सुर्खियों में क्यों?
हाल ही में, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा 'पारिवारिक सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य' (Survey on Household Social Consumption: Health) पर सर्वेक्षण जारी किया गया।
अन्य संबंधित तथ्य
- यह, इस प्रकार का 8वाँ सर्वेक्षण है और इसे राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (NSS) के 80वें दौर (जनवरी-दिसंबर 2025) की अवधि के दौरान प्रस्तुत किया जा रहा है।
- इसमें एड्स (AIDS) और कैंसर जैसी कुछ रोगों के अतिरिक्त, अधिकांश रोगियों की पहचान स्व-रिपोर्टिंग के माध्यम से की गई है। इससे अल्प-रिपोर्टिंग या अतिरिक्त-रिपोर्टिंग की संभावना बढ़ जाती है।
प्रगति के प्रमुख कारक

- आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री-जन आरोग्य योजना (PM-JAY): यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) के अंतर्गत शुरू की गई एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसके तहत, द्वितीयक और तृतीयक स्तर की स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के लिए प्रति परिवार प्रति वर्ष 5 लाख रुपये का मुफ्त स्वास्थ्य कवर प्रदान किया जाता है।
- स्वस्थ भारत पोर्टल: इसे MoHFW द्वारा संचालित किया जाता है। इसकी API-आधारित एकीकृत अवसंरचना कई राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को एक ही इंटरफेस के तहत लाती है, जिससे एक से अधिक पोर्टल पर लॉगिन करने और बार-बार सूचनाएं दर्ज करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। यह अंतर-संचालनीयता को बढ़ाता है और सूचनाओं के दोहराव को कम करता है।
- अमृत ( अफोर्डेबल मेडिसिन एंड रिलाएबल इम्प्लांट्स फॉर ट्रीटमेंट - AMRIT ) फार्मेसी: इसके तहत 50% से 90% तक की छूट पर दवाइयां
- उपलब्ध कराई जाती है, जिससे उपचार की लागत कम होती है। (इसका प्रबंधन एक केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्रक के उद्यम 'HAL लाइफकेयर लिमिटेड' द्वारा किया जाता है)।
- जननी सुरक्षा योजना (JSY): यह MoHFW के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत शुरू की गई एक केंद्र प्रायोजित योजना है। इसके तहत, पात्र गर्भवती महिलाओं को नकद सहायता प्रदान की जाती है। यह योजना सभी निम्न-प्रदर्शन वाले राज्यों में संस्थागत प्रसव कराने वाली महिलाओं के लिए उपलब्ध है।
- डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात : यह अनुपात बढ़कर 1:811 हो गया है, जिसमें एलोपैथिक और आयुष (AYUSH) दोनों चिकित्सक शामिल हैं। यह अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा अनुशंसित 1:1000 के मानक से बेहतर है।
प्रमुख चुनौतियां
- गैर-संचारी रोगों (NCDs) की ओर रुझान: संक्रामक रोगों में गिरावट आई है, लेकिन इसके साथ ही गैर-संचारी रोगों (जैसे- मधुमेह) में वृद्धि हुई है, जो अब कम आयु के लोगों में भी अधिक देखने को मिल रहा है।
- 2017-18 के बाद से हृदय रोग से पीड़ित लोगों की संख्या में लगभग 3 गुना की वृद्धि हुई है।
- निजी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं पर निर्भरता: अस्पताल में भर्ती होने वाले रोगियों में 60% से अधिक (57.9% ग्रामीण, 64.6% शहरी) लोग निजी अस्पतालों में भर्ती होते हैं। जबकि बाह्य रोगी देखभाल सेवाओं (OPD) के मामले में यह 43% (ग्रामीण) और 44% (शहरी) है।
- निरंतर वित्तीय जोखिम: बीमा कवरेज में वृद्धि के बावजूद, निजी अस्पतालों में भर्ती होने पर औसत 'जेब से होने वाला व्यय ' (Out-of-Pocket Expenditure - OOPE) 50,508 रुपये आता है, जबकि सरकारी सुविधाओं में यह मात्र 6,631 रुपये है।
- कामकाजी आबादी के बीच मानसिक स्वास्थ्य: युवा वयस्कों (15-29 वर्ष) में मनोरोग और स्नायविक समस्याओं से संबंधित दर्ज मामलों की संख्या अपने उच्चतम स्तर पर है।
- विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय का जोखिम: भले ही ग्रामीण भारत में कम-से-कम 1 स्वास्थ्य बीमा के तहत कवर किए गए लोगों का प्रतिशत बढ़कर 47.4% और शहरी क्षेत्रों में 44.3% हो गया है, फिर भी आधे से अधिक आबादी अभी भी आर्थिक रूप से जोखिम का सामना कर रही है।
स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्रक को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दे
- उप-इष्टतम सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय : GDP के अनुपात में सरकारी स्वास्थ्य व्यय 1.43% है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के 2.5% के लक्ष्य से बहुत कम है।
- असमान वितरण : विशेष रूप से डॉक्टरों और अवसंरचना के संदर्भ में। उदाहरण के लिए, 80% स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हैं। यद्यपि ग्रामीण भारत में देश की 70% आबादी निवास करती है, किंतु वहां पर केवल 40% अस्पताल बिस्तर ही उपलब्ध हैं।
- विखंडित स्वास्थ्य देखभाल प्रशासन: स्वास्थ्य मुख्य रूप से 'राज्य सूची' का विषय है, जिसके कारण नीतियों के कार्यान्वयन में भिन्नता देखने को मिलती है। सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच कमजोर समन्वय प्रभावी सेवा वितरण (effective service delivery) में बाधा डालता है।
- उभरते खतरे : जलवायु परिवर्तन, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR), ज़ूनोटिक रोग और भविष्य की महामारियां नई चुनौतियां प्रस्तुत करती हैं। इनसे निपटने के लिए मजबूत लोक स्वास्थ्य तैयारियों और निगरानी प्रणालियों की आवश्यकता है।
- खराब प्राथमिक देखभाल सेवा : उदाहरण के लिए, वर्तमान में 33,800 व्यक्तियों पर 1 ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) है, जबकि मानक 30,000 व्यक्तियों का है। कई बार, इन केंद्रों में कर्मचारियों की भारी कमी होती है, और आवश्यक भौतिक अवसंरचना जैसे- नल का पानी, जांच उपकरण आदि का अभाव होता है।
निष्कर्ष
यह सर्वेक्षण स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता, बीमा कवरेज और उन तक पहुंच में हुई उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है। हालांकि, इसके साथ ही यह समता, वित्तीय सुरक्षा में लगातार बनी हुई चुनौतियों और गैर-संचारी रोगों (NCDs) के बढ़ते बोझ को भी उजागर करता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 और सतत विकास लक्ष्य-3 (उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली) के अनुरूप 'सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज' (UHC) प्राप्त करने के लिए अधिक सार्वजनिक निवेश, अधिक सुदृढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, निवारक देखभाल और लचीली स्वास्थ्य प्रणालियों की आवश्यकता होगी।