं को "आवश्यक सामाजिक अवसंरचना" के रूप में शामिल किया जाए। इसके लिए भूमि आरक्षण, सरकारी विद्यालयों में बाल देखभाल केंद्रों की स्थापना (सामुदायिक निकटता और कम उपयोग किए जा रहे स्थानों के उपयोग के लिए) तथा परियोजनाओं के मूल्यांकन में देखभाल संबंधी संकेतकों को शामिल करने जैसे उपाय अपनाए जाएँ।
स्तंभ 4: गुणवत्ता आश्वासन
- सार्वजनिक, निजी और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) द्वारा संचालित सभी देखभाल सेवाओं के लिए कर्मचारियों के अनुपात, अवसंरचना और सुरक्षा से संबंधित राष्ट्रीय न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाएं। उदाहरण के लिए, MoWCD द्वारा क्रेच सुविधाओं के लिए निर्धारित राष्ट्रीय न्यूनतम मानक।
निष्कर्ष
एक सुदृढ़ देखभाल अर्थव्यवस्था केवल सामाजिक कल्याण का उपाय नहीं है, बल्कि यह एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक निवेश भी है, जो महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण रोजगार के अवसर सृजित करने तथा समावेशी विकास को बढ़ावा देने में सहायक हो सकता है। पर्याप्त वित्तीय सहायता, कुशल कार्यबल और लैंगिक दृष्टि से संवेदनशील नीतियों के माध्यम से देखभाल को एक आवश्यक सामाजिक अवसंरचना के रूप में मान्यता देने से भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का प्रभावी तरीके से उपयोग करने में सहायता मिलेगी। साथ ही, यह सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5 (लैंगिक समानता) और सतत विकास लक्ष्य (SDG) 8 (गरिमापूर्ण कार्य और आर्थिक संवृद्धि) की प्राप्ति में भी योगदान देगा।