NCRB सुरक्षा एजेंसियों की सहायता के लिए ‘अपराध और अपराधियों पर सूचना के भंडार’ के रूप में कार्य करता है।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु (2024)
- जेलों की संख्या: राष्ट्रीय स्तर पर 0.1% (1333 जेल) की वृद्धि हुई।
- जेलों में कैदियों को रखने की वास्तविक क्षमता में 3.3% की वृद्धि हुई है, जबकि जेलों में बंद कैदियों की संख्या में 3.5% की कमी आई है।
- जेलों की ऑक्यूपेंसी दर में गिरावट: 2023 में 120.8% से घटकर 2024 में 112.7% हो गई है।
- जेलों में लैंगिक अनुपात: 95.8% कैदी पुरुष थे; 4.14% महिलाएं थीं; और 122 ट्रांसजेंडर व्यक्ति थे।
- केवल 34 महिला जेल हैं; 21 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों (UTs) में कोई अलग महिला जेल नहीं है।
भारत में जेलों के समक्ष चुनौतियां |
क्षमता से अधिक कैदी: दिल्ली में सर्वाधिक 194.6% की ऑक्यूपेंसी दर दर्ज की गई। इसके बाद मेघालय 163.5% के साथ दूसरे स्थान पर रहा। |
विचाराधीन कैदियों का उच्च अनुपात: कुल कैदियों में विचाराधीन कैदियों का अनुपात 72.61% था। वहीं, दूसरी ओर दोषियों का अनुपात 26.6% रहा। |
कर्मचारियों की कमी: देश भर में 36.84% जेल कर्मचारियों की कमी है। |
बजट का कम उपयोग: वित्त वर्ष 2024-25 के कुल वार्षिक बजट का केवल 82.5% उपयोग किया गया। |
सुरक्षा संबंधी चिंताएं: वर्ष 2024 के दौरान 178 कैदी फरार हो गए। |
सीमित पुनर्वास: वर्ष 2024 के दौरान 1,721 दोषी कैदियों का पुनर्वास किया गया। |
आगे की राह/ सिफारिशें
- उच्चतम न्यायालय द्वारा: मानवाधिकारों की सुरक्षा की जानी चाहिए; खुले जेलों की स्थापना करनी चाहिए (सुहास चकमा मामला 2024); डेटा-आधारित पुनर्वास ट्रैकिंग प्रणाली स्थापित करनी चाहिए।
- न्यायमूर्ति ए.एन. मुल्ला समिति: भारतीय कारागार और सुधारात्मक सेवा (Indian Prisons & Correctional Service) नामक एक अखिल भारतीय सेवा की स्थापना करनी चाहिए, जेलों में विचाराधीन कैदियों की संख्या कम करनी चाहिए, आदि।
- न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय समिति: स्पेशल फ़ास्ट-ट्रैक कोर्ट की स्थापना, सुनवाई के लिए जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की सुविधा देना, आदि।
जेल सुधारों के लिए उठाए गए कदम
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