वर्तमान स्केल आधारित विनियामक (SBR) फ्रेमवर्क के अनुसार, NBFCs को चार स्तरों में वर्गीकृत किया गया है – बेस, मिडिल, अपर और टॉप लेयर्स।
RBI द्वारा प्रस्तावित संशोधन
- अपर लेयर NBFCs के लिए नया मानदंड: अब 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक की कुल परिसंपत्ति रखने वाली NBFC को सीधे अपर लेयर में रखा जाएगा। इससे पहले एक जटिल स्कोरिंग मॉडल था, जिसमें परिसंपत्ति के आकार के आधार पर केवल शीर्ष 10 NBFCs ही चुने जाते थे।
- समय-समय पर समीक्षा: इस परिसंपत्ति सीमा की प्रत्येक 5 वर्षों में समीक्षा की जाएगी।
- सरकारी NBFCs का समावेशन: सरकारी स्वामित्व वाली संस्थाएं (जैसे नाबार्ड, एक्ज़िम बैंक, और सिडबी) अब छूट के लिए पात्र नहीं होंगी। उन्हें भी निजी NBFC-अपर लेयर के समान सख्त नियमों का अनुपालन करना होगा।
- असीमित राज्य गारंटी: अब अपर लेयर NBFC को राज्य सरकार की गारंटी का उपयोग क्रेडिट जोखिम को कम करने के लिए बिना किसी तय सीमा के करने की अनुमति दी जाएगी।
गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) क्या है?
- परिभाषा: NBFC एक ऐसी कंपनी है जो कंपनी अधिनियम, 1956 या कंपनी अधिनियम, 2013 के तहत पंजीकृत है, तथा ऋण और अग्रिम प्रदान करती है; शेयरों, स्टॉक, बॉण्ड, डिबेंचर और प्रतिभूतियों में निवेश करती है।
- विनियमन: NBFCs का विनियमन मुख्य रूप से RBI द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के अध्याय III B के तहत किया जाता है।
- हालांकि, अधिकार क्षेत्र में टकराव से बचने के लिए कुछ विशिष्ट प्रकार की गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं अन्य विनियामक निकायों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।
- उदाहरण के लिए: बीमा कंपनियों का विनियमन IRDAI द्वारा, स्टॉक ब्रोकिंग और मर्चेंट बैंकिंग का विनियमन SEBI द्वारा, आदि।
- हालांकि, अधिकार क्षेत्र में टकराव से बचने के लिए कुछ विशिष्ट प्रकार की गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाएं अन्य विनियामक निकायों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं।

बैंकों और NBFCs के बीच अंतर
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