सांसद की निरर्हता/अयोग्यता (DISQUALIFICATION OF MP) | Current Affairs | Vision IAS

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संक्षिप्त समाचार

30 Jun 2026
7 min

हाल ही में, AAP के राज्यसभा के दो-तिहाई सांसदों ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए, जिसके कारण निरर्हता/अयोग्यता याचिका दायर की गई है।

  • दसवीं अनुसूची के अनुसार, विलय के मामले में दल-बदल के आधार पर निरर्हता लागू नहीं होती है।
  • यह प्रावधान करता है कि किसी सदन के सदस्य को तब अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा, जब उसकी मूल राजनीतिक पार्टी कम-से-कम 2/3 सदस्यों के साथ किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में विलय कर लेती है।
    • निरर्हता याचिका में तर्क दिया गया है कि दसवीं अनुसूची के तहत केवल विधायकों द्वारा दल बदलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मूल राजनीतिक दल का वास्तविक रूप से किसी अन्य दल में विलय होना आवश्यक है। 

दसवीं अनुसूची और संसद या विधानसभा के सदस्यों की अयोग्यता 

  • लोकप्रिय रूप से इसे दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) कहा जाता है।
  • 1985 के 52वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से इसे संविधान में जोड़ा गया।
    • 91वें संविधान संशोधन अधिनियम ने 1/3 विभाजन के प्रावधान को हटाकर इसे कम से कम 2/3 कर दिया, जिससे दल-बदल विरोधी कानून मजबूत हुआ।
  • उद्देश्य: राजनीतिक दल-बदल का मुकाबला करना और लोकतंत्र की रक्षा करना।
  • अयोग्यता के आधार: 
    • स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग देना;
    • मतदान के दौरान पार्टी व्हिप का उल्लंघन करना;
    • निर्दलीय निर्वाचित सांसद या विधायक का किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाना;
    • यदि कोई मनोनीत (नॉमिनेटेड) सदस्य सदन का सदस्य बनने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।
  • निर्भीक और शीघ्र निर्णयों के लिए सांसदों के मामले में न्याय-निर्णयन का कार्य लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति को सौंपा गया है, ताकि न्यायिक विलंब से बचा जा सके।

नीति आयोग ने 'प्रभावी नगर सरकार की ओर: दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के लिए एक रूपरेखा' (Moving Towards Effective City Government: A Framework for Million-Plus Cities) रिपोर्ट जारी की है।

  • भारत के 47 दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों (मिलियन-प्लस सिटीज़) में भारत की शहरी आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा रहता है। ये भारत की GDP में 60% का योगदान करते हैं। 
  • हालाँकि, इन्हें अवसंरचना की कमी, अपर्याप्त आवास, गतिशीलता, पर्यावरणीय स्थिरता और 
  • सामाजिक समावेशन से संबंधित गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो इन विकास केंद्रों में रहने और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। 

दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में शहरी शासन की चुनौतियां

  • कार्यों का सीमित हस्तांतरण: औसतन, शहरी सरकारों (नगर निकायों) का 18 कार्यों में से केवल 8 कार्यों पर पूर्ण नियंत्रण है (74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम)। 
  • खंडित संस्थागत व्यवस्था और अप्रभावी नेतृत्व: निर्वाचित प्रतिनिधियों और नगरपालिका प्रशासन के बीच स्पष्ट सीमांकन (बंटवारे) का अभाव है। 
    • महापौरों (Mayors) को वास्तविक प्रमुख नहीं माना जाता है।
  • निम्न राजस्व आधार और धन का सीमित हस्तांतरण: स्वयं के स्रोतों से कम राजस्व, आबद्ध अनुदानों (Tied Grants) पर निर्भरता, राज्य वित्त आयोगों के गठन में देरी, अपर्याप्त संस्थागतकरण और उनकी सिफारिशों का चयनात्मक कार्यान्वयन।
  • लोक सेवा-प्रदायगी में कमियां: सार्वजनिक परिवहन, शहरी योजना-निर्माण, जल और स्वच्छता जैसी प्रमुख सेवाओं में नगर सरकारों की भूमिका बहुत कम या न के बराबर बनी हुई है।
  • क्षमता की कमी: कर्मचारियों का समय पर भर्ती नहीं होना, प्रतिनियुक्ति पर उच्च निर्भरता, अधिकारियों का बार-बार स्थानांतरण और प्रशिक्षण में सीमित निवेश अन्य समस्याएं हैं।

रिपोर्ट में की गयी प्रमुख सिफारिशें

  • नेतृत्व: निश्चित कार्यकाल के साथ प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित महापौर और सशक्त महापौर परिषद की व्यवस्था की जानी चाहिए।
  • एकीकृत सेवा वितरण: जल, स्वच्छता और परिवहन जैसी सेवाओं को नगर स्थानीय शासन के तहत लाने की जरूरत है ताकि बेहतर समन्वय हो सके।
  • नगर निगम के वित्तीय स्रोतों को बढ़ाना: इसके लिए स्वयं के राजस्व स्रोत बढ़ाना, मजबूत राज्य वित्त आयोगों के माध्यम से समय पर वित्तीय हस्तांतरण सुनिश्चित करना, और नगरपालिका बॉण्ड जैसे बाजार-आधारित वित्तीय स्रोतों तक पहुंच को सक्षम बनाना आवश्यक है।
  • संस्थाओं का पुनर्गठन: परास्टेटल (अर्ध-सरकारी) एजेंसियों को शहर प्रशासन के अधीन लाकर उनकी भूमिकाएं स्पष्ट की जाएं और बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए।
  • कानूनी और नीतिगत सुधार: राज्य सरकारों को नगर निगम कानूनों में संशोधन करना चाहिए, और केंद्रीय आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा मॉडल म्युनिसिपल कानून को अपडेट कर सुधारों को बढ़ावा देना चाहिए।

NCRB सुरक्षा एजेंसियों की सहायता के लिए ‘अपराध और अपराधियों पर सूचना के भंडार’ के रूप में कार्य करता है। 

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु (2024) 

  • जेलों की संख्या: राष्ट्रीय स्तर पर 0.1% (1333 जेल) की वृद्धि हुई।
    • जेलों में कैदियों को रखने की वास्तविक क्षमता में 3.3% की वृद्धि हुई है, जबकि जेलों में बंद कैदियों की संख्या में 3.5% की कमी आई है।
  • जेलों की ऑक्यूपेंसी दर में गिरावट: 2023 में 120.8% से घटकर 2024 में 112.7% हो गई है।
  • जेलों में लैंगिक अनुपात: 95.8% कैदी पुरुष थे; 4.14% महिलाएं थीं; और 122 ट्रांसजेंडर व्यक्ति थे। 
  • केवल 34 महिला जेल हैं; 21 राज्यों/ संघ राज्य क्षेत्रों (UTs) में कोई अलग महिला जेल नहीं है। 

आगे की राह/ सिफारिशें

  • उच्चतम न्यायालय द्वारा: मानवाधिकारों की सुरक्षा की जानी चाहिए; खुले जेलों की स्थापना करनी चाहिए (सुहास चकमा मामला 2024); डेटा-आधारित पुनर्वास ट्रैकिंग प्रणाली स्थापित करनी चाहिए। 
  • न्यायमूर्ति ए.एन. मुल्ला समिति: भारतीय कारागार और सुधारात्मक सेवा (Indian Prisons & Correctional Service) नामक एक अखिल भारतीय सेवा की स्थापना करनी चाहिए, जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या कम करनी चाहिए, आदि।
  • न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय समिति: स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट की स्थापना, सुनवाई के लिए जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा देना आदि। 

जेल सुधारों के लिए उठाए गए कदम

  • केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा संशोधित मॉडल जेल मैनुअल, 2016 के नियम तथा मॉडल कारागार और सुधारात्मक सेवा अधिनियम, 2023: इसका उद्देश्य देश भर के जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करना है। 
  • ई-कारागार परियोजना: इसे राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र द्वारा विकसित किया गया है। यह कैदियों की जानकारी दर्ज करने और प्रबंधित करने के लिए एक केंद्रीकृत दृष्टिकोण प्रदान करती है और साथ ही रिपोर्ट भी तैयार करती है। 
  • उच्चतम न्यायालय की FASTER/फास्टर (Fast and Secured Transmission of Electronic Records) प्रणाली: इसका उद्देश्य जमानत के आदेशों की सूचना को यथाशीघ्र जेलों तक पहुंचाना है। 
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केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागरिकता (संशोधन) नियम, 2026 अधिसूचित किए। इसका उद्देश्य ‘प्रवासी भारतीय नागरिक’ यानी ‘ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI)’ कार्डधारकों से संबंधित प्रक्रियाओं को सरल बनाना और नाबालिगों के लिए पासपोर्ट नियमों को सख्त बनाना है। 

संशोधन के प्रमुख प्रावधान

  • नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019 के तहत नागरिकता चाहने वाले आवेदकों को एक शपथ-पत्र प्रस्तुत करके यह घोषणा करनी होगी कि उनके पास पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश का कोई वैध या समाप्त हो चुका पासपोर्ट है या नहीं।
  • नाबालिगों के लिए दोहरे पासपोर्ट पर प्रतिबंध: एक नया प्रावधान यह अनिवार्य करता है कि कोई भी नाबालिग भारतीय पासपोर्ट रखने के साथ-साथ किसी अन्य देश का पासपोर्ट धारण नहीं कर सकता है।
    • 2009 के नियमों के तहत, किसी भारतीय के भारत के बाहर पैदा हुए बच्चे का भारतीय दूतावास में पंजीकरण कराते समय माता-पिता को केवल यह घोषणा करनी होती थी कि बच्चे के पास किसी अन्य देश का पासपोर्ट नहीं है।
  • e-OCI: अब OCI का दर्जा पारंपरिक फिजिकल कार्ड के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक रूप (e-OCI) में भी जारी किया जा सकता है।
  • अनिवार्य ऑनलाइन आवेदन: पंजीकरण सहित सभी OCI प्रक्रियाएं अब निर्धारित पोर्टल (ociservices.gov.in) के माध्यम से पूरी तरह से ऑनलाइन होंगी।
  • डिजिटल माध्यम से OCI दर्जा त्याग करने की अनुमति: यह प्रावधान OCI सुविधा के त्याग और रद्द करने की प्रक्रिया को सरल बनाता है। इसमें फिजिकल कार्ड जमा करना अनिवार्य होता है और पूरी प्रक्रिया के लिए डिजिटल स्वीकृति भी दी जाती है, जिससे प्रक्रिया तेज और पारदर्शी हो जाती है।
  • फास्ट ट्रैक इमिग्रेशन (FTI) सहमति: अब OCI आवेदक अपनी बायोमेट्रिक जानकारी साझा करने की सहमति दे सकते हैं। इससे उनका फास्ट ट्रैक इमिग्रेशन कार्यक्रम  में स्वतः पंजीकरण  हो जाता है। इससे आव्रजन (इमिग्रेशन) प्रक्रिया तेज़ और आसान हो जाती है। 
  • अपीलीय तंत्र: OCI से संबंधित आदेशों के खिलाफ अपीलों की सुनवाई अब मूल निर्णय लेने वाले प्राधिकरण से एक रैंक उच्च स्तर के अधिकारी द्वारा की जाएगी।

ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया (OCI) योजना के बारे में

  • आरंभ: इसे नागरिकता अधिनियम, 1955 में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2005 के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था।
    • 2015 में, भारतीय मूल के व्यक्ति (PIO) कार्ड योजना का इसमें विलय कर दिया गया था।
  • पात्रता:
    • जो व्यक्ति 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद भारत के नागरिक थे, या 26 जनवरी, 1950 को भारत के नागरिक बनने के पात्र थे।
    • अपवाद: वे लोग जो कभी पाकिस्तान, बांग्लादेश या सरकार द्वारा सूचीबद्ध किसी अन्य देश के नागरिक रहे हैं, इसके लिए पात्र नहीं हैं।
  • लाभ:
    • भारत में एक से अधिक बार आने या बहुउद्देश्यीय कार्यों के लिए आजीवन वीजा मिलना।
    • भारत में कितनी भी लंबी अवधि तक रुकने के लिए पुलिस अधिकारियों को रिपोर्ट करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
    • कृषि या बागवानी परिसंपत्तियों की खरीद को छोड़कर वित्तीय, आर्थिक और शैक्षिक क्षेत्रों में अनिवासी भारतीयों (NRIs) के समान अधिकार दिए गए हैं।
  • यह कार्ड भारत में मतदान करने या संवैधानिक पद धारण करने जैसे राजनीतिक अधिकार प्रदान नहीं करता है।
  • OCI एक अधिकार नहीं, बल्कि एक विशेष सुविधा है। यदि कोई व्यक्ति भारतीय कानूनों का उल्लंघन करता है, तो उसका OCI दर्जा रद्द किया जा सकता है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 को मंजूरी दी। इस विधेयक का उद्देश्य उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करना है। यह विधेयक पारित हो जाने के बाद उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या वर्तमान 33 से बढ़कर 37 (भारत के मुख्य न्यायाधीश/CJI को छोड़कर) हो जाएगी। 

संवैधानिक और विधिक पृष्ठभूमि

  • संविधान के अनुच्छेद 124 के तहत भारत में उच्चतम न्यायालय की स्थापना का प्रावधान है। साथ ही, संसद को समय-समय पर न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है।
    • संसद ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 के माध्यम से प्रारंभ में न्यायाधीशों की संख्या 10 (CJI को छोड़कर) निर्धारित की थी।
    • इसके बाद 1977, 1986, 2008 और 2019 में संशोधनों के माध्यम से उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की गई। 
  • संशोधित कानून लागू होने के बाद, उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम नए न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार को सिफारिश करेगा।
    • भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), कॉलेजियम के सदस्यों के साथ परामर्श करके, उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रस्ताव शुरू करते हैं।
    • कॉलेजियम की सिफारिशें केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री को भेजी जाती हैं, जो उन्हें प्रधानमंत्री को सौंपते हैं। अंत में, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति को न्यायाधीशों की औपचारिक नियुक्ति के लिए सलाह देते हैं। 
  • न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का महत्व: अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से मामलों के त्वरित निपटान में मदद मिलेगीसमय पर न्याय सुनिश्चित होगा और लंबित मामलों में कमी आएगी।  
    • वर्तमान में, उच्चतम न्यायालय में कुल 92,926 मामले लंबित हैं।  

भारत के मुख्य न्यायाधीश ने सिक्किम को देश की पहली पेपरलेस राज्य न्यायपालिका घोषित किया।

  • पूर्णतः पेपरलेस न्यायपालिका एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें सभी न्यायिक प्रक्रियाएं कागज के बजाय डिजिटल माध्यम से पूर्ण की जाती हैं, जैसे-डिजिटल फाइलें, ई-फाइलिंग, ऑनलाइन सुनवाई, डिजिटल केस ट्रैकिंग आदि।
  • न्यायालयों का ऐसा डिजिटल रूपांतरण 'ई-कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट' के तहत किया जा रहा है।

‘ई-कोर्ट मिशन मोड प्रोजेक्ट’ के बारे में

  • यह प्रभावी और सुलभ न्याय सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए न्यायपालिका को कम्प्यूटरीकृत और डिजिटल बनाने की एक अखिल भारतीय पहल है।
  • शुरुआत: इसे राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NeGP) के तहत 2007 में शुरू किया गया था।
  • कार्यान्वयन प्राधिकरण: इसका कार्यान्वयन भारत के उच्चतम न्यायालय की ई-समिति के मार्गदर्शन में भारत सरकार के न्याय विभाग द्वारा किया जाता है। 

त्रिपुरा 'राष्ट्रीय अनुपालन न्यूनीकरण और अविनियमन (National Compliance Reduction and Deregulation) पहल के अविनियमन चरण-II के सभी प्राथमिक क्षेत्रों को पूरा करने वाला पहला राज्य बन गया है।

  • किसी उद्योग या क्षेत्रक पर से सरकारी निगरानी या नियंत्रण को कम करना या समाप्त करना अविनियमन (Deregulation) कहलाता है। 

राष्ट्रीय अनुपालन न्यूनीकरण और अविनियमन पहल के बारे में

  • शुरुआत: कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में वर्ष 2025 में अनुपालन न्यूनीकरण और अविनियमन पर एक कार्यबल का गठन किया गया था।
  • उद्देश्य: अनावश्यक या पुराने नियमों की पहचान करना और उनके सरलीकरण की सिफारिश करना; न्यूनतम विनियमन के सिद्धांतों के अनुरूप कानूनों और प्रक्रियाओं में संशोधन करने के लिए राज्यों का मार्गदर्शन करना।
  • टास्क फोर्स ने 5 व्यापक क्षेत्रकों में 23 प्राथमिकता वाले क्षेत्रकों की पहचान की थी।
  • प्राथमिकता वाले क्षेत्रकों को कवर करने के लिए जनवरी 2026 में चरण-II शुरू किया गया था, जिसमें भूमि, भवन और निर्माण, उपयोगिताएं और अनुमतियां, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य-देखभाल, श्रम और व्यापक सुधार शामिल हैं।

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मनोनीत सदस्य (Nominated Member)

A member of the Rajya Sabha selected by the President of India, as per Article 80 of the Constitution, from individuals with expertise in literature, science, art, and social service. These members can participate in debates but have specific restrictions on voting in certain elections.

पार्टी व्हिप (Party Whip)

यह एक अनुशासन अधिकारी होता है जिसे राजनीतिक दल द्वारा नियुक्त किया जाता है। व्हिप का कार्य पार्टी के सदस्यों को सदन में किसी विशेष मुद्दे पर कैसे मतदान करना है, इसके बारे में निर्देश देना होता है। पार्टी व्हिप का उल्लंघन अयोग्यता का कारण बन सकता है।

91वें संविधान संशोधन अधिनियम (91st Constitutional Amendment Act)

इस अधिनियम ने दलबदल विरोधी कानून को और मजबूत किया, जिसमें पार्टी के विलय के लिए 2/3 सदस्यों की अनिवार्यता जैसे प्रावधान शामिल हैं।

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