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उभरती विश्व व्यवस्था (EMERGING WORLD ORDER)

01 Jun 2025
31 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

हाल ही में, बिम्सटेक (BIMSTEC) की एक बैठक में विदेश मंत्री ने रेखांकित किया कि नई विश्व व्यवस्था क्षेत्रीय और एजेंडा-विशेष आधारित होगी।

विश्व व्यवस्था (World Order) के बारे में

  • परिभाषा: विश्व व्यवस्था से तात्पर्य शक्ति और अधिकार की उस व्यवस्था से है, जो वैश्विक स्तर पर कूटनीति एवं विश्व राजनीति के संचालन के लिए एक रूपरेखा प्रदान करती है। 
    • वैश्विक मामलों में, 'व्यवस्था (Order)' का अर्थ है- वह प्रणाली या तरीका जिसके माध्यम से एक देश अन्य देशों के साथ अपने संबंधों का संचालन करता है।

नई विश्व व्यवस्था के उद्भव में योगदान देने वाले कारक

  • युद्धोत्तर बहुपक्षीय व्यवस्था का पतन: उदाहरण के लिए- संयुक्त राष्ट्र, जो कभी वैश्विक गवर्नेंस का एक स्तंभ था, अब पुराना हो चुका है। इसके अतिरिक्त, बहुपक्षवाद अब वैश्विक खतरों के प्रबंधन में प्रभावी नहीं रह गया है।
    • उदाहरण के लिए- संयुक्त राष्ट्र रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा संकट जैसे बड़े संघर्षों का समाधान करने में अप्रभावी रहा है।
  • बहुसंकट और वैश्विक अस्थिरता का उदय: विश्व एक साथ, परस्पर जुड़े संकटों (जैसे- युद्ध, जलवायु परिवर्तन, लोकलुभावनवाद, आदि) का सामना कर रहा है।
    • उदाहरण के लिए- रूस का यूक्रेन पर आक्रमण, व्यापार युद्ध, साइबर युद्ध, महामारी, आदि।
  • क्षेत्रीय और एजेंडा-विशिष्ट भू-राजनीति का उदय: उदाहरण के लिए- उभरती हुई विश्व व्यवस्था स्वतंत्र बहुपक्षीय मंचों को मजबूत करके ग्लोबल साउथ को सशक्त बनाने पर जोर देती है।
    • उदाहरण के लिए- ब्रिक्स (BRICS) का उद्देश्य पारंपरिक वैश्विक शक्तियों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ाना है।
    • विश्व में एक बदलाव दिखाई दे रहा है, जहां "पश्चिम विरोधी" होने की बजाय, "गैर-पश्चिम" को महत्त्व दिया जा रहा है।
  • बहुध्रुवीयता का उदय: उभरती नई विश्व व्यवस्था पर अब एक (एकध्रुवीय) या दो (द्विध्रुवीय) महाशक्तियों का वर्चस्व नहीं है, बल्कि स्वायत्तता का दावा करने वाले कई प्रभावशाली राष्ट्रों द्वारा इसे आकार दिया जा रहा है।
    • उदाहरण के लिए- भारत ने यूक्रेन संघर्ष के दौरान रूस की निंदा करने वाले संयुक्त राष्ट्र द्वारा कराए गए मतदान से दूर रहकर और 'रणनीतिक स्वायत्तता' बनाए रख कर अपने स्वतंत्र रुख का प्रदर्शन किया।
  • रणनीतिक स्व-सहायता का उदय: विदेश मंत्री एस. जयशंकर के अनुसार, "विश्व स्व-सहायता के युग की ओर बढ़ रहा है। विश्व के हर क्षेत्र को अपना ध्यान स्वयं रखने की आवश्यकता है- चाहे वह भोजन, ईंधन, उर्वरक, वैक्सीन या त्वरित आपदा प्रतिक्रिया हो।"
    • उदाहरण के लिए- छोटी आपूर्ति श्रृंखलाएं (नियर शोरिंग) और निकटतम पड़ोसी (जैसे- बिम्सटेक देश) अब बहुत अधिक महत्त्व रखने लगे हैं।

उभरती विश्व व्यवस्था में भारत के लिए अवसर

  • ग्लोबल साउथ की अभिव्यक्ति के रूप में भारत: भारत का बहुलवादी व गैर-पश्चिमी लोकतांत्रिक मॉडल मौजूदा विश्व व्यवस्था के लिए एक विकल्प प्रदान करता है। ध्यातव्य है कि पश्चिमी मॉडल ग्लोबल साउथ की जरूरतों की उपेक्षा करता आया है।
    • उदाहरण के लिए- भारत ने "वसुधैव कुटुम्बकम" थीम के तहत G-20 की मेजबानी की थी। भारत ग्लोबल साउथ का प्रत्येक मंच पर समर्थन करता है और "विश्व-मित्र" बनने की आकांक्षा रखता है।
    • उदाहरण के लिए- भारत ने विकासशील देशों के बीच संवाद को बढ़ावा देने के लिए "वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ समिट्स" का आयोजन किया था।
  • संतुलित बहुध्रुवीयता: शक्ति का संतुलित बंटवारा वैश्विक स्तर पर एकध्रुवीय प्रभुत्व को चुनौती दे सकता है तथा सहयोगात्मक एवं लोकतांत्रिक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था को प्रोत्साहित कर सकता है।
    • उदाहरण के लिए- ब्रिक्स, SCO, क्वाड और G20 में भारत की संतुलनकारी स्थिति। 
  • मुद्दा-आधारित सहयोग (खाद्य, तकनीक, जलवायु परिवर्तन, आदि): यह सहयोग सुगठित व सक्षम मंचों के माध्यम से निभाया जा रहा है। 
    • उदाहरण के लिए- बिम्सटेक का कनेक्टिविटी और आपदा प्रबंधन पर फोकस; इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क (IPEF); आदि।
  • डिजिटल और तकनीकी नेतृत्व: भारत CoWIN, UPI और ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) जैसे प्लेटफॉर्म्स के साथ डिजिटल रूप से अग्रणी देशों की श्रेणी में आ गया है।
  • जलवायु कूटनीति: भारत हरित संवृद्धि और जलवायु वित्त सुधार को बढ़ावा दे रहा है।
    • उदाहरण के लिए- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance: ISA); आपदा रोधी अवसंरचना के लिए गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure: CDRI) आदि।
  • सांस्कृतिक और सभ्यतागत सॉफ्ट पावर: विभाजित विश्व में एकजुट करने वाली शक्ति के रूप में भारत के सभ्यतागत लोकाचार को बढ़ावा देना।
    • उदाहरण के लिए- अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस, भारतीय प्रवासी कूटनीति, आसियान देशों के साथ बौद्ध धर्म कूटनीति, आदि।

उभरती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका के समक्ष मौजूद चुनौतियां

  • राष्ट्रीय हितों के कारण वैश्विक सहयोग का विखंडन: उदाहरण के लिए- अमेरिका द्वारा विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अपीलीय निकाय में नई नियुक्तियों को रोकने से WTO का विवाद निपटान तंत्र कमजोर हो गया है।
    • इसलिए, निष्क्रिय वैश्विक संस्थाएं भारत की व्यापार क्षमता में बाधा डालती हैं। यह वैश्विक व्यापार में इसकी कम हिस्सेदारी (2023 में 4.3%) में परिलक्षित होती है।
  • जलवायु न्याय के मामले में मतभेद: जलवायु वित्त और जिम्मेदारी पर विकसित और विकासशील देशों के मत अलग-अलग हैं।
    • उदाहरण के लिए- COP27 में हानि और क्षति कोष (Loss & Damage Fund) बनाने पर बहस। 
  • भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रवाद: वैश्विक संस्थाओं से क्षेत्रीय/ अनौपचारिक गठबंधनों को महत्त्व देने की ओर बदलाव से विभिन्न देशों के बीच आम सहमति का निर्माण कर पाना बहुत कठिन है।
  • विवैश्वीकरण (Deglobalization): राष्ट्रवाद और संरक्षणवाद आर्थिक अंतर-निर्भरता को कम करते हैं।
    • उदाहरण के लिए- 
      • अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध। 
      • यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (Carbon Border Adjustment Mechanism: CBAM) भारत द्वारा यूरोपीय संघ को किए जाने वाले निर्यात को महंगा कर देगा।
  • अन्य चुनौतियां: प्रतिस्पर्धी वैश्विक शक्तियों (अमेरिका और चीन) के साथ संबंधों को संतुलित करना; जमीनी स्तर पर कूटनीतिक उपस्थिति बढ़ाना; लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवादों का समाधान करना; क्षेत्रीय तनावों का प्रबंधन करना; आदि।

निष्कर्ष

जैसे-जैसे नई विश्व व्यवस्था उभर रही है, विभिन्न राष्ट्रों के मध्य संबंधों, व्यवहारों और सिद्धांतों की नई परिभाषा जन्म ले रही है। इसलिए भारत को निष्पक्ष, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार वैश्विक नियमों एवं संस्थानों के निर्माण का नेतृत्व करके अपने बहुध्रुवीय विजन को कार्रवाई में बदलने के लिए इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।

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