उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बहुसंख्यकवाद, संविधानवाद को दबा नहीं सकता | Current Affairs | Vision IAS

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हाल ही में, उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है, जहाँ बहुमत का शासन चलता है, लेकिन न्यायालयों का यह कर्तव्य है कि वे सरकार या बहुमत के निर्णयों को संविधान के सिद्धांतों और मूल्यों के आधार पर परखें।

  • उपर्युक्त टिप्पणी “धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार” के विस्तार की समीक्षा कर रही नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा की गईं।

संविधानवाद (Constitutionalism) के बारे में

  • इसका तात्पर्य एक ऐसी व्यवस्था से है जिसमें सरकार की शक्तियाँ संविधान द्वारा सीमित होती हैं।
  • महत्व:
    • अधिकारों की रक्षा करता है: यह राज्य (सरकार) के हस्तक्षेप से मूलभूत स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है।
    • विधि के शासन का संरक्षण करता है: यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष और स्थिर कानूनों का संरक्षण प्राप्त हो। जैसे - अनुच्छेद 14  के तहत ‘विधि के समक्ष समता का अधिकार’।
    • लोकतंत्र की रक्षा करता है: यह निष्पक्ष चुनावों की गारंटी देता है और सुनिश्चित करता है कि सत्ता जनता में निहित रहे
    • जवाबदेही सुनिश्चित करता है: सरकार के कामकाज को पारदर्शी बनाए रखने के लिए CAG जैसी संस्थाओं के माध्यम से स्वतंत्र निगरानी करता है।
    • शक्तियों का पृथक्करण सुनिश्चित करता है: सरकार की शक्तियों को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित किया जाता है, ताकि कोई एक संस्था अत्यधिक शक्तिशाली न बन सके।
    • बहुसंख्यकवाद को नियंत्रित करता है: यह सुनिश्चित करता है कि बहुमत का शासन अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों के अधिकारों का उल्लंघन न करे। 
      • उदाहरण के लिए: संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 भाषाई तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करते हैं।

संविधानवाद के समक्ष चुनौतियां

  • सत्तावादी (Authoritarian) प्रवृत्तियों का बढ़ना, जो संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करता है।
  • न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach), जो शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को चुनौती देता है। 
  • शासन संबंधी समस्याएं (जैसे-भ्रष्टाचार), जो लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को कम कर सकती हैं।

संविधानवाद से संबंधित प्रमुख न्यायिक निर्णय:

  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद: इसमें 'मूल संरचना के सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) की अवधारणा सामने आई। न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि संविधान संशोधन संविधान के मूल सिद्धांतों को नहीं बदल सकते।
  • रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) वाद: न्यायालय ने कहा कि संविधानवाद  विधि के शासन पर आधारित है, और यह निरंकुशता (absolutism) को खारिज करती है। 
  • आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) वाद: इसमें कहा गया कि संविधानवाद के सिद्धांत की रक्षा के लिए सरकार की शक्ति पर नियंत्रण आवश्यक है ताकि लोकतांत्रिक सिद्धांत कमजोर न हों।
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CAG

Comptroller and Auditor General of India is a constitutional authority responsible for auditing the accounts of the Union and State governments. CAG reports highlight financial irregularities, inefficiencies, and policy deviations, making them crucial for governance analysis in UPSC.

बहुमत का शासन

लोकतांत्रिक प्रणाली में शासन का एक तरीका जहाँ निर्णय बहुमत के वोट द्वारा लिए जाते हैं, लेकिन यह सिद्धांत अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों के अधिकारों के उल्लंघन की सीमा तक नहीं जा सकता।

मूल संरचना का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)

केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत, जिसके अनुसार संविधान में संशोधन किया जा सकता है, लेकिन उसके मूल सिद्धांतों या मूल संरचना को नहीं बदला जा सकता।

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