उच्चतम न्यायालय ने 'लखनऊ पब्लिक स्कूल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य' मामले में यह निर्णय दिया कि नेबरहुड स्कूल RTE अधिनियम, 2009 के तहत पात्र छात्रों को तत्काल प्रवेश (एडमिशन) देने के लिए बाध्य हैं।

कार्यान्वयन में चुनौतियां
- स्कूल-स्तर पर विरोध: निजी स्कूल ईडब्ल्यूएस (EWS) छात्रों को प्रवेश देने का विरोध करते रहते हैं।
- छिपी हुई लागत का बोझ: यूनिफॉर्म, किताबें और अन्य सामग्री का खर्च गरीब परिवारों को उठाना पड़ता है।
- अन्य मुद्दे:
- निगरानी व्यवस्था कमजोर है,
- जवाबदेही सीमित है,
- राज्यों के बीच क्रियान्वयन और परिणामों में अंतर देखने को मिलता है,
- शिकायत निवारण तंत्र पर्याप्त नहीं है, और
- अंतिम स्तर (last-mile) तक सेवाएं पहुंचाने में भी कठिनाइयां आती हैं।
उच्चतम न्यायालय के निर्णय का महत्व
शिक्षा के अधिकार से संबंधित अन्य संवैधानिक उपबंध :
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Article Sources
1 sourceरिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर (2023 की तुलना में)
- प्रति लाख जनसंख्या पर अपराध दर: 448.3 से घटकर 418.9 हो गई।
- कुल दर्ज मामलों की संख्या: इसमें 6.0% की कमी दर्ज की गई।
- कमजोर वर्गों के विरुद्ध अपराध:
- महिलाएं: महिलाओं के विरुद्ध अपराध 1.5% घटकर लगभग 4.4 लाख मामले रहे।
- इनमें सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग 42%) ‘पति द्वारा क्रूरता’ का रहा।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत ‘महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराध’ नाम से नई श्रेणी जोड़ी गई है।
- बच्चे: बच्चों के विरुद्ध अपराध 5.9% बढ़कर लगभग 1.8 लाख मामले हो गए।
- वरिष्ठ नागरिक: वरिष्ठ नागरिकों के विरुद्ध अपराधों में 2023 की तुलना में 16.9% वृद्धि दर्ज की गई। इनके विरुद्ध चोरी और धोखाधड़ी सबसे सामान्य अपराध रहे।
- अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST): SC के विरुद्ध अपराधों में 3.6% की कमी और ST के विरुद्ध अपराधों में 23.1% की कमी दर्ज की गई।
- विशिष्ट अपराध श्रेणियां:
- साइबर अपराध: इसमें 17.9% की वृद्धि दर्ज की गई। इनमें लगभग 73% मामले धोखाधड़ी से संबंधित थे।
- आर्थिक अपराध: इसमें 4.6% की वृद्धि दर्ज की गई। इनमें जालसाजी, धोखाधड़ी और ठगी के सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए।
- कानून के उल्लंघन के आरोपित किशोर: इनमें 11.2% की वृद्धि दर्ज की गई। ऐसे किशोरों में अधिकांश (77.7%) 16 से 18 वर्ष की आयु वर्ग के थे।

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 'भारत में महिलाएं और पुरुष 2025' शीर्षक से रिपोर्ट जारी की।
- इस रिपोर्ट में भारत में जनसंख्या, शिक्षा, स्वास्थ्य-देखभाल, रोजगार और निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिला और पुरुषों की भागीदारी के रुझानों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
- जनसंख्या:
- जन्म के समय लिंगानुपात: यह 2017-19 के 904 से सुधरकर 2021-23 में 917 हो गया।
- अरुणाचल प्रदेश में सर्वाधिक लिंगानुपात (1085) है, जबकि झारखंड में सबसे कम (899) है।
- जनसंख्या वृद्धि: भारत में जनसंख्या की औसत वार्षिक घातीय वृद्धि (exponential growth) एक उल्टे U-आकार (inverted U-shape) का रुझान दर्शाती है, जो 1971–81 के दौरान अपने उच्चतम स्तर पर पहुँची और उसके बाद लगातार घटती गई।
- जन्म के समय लिंगानुपात: यह 2017-19 के 904 से सुधरकर 2021-23 में 917 हो गया।
- स्वास्थ्य-देखभाल:
- मातृ मृत्यु अनुपात (MMR): 2004-06 के 254 से घटकर 2021-23 में 88 हो गया, जो व्यापक गिरावट है।
- कुल प्रजनन दर (TFR): 2019 से 2023 के बीच कुल प्रजनन दर घटकर शहरी क्षेत्रों में 1.5 और ग्रामीण क्षेत्रों में 2.1 हो गई।
- शिक्षा:
- साक्षरता दर: भारत में पुरुष और महिला साक्षरता दरों में 14.4 प्रतिशत अंकों का अंतर है (पुरुष- 84.7% और महिला- 70.3%)।
- सकल नामांकन अनुपात (GER): स्कूली शिक्षा के सभी स्तरों पर महिला GER, पुरुष GER से अधिक है।
- अर्थव्यवस्था में भागीदारी:
- कर्मकार (वर्कर) जनसंख्या अनुपात (15 वर्ष और उससे अधिक आयु): 2025 में, यह पुरुषों के लिए 76.6% और महिलाओं के लिए 38.8% था।
- महिला श्रम बल भागीदारी दर (LFPR): ग्रामीण क्षेत्रों में यह 37.5% से बढ़कर 45.9% हो गई।
- निर्णय लेने में भागीदारी:
- मतदान प्रतिशत: 2019 और 2024 के आम चुनावों में महिला मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा।
- संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व: 2025 में 13.65% सांसद और 9.86% मंत्री महिलाएं थीं।
हाल ही में, केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जननी (JANANI - प्रसवपूर्व, प्रसवकालीन और नवजात शिशु के लिए एकीकृत देखभाल यात्रा) प्लेटफॉर्म लॉन्च किया।
जननी (JANANI) के बारे में
- यह प्रजनन आयु के दौरान महिलाओं के डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड की व्यापक निगरानी और रखरखाव के लिए तैयार किया गया एक सेवा-उन्मुख डिजिटल प्लेटफॉर्म है।
- यह मौजूदा RCH (प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य) पोर्टल का एक उन्नत संस्करण है, जो देखभाल की निरंतरता में प्रमुख सेवा वितरण घटनाओं को दर्ज करके एक दीर्घकालिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड तैयार करता है।
- प्रमुख विशेषताएं:
- समन्वय: यू-विन (U-WIN) और पोषण (POSHAN) जैसे राष्ट्रीय प्लेटफार्मों को एकीकृत करता है।
- विशिष्ट पहचानकर्ता : लाभार्थियों के पंजीकरण के लिए आभा (ABHA), आधार (OTP और बायोमेट्रिक) और मोबाइल नंबर जैसी पहचानकर्ता सुविधाएं।
- अन्य: QR-आधारित डिजिटल मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य (MCH) कार्ड; उच्च जोखिम वाले गर्भधारण के लिए स्वचालित अलर्ट, पर्यवेक्षी समीक्षा के लिए रियल-टाइम डैशबोर्ड, आदि।
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1 sourceराष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने 'भारत में आकस्मिक मौतें और आत्महत्याएं 2024' शीर्षक से रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में प्राकृतिक विपदाओं, तथा यातायात और सड़क दुर्घटनाओं जैसे अन्य कारणों से होने वाली आकस्मिक मौतों के आंकड़ें प्रदान किए गए हैं।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
- आकस्मिक मौतों की दर (प्रति लाख जनसंख्या): यह दर वर्ष 2023 की 31.9 से बढ़कर वर्ष 2024 में 33.3 हो गई। इनमें सर्वाधिक मौतें 30 से 45 वर्ष की आयु के बीच के समूह (31.3%) में दर्ज की गईं।
- प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली मौतें: इसके कारण कुल 7,903 मौतें हुईं। इनमें 35.7% मौतें 'आकाशीय बिजली' गिरने से, 23.2% मौतें 'लू/धूप लगने (हीट स्ट्रोक)' से और 10.5% मौतें 'शीतलहर' के कारण हुईं।
- आकाशीय बिजली गिरने से सर्वाधिक मौतें मध्य प्रदेश (577), बिहार (360) और उत्तर प्रदेश (275) में दर्ज की गईं।
- अन्य कारणों से होने वाली दुर्घटनाएं: इन कारणों से कुल 4,59,954 मौतें हुईं, जिनमें महिलाओं की तुलना में पुरुषों की संख्या अधिक थी।
- प्रमुख कारण: 'सड़क दुर्घटनाएं' (43.4%), 'आकस्मिक मृत्यु' (16.5%), 'डूबना' (8.7%), 'ऊंचाई से गिरना' (5.7%), 'विषाक्तता/जहर' (4.7%) और 'विद्युताघात (करंट लगना)' (3.4%)।
- आगजनी की दुर्घटनाएं: वर्ष 2024 में आगजनी की 5,971 दर्ज घटनाओं के कारण 5,888 लोगों की मृत्यु हो गई।
- सड़क दुर्घटनाएं: यातायात दुर्घटनाओं में सड़क दुर्घटनाओं (87.8%) से होने वाली मौतों की हिस्सेदारी सर्वाधिक रही है। जबकि रेलवे दुर्घटनाओं में कोई मृत्यु दर्ज नहीं की गई।
- प्रमुख कारण: गाड़ियों की तेज गति इसका मुख्य कारण रही, जिससे 61.2% सड़क दुर्घटनाएं हुईं।
- क्षेत्रीय विस्तार: शहरी क्षेत्रों (40.3%) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (59.7%) से अधिक दुर्घटनाओं के मामले सामने आए।
- दुर्घटना स्थल: 31.2% सड़क दुर्घटनाएं आवासीय क्षेत्रों के निकट दर्ज की गईं।
आत्महत्या की घटनाओं से संबंधित प्रमुख तथ्य
- आत्महत्या की दर (प्रति लाख जनसंख्या) वर्ष 2023 की 12.3 से कम होकर 2024 में 12.2 हो गई।
- आत्महत्या की वजहें: देश में वर्ष 2024 के दौरान आत्महत्याओं के लिए 'पारिवारिक समस्याएं (विवाह से संबंधित समस्याओं के अलावा)' (33.5%), 'रोग' (18.0%) और 'नशीली दवाओं का सेवन/व्यसन' (7.6%) मुख्य रूप से जिम्मेदार थे। ये तीनों कारण 2024 में देश में कुल 59.0% आत्महत्याओं के लिए जिम्मेदार थे।

- राज्यवार मामले: आत्महत्या के सर्वाधिक मामले महाराष्ट्र में दर्ज किए गए, जिसके बाद तमिलनाडु का स्थान रहा।
- संघ राज्य क्षेत्रों (UTs) में दिल्ली में आत्महत्या के सर्वाधिक मामले (2,905) दर्ज किए गए। इसके बाद पुडुचेरी का स्थान रहा।
- पीड़ितों की शैक्षणिक स्थिति: कुल आत्महत्या पीड़ितों में से केवल 5.6% लोग ही स्नातक और उससे अधिक पढ़े-लिखे थे।
- आत्महत्या करने वाले पीड़ितों में से 10.1% लोग निरक्षर थे।
- शहरों में रुझान: शहरों में आत्महत्या की दर (16.3) अखिल भारतीय आत्महत्या दर (12.2) की तुलना में अधिक थी।
- आत्महत्या पीड़ितों की व्यावसायिक स्थिति: पुरुषों में सर्वाधिक आत्महत्याएं दिहाड़ी मजदूरों द्वारा की गईं।
- महिलाओं में, आत्महत्या करने वालों की सर्वाधिक संख्या गृहणियों की थी।
- कृषि क्षेत्रक में कुल 10,546 किसानों (6.2%) ने आत्महत्या की।
- आत्महत्या के मामलों में पुरुष-महिला अनुपात: यह अनुपात 73.5 : 26.5 रहा।
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1 sourceविश्व शहरी मंच (WUF) का 13वां सत्र बाकू में आयोजित किया गया।
विश्व शहरी मंच के बारे में
- स्थापना: वर्ष 2001 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित।
- प्रथम सत्र: वर्ष 2002 में नैरोबी में आयोजित।
- आयोजक: संयुक्त राष्ट्र मानव बस्ती कार्यक्रम (UN-Habitat)।
- प्रकृति: सतत शहरीकरण पर आधारित विश्व का प्रमुख उच्च-स्तरीय, खुला एवं समावेशी मंच।
- उद्देश्य:
- सतत शहरीकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
- श्रेष्ठ कार्य-पद्धतियों एवं नीतिगत अनुभवों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
- सरकारों, स्थानीय निकायों, नागरिक समाज, शिक्षाविदों तथा निजी क्षेत्रक के बीच सहयोग को सुदृढ़ करना।
विश्व शहरी मंच-13:
- विषय: "सभी के लिए आवास: सुरक्षित एवं सुदृढ़ शहर तथा समुदाय"।
- स्थान: बाकू, अज़रबैजान।
- सह-आयोजक: UN-Habitat तथा अज़रबैजान सरकार।
- संबद्ध एजेंडा: न्यू अर्बन एजेंडा (2016) तथा सतत विकास लक्ष्य-11 (सतत शहर एवं समुदाय) के कार्यान्वयन को समर्थन प्रदान करना।
- परिणाम दस्तावेज: 'बाकू कॉल टू एक्शन'।
- 'बाकू कॉल टू एक्शन' में आवास संकट के समाधान तथा समावेशी, सुदृढ़, सतत एवं पर्याप्त वित्त-पोषित शहरी विकास के लिए वैश्विक स्तर पर त्वरित कार्रवाई का आह्वान किया गया है।

संबंधित सुर्खियां: यूएन-हैबिटैट ने 'वर्ल्ड सिटीज रिपोर्ट 2026' जारी कीयूएन-हैबिटैट की यह रिपोर्ट "द ग्लोबल हाउसिंग क्राइसिस: पाथवेज़ टू एक्शन" शीर्षक से जारी की गई है। रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है कि आवास की वहनीयता से जुड़ी समस्याएं, व्यापक अनौपचारिकता या गैर विनियमित आवासीय इकाइयां, और बढ़ते जलवायु-संबंधी जोखिम आदि आपस में जुड़े हुए और एक-दूसरे को गंभीर करने वाली चुनौतियां हैं। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
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1 source- उच्चतम न्यायालय ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD), 2016 के तहत "एसिड अटैक पीड़ितों" की परिभाषा का विस्तार किया है। अब इसमें जबरन एसिड पिलाए गए (forcible acid ingestion) पीड़ित भी शामिल होंगे। साथ ही, आंतरिक चोटों वाले पीड़ित भी शामिल होंगे, भले ही बाहरी रूप से कोई विकृति दिखाई न दे।
- न्यायालय ने सरकार को यह भी अवगत कराया है कि एसिड अटैक के लिए मौजूदा दंड एक 'निवारक' (deterrent) के रूप में विफल रही है। साथ ही, न्यायालय ने 'सिद्ध करने का भार' (burden of proof) आरोपी पर डालने का भी सुझाव दिया और कहा कि ऐसे मामलों में एसिड विक्रेताओं को 'सह-आरोपी' (co-accused) बनाया जाना चाहिए।
- न्यायालय ने पीड़ितों के संरक्षण के लिए एक 'व्यापक नीतिगत ढांचा' तैयार करने का भी सुझाव दिया था, क्योंकि यदि वे जीवित बच भी जाते हैं, तो उन्हें व्यापक और निरंतर चिकित्सा उपचार की आवश्यकता होती है।
- इस अंतर्निहित मान्यता से जबरन एसिड पिलाए जाने के पीड़ितों को 2016 के अधिनियम के तहत देय 'दिव्यांगता लाभ' का दावा करने में सहायता मिलेगी।
- इससे पहले, 2016 का कानून केवल एसिड फेंकने के पीड़ितों को मान्यता देता था, न कि जबरन एसिड पिलाए जाने वाले मामलों को।
- हालांकि, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 124 (घोर उपहति/ गंभीर चोट कारित करना) के तहत एसिड फेंकने और एसिड पिलाने, दोनों ही कृत्यों को अपराध माना गया है, जो 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा के साथ दंडनीय हैं।