TERI ने एक रिपोर्ट में भारत द्वारा 2047 तक 100 GW परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य प्राप्त करने का रोडमैप बताया | Current Affairs | Vision IAS

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वर्तमान में, देश में सात स्थलों पर 25 परमाणु रिएक्टर्स संचालित हैं। इनकी कुल परमाणु ऊर्जा स्थापित क्षमता 8.8 गीगावाट (GW) है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

  • क्षमता विस्तार: बड़े दाबित भारी जल रिएक्टर्स (PHWRs) को निरंतर और स्थिर बिजली आपूर्ति (बेस लोड पावर) का मुख्य आधार बनाना होगा। वहीं, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) का उपयोग इस्पात और सीमेंट जैसे उन क्षेत्रकों में किया जाएगा जहाँ कार्बन उत्सर्जन कम करना कठिन है (hard-to-abate) है।
    • स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लघु रूप हैं। ये रिएक्टर्स प्रति मॉड्यूल 300 मेगावाट तक विद्युत उत्पन्न करते हैं। इन रिएक्टर्स के निम्नलिखित लाभ हैं –
      • मॉड्यूलर संरचना: कारखानों में बने हिस्सों के कारण इन्हें शीघ्र जोड़ा जा सकता है और लागत कम होती है।
      • क्षमता विस्तार की सुविधा: ऊर्जा की बढ़ती मांग के अनुसार इनकी क्षमता चरणबद्ध तरीके से बढ़ाई जा सकती है।
      • बेहतर सुरक्षा: इनमें पैसिव सुरक्षा प्रणाली होती है, जिससे किसी आपात स्थिति में इंसानों के बिना हस्तक्षेप के स्वतः शटडाउन संभव होता है।
  • बड़े पैमाने पर निवेश जुटाने की आवश्यकता: परमाणु ऊर्जा की स्थापित क्षमता बढ़ाने के लिए लगभग ₹23-25 लाख करोड़ के अनुमानित पूंजीगत व्यय की आवश्यकता होगी।
  • कार्यबल का विस्तार: केवल निर्माण चरण में ही 1.2–2 लाख कर्मियों की आवश्यकता होगी, जिसके लिए विशेष कौशल प्रशिक्षण में बड़े स्तर पर प्रयास करने होंगे। 

भारत के समक्ष चुनौतियां

  • स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स के उपयोग और निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए वर्तमान विनियामक व्यवस्था पुरानी पड़ चुकी है।
  • शांति अधिनियम / SHANTI Act (2025) में ऐसे रिएक्टर्स के परिचालन पर स्पष्ट नियमों, परियोजना के स्वामित्व और निजी क्षेत्र की भागीदारी पर वित्तीय मॉडल पर स्पष्टता का अभाव है।
  • उच्च पूंजीगत लागत (₹20-25 करोड़ प्रति मेगावाट), परमाणु ईंधन के लिए आयात पर अधिक निर्भरता और परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर भी समस्याएं हैं।
  • विशिष्ट कौशल वाले कर्मियों की कमी है। लोगों के मन में परमाणु ऊर्जा के खतरों को लेकर अभी भी आशंकाएं विद्यमान हैं।

रिपोर्ट में की गईं प्रमुख सिफारिशें

  • ग्रीन फाइनेंसिंग: वैश्विक पर्यावरण, सामाजिक और सुशासन (ESG) निवेश को आकर्षित करने के लिए परमाणु ऊर्जा को भारत की ग्रीन टैक्सोनॉमी में शामिल किया जाना चाहिए।
  • विनियामकीय सुधार: परमाणु ऊर्जा विनियामक बोर्ड (AERB) को स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स के लिए चरणबद्ध एवं डिज़ाइन-प्रमाणित लाइसेंसिंग प्रणाली अपनानी चाहिए तथा योजना स्थल के चयन के नियमों को अद्यतन करना चाहिए।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए नियमों में स्पष्टता लाना: SHANTI अधिनियम के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी/विशेष प्रयोज्य वाहन (PPP/SPV) मॉडल को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना चाहिए। जैसे कि निजी संस्थाओं द्वारा पूंजी प्रदान करना चाहिए और NPCIL को रिएक्टर की सुरक्षा या परिचालन का दायित्व निभाना चाहिए।
  • कौशल विकास: कार्यबल का तेजी से प्रशिक्षण के लिए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (ITIs) के माध्यम से "परमाणु मित्र" कार्यक्रम शुरू किए जाए।
  • अन्य सुझाव: परमाणु ईंधन और परमाणु अपशिष्ट के लिए एक केंद्रीकृत राष्ट्रीय ढांचा बनाया जाए। साथ ही, परमाणु ऊर्जा पर पारदर्शी जनसंपर्क के लिए एक विशेष कोष स्थापित किया जाए।
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पर्यावरण, सामाजिक और सुशासन (ESG / Environmental, Social, and Governance)

यह एक निवेश विश्लेषण का ढाँचा है जिसका उपयोग किसी कंपनी के संचालन में स्थिरता और नैतिक प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है। ESG निवेश को आकर्षित करना कंपनियों और देशों के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

परमाणु ऊर्जा विनियामक बोर्ड (AERB / Atomic Energy Regulatory Board)

यह भारत में परमाणु ऊर्जा के उपयोग के संबंध में विकिरण सुरक्षा और सुरक्षा के विनियमन के लिए जिम्मेदार एक वैधानिक निकाय है।

विशेष प्रयोज्य वाहन (SPV / Special Purpose Vehicle)

यह एक कानूनी इकाई है जिसे एक विशिष्ट, सीमित उद्देश्य के लिए बनाया जाता है, जैसे कि एक परियोजना को वित्तपोषित करना या एक विशिष्ट लेन-देन को पूरा करना। PPP मॉडल में इसका उपयोग परिसंपत्तियों को अलग करने और जोखिमों को प्रबंधित करने के लिए किया जा सकता है।

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