स्वामित्व योजना के 5 वर्ष (5 YEARS OF SVAMITVA SCHEME) | Current Affairs | Vision IAS
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स्वामित्व योजना के 5 वर्ष (5 YEARS OF SVAMITVA SCHEME)

01 Jun 2025
38 min

सुर्ख़ियों में क्यों?

स्वामित्व योजना ने अपने शुभारंभ के 5 वर्ष पूरे कर लिए हैं। स्वामित्व से आशय है- ग्रामीण क्षेत्रों में उन्नत प्रौद्योगिकी के द्वारा गांवों का सर्वेक्षण और मानचित्रण (Survey of Villages and Mapping with Improvised Technology in Village Areas: SVAMITVA)।   

स्वामित्व योजना के बारे में

  • शुरुआत: वर्ष 2020 
  • क्रियान्वयन करने वाली संस्थाएं: यह योजना केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय, राज्य राजस्व विभाग, राज्य पंचायती राज विभाग और भारतीय सर्वेक्षण विभाग के सहयोगात्मक प्रयासों से लागू की जा रही है।
  • प्रौद्योगिकी साझेदार: भारतीय सर्वेक्षण विभाग और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र सेवा इंक (National Informatics Centre Services Inc: NICSI)
  • योजना के मुख्य घटक:
    • कंटीन्यूअस ऑपरेटिंग रेफरेंसिंग सिस्टम (CORS) नेटवर्क की स्थापना: यह सटीक भू-संदर्भ/ जियो-रेफरेंसिंग और भूमि सीमांकन के लिए ग्राउंड कंट्रोल पॉइंट स्थापित करता है।
    • ड्रोन मैपिंग: भारतीय सर्वेक्षण विभाग ड्रोन का उपयोग करके ग्रामीण बसावटों का मानचित्र बनाता है। इससे संपत्ति का सटीक मानचित्र या नक्शा तैयार करके भू स्वामित्व अधिकार जारी किया जाता है। 
    • सूचना, शिक्षा और संचार (Information, Education, and Communication: IEC) पहल: जागरूकता कार्यक्रम से स्थानीय आबादी को योजना के तरीकों और लाभों के बारे में शिक्षित किया जाता है।
    • ग्राम मानचित्र में सुधार: ड्रोन सर्वेक्षणों से प्राप्त डिजिटल स्थानिक डेटा ग्राम पंचायत विकास योजना बनाने वाले विश्लेषणात्मक टूल्स को सशक्त बनाता है।

स्वामित्व योजना का महत्व 

  • कानूनी रूप से सशक्तीकरण और विवाद समाधान: यह योजना संपत्ति कार्ड जारी करके ग्रामीण क्षेत्रों में संपत्ति अधिकारों को कानूनी मान्यता प्रदान करती है। इससे करोड़ों ग्रामीणों के जीवन में बदलाव आ रहा है।
    • अब तक भारत भर में 1,30,633 संपत्ति कार्ड वितरित किए जा चुके हैं, जिससे लंबे समय से चले आ रहे भूमि विवादों का समाधान हुआ है।
  • वित्तीय समावेशन के माध्यम से आर्थिक परिवर्तन: स्वामित्व योजना के तहत जारी किए गए संपत्ति कार्ड को बैंकों से ऋण लेने हेतु जमानत रखने वाली संपदा (कोलेटरल) के रूप में उपयोग किया जा सकता है। इससे पहले सम्पति कार्ड जारी नहीं किए जाते थे। 
    • अब तक 67,000 वर्ग किलोमीटर ग्रामीण आवासीय भूमि का सर्वेक्षण किया गया है, जिसकी अनुमानित कीमत 132 लाख करोड़ रुपये है। यह उपलब्धि इस पहल के आर्थिक महत्व को दर्शाती है।
  • गवर्नेंस में क्रांति और संसाधनों का इष्टतम उपयोग: महाराष्ट्र के एखातपुर-मुंजवडी जैसे गांवों में अद्यतन किए गए भू-अभिलेख के कारण स्वयं के स्रोतों से राजस्व सृजन में वृद्धि हुई है। वहीं मध्य प्रदेश के बिलकिसगंज ग्राम पंचायत ने हाथ से बने अस्थायी नक्शों की जगह डेटा-आधारित स्थानिक योजना (Spatial planning) को अपनाया है।
    • यह परिवर्तन संसाधनों के प्रभावी तरीके से आवंटन में मदद करता है, सेवा वितरण में सुधार करता है, और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को सशक्त बनाता है।
  • ग्रामीण विकास में तकनीकी इनोवेशन: यह योजना सर्वे-ग्रेड ड्रोन और कंटीन्यूअस ऑपरेटिंग रेफरेंसिंग सिस्टम (CORS) नेटवर्क के इनोवेटिव उपयोग के माध्यम से ग्रामीण भूमि का नक्शा तैयार करने में तकनीकी क्रांति ला रही है।
    • उपर्युक्त दोनों तकनीकें सम्मिलित रूप से बहुत तेजी और सटीकता से हाई-रिज़ॉल्यूशन नक्शे तैयार करती हैं। इससे ग्रामीण भूमि के सीमांकन में व्यापक सुधार देखा जा रहा है।
    • इस तकनीकी प्रगति के कारण, स्वामित्व योजना के तहत उल्लेखनीय सफलता हासिल हुई है। जैसे कि 31 राज्यों/ केंद्रशासित प्रदेशों में अधिसूचित गांवों में से 92% में ड्रोन सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है।
  • ग्रामीण जीवन में व्यापक परिवर्तन और योजना निर्माण में मदद: हरियाणा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में, जहाँ ड्रोन सर्वेक्षण और संपत्ति कार्ड तैयार करने की प्रक्रिया 100% पूर्ण हो चुकी है, यह योजना ग्रामीण विकास के लिए एक सुव्यवस्थित और टिकाऊ मॉडल प्रस्तुत करती है। यह आने वाली अनेक चुनौतियों का योजनाबद्ध तरीके से समाधान करने की क्षमता रखती है।

योजना के क्रियान्वयन में चुनौतियां

  • संपत्ति कार्ड की कानूनी वैधता स्पष्ट नहीं होना: कई वित्तीय संस्थाएं संपत्ति कार्ड को स्वामित्व का निर्णायक प्रमाण नहीं मानतीं। इसे प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है कि राज्य सरकारें राजस्व अधिनियमों के तहत संपत्ति कार्ड को स्टाम्प ड्यूटी योग्य दस्तावेज के रूप में अधिसूचित करें। 
    • कानूनों में संशोधनों के बिना, संपत्ति कार्ड "केवल एक और कानूनी दस्तावेज बनकर रह जाएगा जो निर्णायक रूप से भू-स्वामित्व साबित नहीं करता है"।
  • अलग-अलग राज्यों में भूमि-कानून और रिकॉर्ड रखने की पद्धतियां अलग-अलग: राज्यों में भूमि रिकॉर्ड को प्रशासित करने वाले कानून अलग-अलग हैं। साथ ही भूमि रिकॉर्ड रखने की पद्धतियां भी अलग-अलग हैं।
    • आंध्र प्रदेश भू-अभिलेख के मामले में पंजीकृत और अपंजीकृत, दोनों प्रकार की देनदारियों का रिकॉर्ड रखता है, जबकि कई अन्य राज्य केवल पंजीकृत बंधकों (Mortgages) का ही रिकॉर्ड रखते हैं।
  • संपत्ति कर संग्रह के सीमित अधिकार: सभी ग्राम पंचायतों को संपत्ति कर एकत्र करने का अधिकार नहीं है।
    • ओडिशा जैसे राज्यों ने ग्राम पंचायतों को संपत्ति कर एकत्र करने का अधिकार नहीं दिया है।
    • उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में, केवल जिला पंचायतें (ग्राम पंचायतें नहीं) संपत्ति कर एकत्र करती हैं।
  • वंचित समुदायों को अधिक सुरक्षा नहीं: भूमिहीन किसानों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं जैसे उपेक्षित समुदायों के भूमि अधिकारों की अनदेखी का जोखिम बना रहता है, क्योंकि प्रभावशाली वर्ग प्रायः अपने हित में भूमि प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
    • वंचित या उपेक्षित समुदायों के भू-अधिकारों को मान्यता देने वाले राज्यों के कानूनों में एकरूपता की भी कमी है।
      • उदाहरण के लिए, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्य बेटियों को सहदायिकी/ सह-स्वामित्व अधिकार (Coparcenary rights) प्रदान करते हैं, लेकिन कई राज्यों में इस तरह के अधिकार नहीं मिले हुए हैं।
        • कोपार्सेनरी से आशय है हिंदू संयुक्त परिवार की संपत्ति में सह-स्वामियों या संयुक्त स्वामियों के बीच संपत्ति के विभाजन का अधिकार। 
  • डेटा प्रबंधन और नियमों के अनुपालन की चुनौतियां: विभिन्न स्तरों पर नियमों का अनुपालन कैसे सुनिश्चित किया जाएगा, इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। साथ ही, पारदर्शिता बनाए रखने के लिए गैर-व्यक्तिगत भूमि डेटा को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराने से संबंधित प्रावधान भी अस्पष्ट हैं।

आगे की राह

  • कानूनी प्रावधानों में सुधार करना चाहिए: राज्य के राजस्व अधिनियमों में संशोधन करके संपत्ति कार्ड को स्टाम्प ड्यूटी योग्य दस्तावेजों की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वित्तीय संस्थाएं इन्हें वैध और स्वीकार्य दस्तावेज के रूप में मान्यता दे सकें।
  • भू-अभिलेख की प्रक्रिया का मानकीकरण: संपत्ति कार्ड पर सभी देनदारियों को दर्ज करने के लिए एक समान प्रक्रिया विकसित की जाए। व्यवस्थित तरीके से भू-अभिलेख रखने की प्रक्रिया अपनाने के लिए राजस्व अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाए।
  • स्थानीय शासन को सशक्त बनाना: सभी ग्राम पंचायतों को संपत्ति कर संग्रह करने का अधिकार देने के लिए कानून में संशोधन किया जाना चाहिए। साथ ही, सर्वेक्षण के दौरान जमीनी स्तर पर सत्यापन के माध्यम से सटीक मूल्यांकन हेतु संपत्ति वर्गीकरण की सही प्रणाली लागू की जानी चाहिए।
  • उपेक्षित/ वंचित समुदायों की सुरक्षा: भू-सर्वेक्षकों को अनुसूचित जाति/ जनजाति समूहों, महिलाओं और बंटाईदार किसानों के अधिकारों को मान्यता देने हेतु प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। भू-नक्शा बनाने और उसे दस्तावेज के रूप में रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया में समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • डेटा प्रबंधन में सुधार करना: पारदर्शिता बढ़ाने के लिए गैर-व्यक्तिगत भूमि डेटा को सार्वजनिक रूप से सुलभ कराया जाना चाहिए। सभी राज्यों में एक समान भू-स्थानिक डेटा मानक लागू किए जाएं ताकि डेटा साझा करने और इनके प्रबंधन के लिए स्पष्ट शासकीय व्यवस्था तैयार हो सके।

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