सेहत (SEHAT) से आशय है; ‘साइंस एक्सीलेंस फॉर हेल्थ थ्रू एग्रीकल्चरल ट्रांसफॉर्मेशन' (कृषि परिवर्तन के ज़रिए स्वास्थ्य के लिए वैज्ञानिक उत्कृष्टता)’। यह भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की एक संयुक्त पहल है।
'सेहत' (SEHAT) पहल की मुख्य विशेषताएं
- विज़न: कृषि को केवल खाद्य उत्पादन प्रणाली से आगे बढ़ाकर भारत में पोषण, स्वास्थ्य एवं समग्र सेहतमंदी का सशक्त माध्यम बनाना।
- राष्ट्रीय महत्व के पांच प्राथमिकता वाले क्षेत्र:
- बायोफोर्टिफाइड और पोषक तत्वों से प्रचुर फसल किस्मों का विकास और मूल्यांकन: इससे कुपोषण को दूर करने और पोषण स्तर में सुधार करने में मदद मिलेगी।
- बायोफोर्टिफिकेशन: यह वह प्रक्रिया है जिसमें पारंपरिक पौध प्रजनन (प्लांट ब्रीडिंग), बेहतर कृषि तकनीकों या आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी की सहायता से खाद्य फसलों में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाई जाती है, बिना उनकी मूल विशेषताओं को प्रभावित किए।
- उदाहरण के लिए: खाद्य फसलों को जिंक, आयरन (लौह) और अन्य पोषक तत्वों से समृद्ध करना।
- बायोफोर्टिफिकेशन: यह वह प्रक्रिया है जिसमें पारंपरिक पौध प्रजनन (प्लांट ब्रीडिंग), बेहतर कृषि तकनीकों या आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी की सहायता से खाद्य फसलों में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाई जाती है, बिना उनकी मूल विशेषताओं को प्रभावित किए।
- बायोफोर्टिफाइड और पोषक तत्वों से प्रचुर फसल किस्मों का विकास और मूल्यांकन: इससे कुपोषण को दूर करने और पोषण स्तर में सुधार करने में मदद मिलेगी।

- एकीकृत कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देना: आहार विविधीकरण यानी दैनिक आहार में विभिन्न प्रकार के खाद्य समूहों को शामिल करने पर बल दिया जाएगा, कृषि आय में वृद्धि की जाएगी और जलवायु अनुकूलता विकसित की जाएगी।
- व्यवसाय से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का समाधान: कृषि श्रमिकों के बीच लक्षित और प्रमाण-आधारित उपायों के माध्यम से स्वास्थ्य संबंधी खतरों को कम जाएगा।
- गैर-संचारी रोगों (NCDs) की रोकथाम और प्रबंधन: फंक्शनल फूड्स और पोषण की दृष्टि से श्रेष्ठ फसल किस्मों को बढ़ावा देकर कृषि-आधारित रणनीतियों को बढ़ावा दिया जाएगा।
- 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण अपनाना: मानव-पशु-पर्यावरण के आपसी संबंधों पर एकीकृत निगरानी, जांच और अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा।
महत्व
- स्वास्थ्य-देखभाल सेवा में प्रतिक्रियात्मक एवं उपचारात्मक मॉडल के बजाय सक्रिय (Proactive), निवारक (Preventive) एवं समग्र (Holistic) दृष्टिकोण को बढ़ावा दिया गया है।
- अल्पपोषण और अतिपोषण के दोहरे बोझ तथा मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कैंसर जैसे गैर-संचारी रोगों के प्रसार से निपटने को प्राथमिकता दी गई है।
- “संपूर्ण सरकार” और “संपूर्ण व्यवस्था” आधारित दृष्टिकोण को अपनाकर विज्ञान, नीति निर्माण और क्रियान्वयन को एक साथ जोड़कर समन्वित तरीके से कार्य करने पर बल दिया गया है।

Article Sources
1 sourceहाल ही में आयोजित 17वें पीटर्सबर्ग जलवायु संवाद (Petersberg Climate Dialogue) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच बहुपक्षीय जलवायु कार्य-योजना के लिए प्रतिबद्धता दोहराई गई।
- पीटर्सबर्ग जलवायु संवाद जलवायु मुद्दों पर एक अनौपचारिक बहुपक्षीय वार्षिक बैठक है। इसकी शुरुआत जर्मनी ने 2010 में की थी। यह 2026 में प्रस्तावित UNFCCC-COP31 से पहले आयोजित होने वाली पहली प्रमुख जलवायु-मंत्रिस्तरीय बैठक थी।
जलवायु कार्य-योजना में बहुपक्षवाद की भूमिका
- जलवायु-एक वैश्विक सार्वजनिक संपदा : जलवायु परिवर्तन एक ऐसा सीमा-पार खतरा है, जिससे निपटना किसी एक देश की क्षमता से परे है। इसके प्रभाव और लाभ पूरे विश्व में फैले होते हैं, इसलिए इससे निपटने के लिए बहुपक्षीय सहयोग सबसे मूलभूत और आवश्यक तरीका है।
- सामूहिक शासन : यह वैश्विक जिम्मेदारियों को साझा करने के लिए नियम-आधारित एक व्यवस्था स्थापित करता है, एकपक्षीय कार्रवाई को रोकता है और समन्वित जलवायु कार्रवाई सुनिश्चित करता है। उदाहरण के लिए: राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs)।
- वार्ता मंच : संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन पर फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), संयुक्त राष्ट्र जैव-विविधता अभिसमय (UNCBD) और संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) जैसी व्यवस्थाएं जलवायु अनुकूलन और शमन रणनीतियों के विकास में मदद करती हैं।
- जलवायु न्याय का संरक्षण: यह वितरणात्मक समानता का संरक्षण करता है, जिसके तहत "साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों का सिद्धांत (Common But Differentiated Responsibilities - CBDR)" लागू किया जाता है। यह मानता है कि प्रत्येक देश की क्षमता और ऐतिहासिक उत्सर्जन स्तर अलग-अलग हैं।
- विभिन्न तंत्रों के माध्यम से वित्त जुटाना : उदाहरण के लिए 'वैश्विक पर्यावरण सुविधा' (GEF) और 'हरित जलवायु निधि' (Green Climate Fund: GCF) जैसे संस्थानों के माध्यम से।
मुख्य चुनौतियां
- निर्णय लेने में पंगुता: उदाहरण के तौर पर, UNFCCC में आम-सहमति आधारित निर्णय मॉडल अपनाने के कारण कई बार निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी या रुक जाती है।
- वित्तपोषण से संबंधित बाधाएं: विकसित देश प्रत्येक वर्ष 100 अरब डॉलर देने के वादे को पूरा नहीं कर पाए हैं।
- भू-राजनीतिक विभाजन: एकपक्षीय कार्रवाई (unilateralism) की प्रवृत्ति बढ़ गई है। जब देश अपने-अपने तरीके से निर्णय लेने लगते हैं और सहयोग कम हो जाता है, तो वैश्विक जलवायु नियम कमजोर पड़ जाते हैं। उदाहरण के तौर पर, संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रमुख जलवायु समझौतों/संस्थाओं से बाहर निकलने की घोषणा।
- अन्य चुनौतियां:
- एजेंडा तय करने में असमानता: विकसित देशों को अधिक लाभ होता है;
- प्रौद्योगिकीय संरक्षणवाद: नई प्रौद्योगिकी गरीब या विकासशील देशों को आसानी से नहीं मिलती।

कोलंबिया के सांता मार्टा में 'ट्रांजिशनिंग अवे फ्रॉम फॉसिल फ्यूल्स" पर प्रथम सम्मेलन' आयोजित हो रहा है। कोलंबिया और नीदरलैंड इसकी मेजबानी कर रहे हैं।
"ट्रांजिशनिंग अवे फ्रॉम फॉसिल फ्यूल्स" सम्मेलन के बारे में
- इसे 2025 में UNFCCC-COP30 के दौरान एक सतत राजनीतिक मंच के रूप में घोषित किया गया। इसका उद्देश्य जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को व्यवस्थित तरीके से चरणबद्ध समाप्ति के लिए ठोस और क्रियान्वयन-आधारित कदम उठाना है।
- यह कोई वार्ता निकाय नहीं है और न ही किसी औपचारिक वार्ता का हिस्सा है।
- इसका लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) का स्थान लेना नहीं है।
सम्मेलन के मुख्य बिंदु
- वैश्विक एनर्जी ट्रांजीशन के लिए विज्ञान पैनल (Science Panel for the Global Energy Transition - SPGET) प्रारंभ किया गया।
- यह सदी के अंत तक वैश्विक ताप वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के अनुरूप देश और क्षेत्र-स्तरीय लक्ष्य तय करने में मदद करेगा।
विकेंद्रीकृत जैव-ऊर्जा (बायोएनर्जी) प्रणालियों के माध्यम से देश में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
- वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखलाओं की अनिश्चितता और भारत में ईंधन की बढ़ती कीमतों के समाधान के रूप में विकेंद्रीकृत जैव ऊर्जा प्रणालियां एक बेहतर विकल्प प्रस्तुत करती हैं।
विकेंद्रीकृत जैव ऊर्जा
- प्रणालियों के बारे में
- इसका आशय जैविक अपशिष्ट और फसल अवशेषों से स्थानीय स्तर पर विद्युत, ऊष्मा या बायोगैस का उत्पादन और उपभोग से है।
- शामिल प्रमुख प्रौद्योगिकियां:
- बायोमास गैसीकरण: इस प्रक्रिया में शुष्क कृषि अवशेषों (जैसे भूसा, डंठल आदि) को जलने वाली (दहनशील) गैस में बदला जाता है। फिर इसका उपयोग छोटे इंजन चलाने या उद्योगों में ऊष्मा उत्पन्न करने के लिए किया जाता है।
- बायोगैस और एनारोबिक डाइजेशन: यह गीले अपशिष्टों (जैसे भोजन के बचे हुए टुकड़े, पशुओं के गोबर) को खाना पकाने और विद्युत उत्पन्न करने वाली बायोगैस में बदलता है।
- महत्व:
- अपशिष्ट प्रबंधन: जैव ऊर्जा प्रणालियां शहरी ठोस अपशिष्ट और खेतों के अवशेषों को मूल्यवान संसाधनों में बदलती हैं।
- ऊर्जा सुरक्षा: जैव-ऊर्जा प्रणालियां दूरदराज और अविकसित क्षेत्रों में ऑफ-ग्रिड तथा माइक्रो-ग्रिड के माध्यम से विद्युत और ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद करती हैं।
- आर्थिक विकास: ये प्रणालियां स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन को बढ़ावा देती हैं तथा लघु पैमाने पर कृषि कार्य व MSME के संचालन में योगदान देती हैं।

विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना की शुरुआत के साथ एक प्रमुख वैश्विक कार्बन बाजार के रूप में उभरा है।
“कार्बन मूल्य निर्धारण की स्थिति और रुझान 2026” के प्रमुख बिंदु
- वैश्विक कवरेज: कार्बन मूल्य निर्धारण नीतियां वैश्विक ग्रीनहाउस गैस (GHG) के 29% को शामिल करती है और 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन के लगभग एक-तिहाई तक पहुंच सकती है।
- राजस्व सृजन: कार्बन टैक्स और उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) ने 2025 में 107 बिलियन डॉलर से अधिक का राजस्व सृजित किए।
भारत की कार्बन बाज़ार प्रणाली
- कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS): इसे वर्ष 2026 में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता आधारित व्यापार प्रणाली के रूप में प्रारंभ किया गया है। इसे विशेषकर उन क्षेत्रकों के लिए प्रारंभ किया गया है, जहां उत्सर्जन कम करना कठिन है।
- जो उद्योग निर्धारित लक्ष्यों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, उन्हें व्यापार योग्य कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्र प्रदान किए जाते हैं।
- वैश्विक स्थिति: भारत की उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) चीन, यूरोपीय संघ और दक्षिण कोरिया के बाद विश्व की सबसे बड़ी उत्सर्जन व्यापार प्रणालियों में से एक है।
एक विश्लेषण में मीथेन अलर्ट एंड रिस्पॉन्स सिस्टम (MARS) द्वारा मुंबई के कांजुरमार्ग लैंडफिल साइट को विश्व के शीर्ष 3 मीथेन उत्सर्जक स्थलों के रूप में चिन्हित किया गया। MARS के तहत अब कोयला खदानों और अपशिष्ट केंद्रों को भी शामिल किया जाएगा।
- अब तक, MARS के तहत उन देशों की तेल और गैस सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया था जो UNEP के 'ऑयल एंड गैस मीथेन पार्टनरशिप 2.0' का हिस्सा हैं।
मीथेन अलर्ट एंड रिस्पॉन्स सिस्टम के बारे में
- यह विश्व की पहली सार्वजनिक वैश्विक सैटेलाइट-आधारित अन्वेषण और सूचना प्रणाली है, जो विश्व भर में मीथेन के बड़ी मात्रा में उत्सर्जन (सुपर-एमिटर्स) पर डेटा उपलब्ध कराती है।
- नोडल एजेंसी: संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की अंतर्राष्ट्रीय मीथेन उत्सर्जन वेधशाला।
- शुरुआत: COP27 जलवायु शिखर सम्मेलन, शर्म अल-शेख, मिस्र (2022) में।
- यह 'वैश्विक मीथेन संकल्प' (Global Methane Pledge) के क्रियान्वयन में सहायता करता है। इस संकल्प का लक्ष्य 2030 तक वैश्विक मीथेन उत्सर्जन को 2020 के स्तर से कम-से-कम 30% तक कम करना है।
हाल ही में, भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने ईंधन के दो प्रमुख मानक प्रकाशित किए हैं:

- IS 19850 : 2026 (इथेनॉल मिश्रित ईंधन के लिए): यह मानक E22, E25, E27 और E30 ईंधनों के विनिर्देश निर्धारित करता है, जो पूरी तरह जल-मुक्त (Anhydrous ) इथेनॉल और मोटर गैसोलीन के मिश्रण से तैयार किए जाते हैं।
- E22, E25, E27 और E30 ईंधनों में क्रमशः 22%, 25%, 27% और 30% इथेनॉल-पेट्रोल मिश्रण होता है।
- इथेनॉल सम्मिश्रण वह प्रक्रिया है जिसमें इथेनॉल को पेट्रोल के साथ मिलाया जाता है। उदाहरण के लिए: E20 का अर्थ है पेट्रोल में 20% इथेनॉल का मिश्रण।
- वर्तमान स्थिति: भारत ने राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति (2018) के तहत निर्धारित 20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है और अब 2030 तक 30% मिश्रण की दिशा में आगे बढ़ने का लक्ष्य रखा है।
- IS 18698 : 2026 (DME मिश्रित LPG के लिए): यह मानक डाइमिथाइल ईथर (DME) मिश्रित तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (LPG) के लिए वर्ष 2024 के पुराने मानक की जगह लेगा।
- डाइमिथाइल ईथर (DME) स्वच्छ रूप से जलने वाला सिंथेटिक ईंधन है, जो लगभग LPG की तरह व्यवहार करता है।
- इसके उत्पादन के दो तरीके हैं:
- अप्रत्यक्ष मार्ग: सिनगैस → मेथनॉल → DME) और
- प्रत्यक्ष मार्ग: सिनगैस → DME।
- वैश्विक डाइमिथाइल ईथर उत्पादन क्षमता में चीन की हिस्सेदारी लगभग 90% है।
लद्दाख में भारत का पहला भू-तापीय (Geothermal) ऊर्जा संयंत्र स्थापित होगा

- लद्दाख के उपराज्यपाल ने पुगा घाटी में 14,000 फीट की ऊंचाई पर इस भूतापीय संयंत्र की स्थापना के लिए ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) के साथ हुए समझौता ज्ञापन (MoU) को पांच वर्ष के लिए बढ़ाने की स्वीकृति दी।
- संशोधित MoU के तहत, ONGC एक मेगावाट (MWe) का पायलट भू-तापीय ऊर्जा संयंत्र स्थापित करेगा। साथ ही, यह लद्दाख में भू-तापीय संसाधनों के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक दोहन के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करेगा।
भू-तापीय ऊर्जा के बारे में:
- अर्थ: यह पृथ्वी की भूपर्पटी के भीतर निक्षेपित ऊष्मा का उपयोग करती है।
- भूतापीय ऊर्जा प्रणाली में कई घटक शामिल होते हैं, जैसे उत्पादन और पुनः इंजेक्शन (कुएं, पंप), परिवहन (पाइपलाइन), वितरण (हीट एक्सचेंजर) और अंतिम उपयोग से जुड़े अनुप्रयोग।
- स्रोत:
- उच्च-एन्थैल्पी (तापीय धारिता) संसाधन: ज्वालामुखीय क्षेत्र, गीजर और हॉट स्प्रिंग्स का मुख्य उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है।
- निम्न से मध्यम-एन्थैल्पी संसाधन: उष्ण शैल और उथली भू-परतें मुख्य रूप से प्रत्यक्ष उपयोग (जैसे तापन और शीतलन, कृषि-खाद्य तथा जलीय कृषि) के लिए बेहतर होती हैं।

- भारत में क्षमता:
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने 381 हॉट स्प्रिंग्स की पहचान की है, जिनका धरातलीय तापमान 35°C से 89°C के बीच है।
- GSI ने भारत में 10 भूतापीय क्षेत्रों की पहचान की है, जिसमें हिमालयी भू-तापीय क्षेत्र, अंडमान निकोबार द्वीप समूह आदि शामिल हैं।
- भारत में लगभग 10,600 मेगावाट की भू-तापीय ऊर्जा की क्षमता का अनुमान लगाया गया है। इनमें पुगा और चुमथांग क्षेत्र सर्वाधिक संभावना वाले क्षेत्र माने जा रहे हैं।
- भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने 381 हॉट स्प्रिंग्स की पहचान की है, जिनका धरातलीय तापमान 35°C से 89°C के बीच है।
- राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति (2025): यह नीति भू-तापीय ऊर्जा को भारत के नवीकरणीय ऊर्जा परिदृश्य के प्रमुख स्रोत के रूप में स्थापित करती है। यह वर्ष 2070 के 'नेट जीरो' लक्ष्य की प्राप्ति और ऊर्जा सुरक्षा में योगदान देगी।
यूरोप के ऊपर बने हीट डोम ने यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और स्पेन में भीषण गर्मी बढ़ा दी है।
हीट डोम के बारे में
- हीट डोम उच्च दाब वाला वायुमंडलीय तंत्र है, जो लंबे समय तक पृथ्वी की सतह के पास गर्म हवा को रोककर रखता है, जिससे अत्यधिक गर्मी की स्थिति उत्पन्न होती है।
- चूंकि गर्म हवा फैलती है, इसलिए यह एक गुंबद जैसी संरचना बना देती है, जो अपने भीतर गर्मी को रोककर रखती है।
- कार्यप्रणाली: नीचे उतरने वाली वायु संकुचित होकर गर्म हो जाती है, जबकि उच्च दाब बादलों के निर्माण को रोकता है और गर्म वायु को सतह के पास रोके रखता है।
- प्रभाव: इसके कारण लू, सूखा, जंगलों में आग और गंभीर स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होते हैं।
कुल मिलाकर, अंटार्कटिका ने 1996 से 2025 के बीच लगभग 12,800 वर्ग किमी स्थिर हिम खो दी है। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि 2015 के बाद हिम के विस्तार में आई आकस्मिक गिरावट का एक प्रमुख कारण अंटार्कटिका के चारों ओर स्थित दक्षिणी महासागर की अस्थिरता है।

- यह अस्थिरता गहरे महासागरीय ताप, तेज पवनों और प्रभावी फीडबैक लूप के संयुक्त प्रभाव के कारण उत्पन्न हुई।
- गहरे महासागरीय ताप: दक्षिणी महासागर में परतदार संरचना थी, जहां ऊपर ठंडा एवं ताजा जल और नीचे गर्म एवं अधिक लवणीय जल मौजूद था। यह परत ऊष्मा को जल सतह तक पहुंचने से रोकती थी। वर्ष 2015 तक यह अवरोध कमजोर पड़ गया।
- तेज पवनें: ओजोन छिद्र और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण पश्चिमी पवनें (पछुवा) अधिक प्रबल हो गईं हैं। इन पवनों ने पंप की तरह कार्य करते हुए उष्ण और लवणीय गहरे समुद्री जल को धीरे-धीरे जल सतह के निकट यानी ऊपर ला दिया है।
- प्रभावी फीडबैक लूप: ऊपर उठता हुआ गहरा जल समुद्री सतह पर उष्णता और लवणता लेकर आता है।
- ऊष्मा समुद्री हिम को पिघलाती है, जबकि अतिरिक्त लवण सतही जल को अधिक सघन बनाता है। इससे ऊपर के समुद्री जल का नीचे के उष्ण जल के साथ मिश्रण आसान हो जाता है। इससे और अधिक ऊष्मा ऊपर आने लगती है, और नई समुद्री हिम का निर्माण कठिन हो जाता है। इस तरह यह प्रक्रिया लगातार चलती रहती है।
यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक कार्य विभाग तथा संयुक्त राष्ट्र वन मंच (UN Forum on Forests: UNFF) सचिवालय द्वारा तैयार की गई है।
- इस रिपोर्ट में 2030 के लिए निर्धारित 6 वैश्विक वन लक्ष्यों (GFG) और संयुक्त राष्ट्र वन रणनीतिक योजना (2017-2030) के संबद्ध लक्ष्यों की दिशा में हुई प्रगति का आकलन किया गया है। इस रणनीतिक योजना को UNFF के 21वें सत्र के दौरान शुरू किया गया था।
- UNFF के बारे में:
- वर्ष 2000 में स्थापित UNFF एक अंतर-सरकारी निकाय है। इसमें संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य और इसकी विशेष एजेंसियों के सदस्य शामिल हैं।
- इसका उद्देश्य सभी प्रकार के वनों के प्रबंधन, संरक्षण और सतत विकास को बढ़ावा देना है।
- UNFF के बारे में:
रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

- वन क्षेत्रफल में कमी: वर्ष 2015 और 2025 के बीच वैश्विक वन क्षेत्रफल में 4 करोड़ (40 मिलियन) हेक्टेयर से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।
- वन क्षेत्र में गिरावट के प्रमुख कारक: कृषि क्षेत्र का विस्तार तथा ईंधन की लकड़ी और चारकोल (कोयले) की बढ़ती मांग इसके मुख्य कारण हैं।
- संधारणीय वन प्रबंधन में बाधाएं: वन प्रबंधन शासन में कमियां, भूमि स्वामित्व को लेकर अस्पष्टता, अवैध व्यापार और संस्थाओं की सीमित क्षमता प्रमुख बाधाएं हैं।
- वन भूमि निम्नीकरण में वृद्धि: सूखा, वनाग्नि, हीटवेव, कीटों के हमले और पादप रोगों जैसे जलवायु कारकों के कारण वन भूमि निम्नीकरण में वृद्धि देखी जा रही है।
- वन संरक्षण हेतु वित्तपोषण की कमी: हालांकि वर्ष 2023 में वित्तीय सहायता रिकॉर्ड 84 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गई, फिर भी यह 2030 तक प्रत्येक वर्ष आवश्यक अनुमानित 300 अरब अमेरिकी डॉलर से बहुत कम है।
मुख्य सिफारिशें
रिपोर्ट में संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय, वनों के लिए अधिक वित्तीय सहायता, वनों की कटाई से मुक्त आपूर्ति श्रृंखला, तथा ईंधन की लकड़ी और कोयले पर निर्भरता कम करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने पर बल दिया गया है।

बोत्सवाना से लाए गए दो चीतों को मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया।
चीता के बारे में
- यह विश्व में सबसे तेज़ दौड़ने वाला स्तनपायी जीव है। यह भारत में विलुप्त होने वाला (1952) एकमात्र बड़ा मांसाहारी जीव है।
- अन्य बिग कैट्स प्रजातियों (शेर, बाघ, तेंदुआ और जगुआर) के विपरीत, चीते दहाड़ते नहीं हैं।
- चीतों की दो उप-प्रजातियां:
- अफ्रीकी चीता (IUCN स्थिति - वल्नरेबल)।
- एशियाई चीता (IUCN स्थिति -क्रिटिकली एंडेंजर्ड)।
- पर्यावास:
- एशिया: केवल पूर्वी ईरान में और भारत के शुष्क क्षेत्रों में (पुनर्वास के बाद);
- अफ्रीका: घास के मैदान, झाड़ियां और खुले जंगल, जैसे- बोत्सवाना, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका।
प्रोजेक्ट चीता (2022) के बारे में
- उद्देश्य: अफ्रीकी चीतों को लाकर भारत में चीतों की समष्टि (आबादी) पुनर्बहाल करना।
- कार्यान्वयन एजेंसी: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA)।
- यह बड़े वन्य-मांसाहारी जीवों के अंतरमहाद्वीपीय स्थानांतरण की विश्व की प्रथम पहल है।
जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में बढ़ती लू की स्थिति के बीच, पैरामीट्रिक बीमा अत्यधिक गर्मी की घटनाओं के दौरान स्वचालित वित्तीय सहायता प्रदान करने के एक साधन के रूप में उभर रहा है।
पैरामीट्रिक बीमा के बारे में
- पैरामीट्रिक बीमा एक गैर-पारंपरिक बीमा मॉडल है। इसमें वास्तविक भौतिक नुकसान की भरपाई करने के बजाय किसी विशेष और मापनीय घटना (जैसे तापमान, वर्षा, हवा की गति) के घटित होने पर पहले से तय निश्चित राशि का भुगतान किया जाता है।
- महत्व: लू, बाढ़ और सूखे जैसी आपदाओं के दौरान तेजी से वित्तीय राहत सुनिश्चित करता है; यह जलवायु-जोखिम प्रबंधन और जलवायु संकट का सामना करने वाले समुदायों के लिए उपयोगी है।
प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा का उपयोग भारत के पहले ग्रीन मेथनॉल उत्पादन संयंत्र के लिए कच्चे माल के रूप में किया जाएगा। इससे समुद्र में चलने वाले जहाजों को ईंधन मिलेगा।
प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा के बारे में
- यह सूखे और लवणता सहिष्णु फलीदार पादप है। यह विश्व की सबसे प्रमुख आक्रामक प्रजातियों में से एक है।
- यह मैक्सिको की देशज प्रजाति है। इसे सबसे पहले 1920 के दशक में अंग्रेजों द्वारा दिल्ली को 'हरा-भरा' करने के लिए लाया गया था। बाद में 1961 में गुजरात वन विभाग ने भी इसका उपयोग शुरू किया।
- पारिस्थितिकी पर प्रभाव:
- यह गहरी जड़ों वाला (फ्रीटोफाइट/अधोभौमजल) पादप है, जो भूमिगत जल स्तर के नीचे के क्षेत्र से जल खींचता है। इससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है और हाइड्रोलॉजिकल सूखा (जल की कमी) और अधिक गंभीर हो सकता है।
- यह देशज पादपों की विविधता को कम करता है, जिससे पादप विविधता के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न होता है।
- IUCN लाल सूची स्थिति: कम चिंताजनक।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में भारत का पहला सैटेलाइट-टैग्ड (उपग्रह द्वारा ट्रैक किया जाने वाला) भारतीय सॉफ्टशेल कछुआ छोड़ा गया है।
भारतीय सॉफ्टशेल कछुआ के बारे में
- इसे गंगा सॉफ्टशेल कछुए के नाम से भी जाना जाता है।
- विशेषताएं:
- यह ताजे जल के पर्यावासों में पाया जाता है।
- इसकी पहचान इसकी उभरी हुई, नली जैसी थूथन और चपटे कवच से होती है।
- इसके सिर के ऊपरी हिस्से पर तीर के आकार के विशिष्ट निशानों के कारण इसे नदी जल के अन्य कछुओं से अलग पहचाना जा सकता है।
- वितरण और क्षेत्र: यह भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी मैदानों में सिंधु, गंगा, नर्मदा, महानदी और ब्रह्मपुत्र नदी घाटियों में पाया जाता है।
- यह बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान जैसे देशों में भी पाया जाता है।
- संरक्षण स्थिति:
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA), 1972: अनुसूची-1
- CITES: परिशिष्ट-1
- IUCN लाल सूची: एंडेंजर्ड
Article Sources
1 sourceवैज्ञानिक पैंगोलिन तस्करी के केंद्रों का भंडाफोड़ करने के लिए 'DNA मानचित्रण' का उपयोग कर रहे हैं।
- पैंगोलिन विश्व में सर्वाधिक तस्करी किए जाने वाले स्तनपायियों में शामिल है।
पैंगोलिन के बारे में
- विशेषताएं:
- ये एकमात्र ऐसे स्तनपायी हैं जिनका शरीर पूरी तरह से रक्षात्मक केराटिन शल्क से ढका होता है।
- ये एकांतप्रिय, निशाचर, बिना दांतों वाले स्तनधारी हैं जिनकी जीभ लंबी और चिपचिपी होती है।
- चींटियों, दीमकों और लार्वा को आहार के रूप में ग्रहण करने के कारण इन्हें "स्केली एंटीइटर" (शल्कदार चींटीखोर) भी कहा जाता है।
- खतरा महसूस होने पर, ये शिकारियों से अपने संवेदनशील पेट की रक्षा करने के लिए खुद को एक सख्त गेंद की तरह गोल सिकोड़ लेते हैं।
- वैश्विक स्तर पर पाई जाने वाली पैंगोलिन की 8 प्रजातियों में से 2 प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। ये हैं; इंडियन पैंगोलिन (IUCN लाल सूची: एंडेंजर्ड) और चाइनीज पैंगोलिन (IUCN लाल सूची: क्रिटिकली एंडेंजर्ड)।
- दोनों उप-प्रजातियां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची I के तहत संरक्षित हैं और CITES के परिशिष्ट I के तहत सूचीबद्ध हैं।
- पर्यावास:
- इंडियन पैंगोलिन: पूर्वोत्तर के अधिकांश हिस्सों को छोड़कर हिमालय के दक्षिण में पूरे भारत में पाया जाता है।
- चाइनीज पैंगोलिन: असम और पूर्वी हिमालय में पाया जाता है।