सुर्ख़ियों में क्यों?
वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग (DEA) ने देश में अवसंरचना विकास को सुव्यवस्थित करने के लिए एक तीन वर्षीय PPP परियोजना पाइपलाइन तैयार की है।

अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- यह कदम केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित ₹12.2 लाख करोड़ के सार्वजनिक पूंजीगत परिव्यय (Capex) के अनुसरण में उठाया गया है।
- सार्वजनिक पूंजीगत परिव्यय वित्त वर्ष 2014-15 के ₹2 लाख करोड़ से बढ़कर बजट अनुमान (BE) 2025-26 में ₹11.2 लाख करोड़ हो गया है।
- यह पाइपलाइन एक संगठित रूपरेखा प्रदान करती है और संभावित पीपीपी परियोजनाओं की प्रारंभिक दृश्यता सुनिश्चित करती है। इससे निवेशकों, डेवलपर्स और अन्य हितधारकों को सुविज्ञ नियोजन और निवेश संबंधी निर्णय लेने में सहायता मिलेगी।
- इस PPP परियोजना पाइपलाइन में केंद्रीय अवसंरचना मंत्रालयों और राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की 852 परियोजनाएं शामिल हैं, जिनकी कुल संयुक्त परियोजना लागत ₹17 लाख करोड़ से अधिक है।
PPP के बारे में
- अर्थ: यह सार्वजनिक परिसंपत्तियों या सेवाओं के प्रावधान के लिए सरकार और निजी क्षेत्रक की इकाई के बीच एक व्यवस्था है, जिसे एक अनुबंध के माध्यम से निष्पादित किया जाता है। इस अनुबंध में प्रत्येक पक्ष के उत्तरदायित्वों की रूपरेखा स्पष्ट रूप से निर्धारित होती है।
- भारत में प्रवृत्तियां: विश्व बैंक की अवसंरचना में निजी भागीदारी (PPI) रिपोर्ट 2024 के अनुसार, निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों के बीच अवसंरचना क्षेत्र में निजी निवेश के संदर्भ में भारत निरंतर वैश्विक स्तर पर शीर्ष पांच देशों में स्थान प्राप्त करता रहा है।
- भारत दक्षिण एशिया में PPI निवेश का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता बनकर उभरा है, जिसका इस क्षेत्र के कुल निजी अवसंरचना निवेश में 90% से अधिक हिस्सा है।
- सार्वजनिक निजी भागीदारी मूल्यांकन समिति (PPPAC) द्वारा ₹5.6 लाख करोड़ की कुल परियोजना लागत (TPC) वाली 129 परियोजनाओं की सिफारिश की गई है [वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 (04 दिसंबर 2025 तक)]।

PPP के अंतर्गत प्रमुख निवेश मॉडल | |
निर्माण, संचालन और हस्तांतरण (BOT) {Build, Operate and Transfer (BOT)} | निजी भागीदार द्वारा परियोजना का डिजाइन, निर्माण और (अनुबंध अवधि के दौरान) संचालन किया जाता है। तत्पश्चात सुविधा को पुनः सार्वजनिक क्षेत्रक (सरकार) को हस्तांतरित कर दिया जाता है। उदाहरण: राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाएं। |
पट्टा, संचालन और हस्तांतरण (LOT) {Lease, Operate and Transfer (LOT)} | पहले से मौजूद सुविधा को (पारस्परिक रूप से तय शर्तों के आधार पर) निजी क्षेत्रक को सौंपा जाता है और अनुबंध समाप्त होने पर उसे सरकार को वापस हस्तांतरित कर दिया जाता है। |
निर्माण, स्वामित्व, संचालन या हस्तांतरण (BOOT) {Build, Own, Operate or Transfer (BOOT)} | निजी भागीदार द्वारा अपना निवेश वसूल कर लेने के बाद, अनुबंध अवधि के अंत में सुविधा सरकार को हस्तांतरित कर दी जाती है। |
इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण (EPC) {Engineering, Procurement and Construction (EPC)} | सरकार अपनी आवश्यकताएं बताती है और ठेकेदार विस्तृत इंजीनियरिंग डिजाइन तैयार करता है, सभी सामग्री/उपकरण की खरीद करता है और फिर सरकार को एक कार्यात्मक सुविधा सौंपने के लिए निर्माण कार्य संपन्न करता है। |
हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) {Hybrid Annuity Model (HAM)} | यह EPC (40%) और BOT-एन्युटी (60%) की मिश्रित व्यवस्था है। सरकार कुल परियोजना लागत का 40% हिस्सा जारी करती है, जबकि शेष 60% राशि की व्यवस्था डेवलपर द्वारा की जाती है। |
अवसंरचना विकास में PPP मॉडल का महत्त्व
- निजी क्षेत्रक की दक्षता: निजी क्षेत्रक प्रतिस्पर्धात्मक दबावों के प्रति संवेदनशील होता है, जिससे परियोजना के पूंजीगत चरणों (डिजाइन, निर्माण) और परिचालन चरणों के निष्पादन में उसे बढ़त मिलती है।
- निजी क्षेत्रक गुणवत्ता, कुशल जनशक्ति और आधुनिक तकनीक तक पहुंच बनाने तथा अपने कर्मचारियों, आपूर्तिकर्ताओं और विक्रेताओं को प्रदर्शन के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने के लिए बेहतर स्थिति में होता है।
- परियोजनाओं के जीवन चक्र लागत पर ध्यान: परियोजना के डिजाइन और निर्माण के अतिरिक्त, निजी भागीदार जारी संचालन एवं रखरखाव (O&M) भी प्रदान करता है। उसके पास यह सुनिश्चित करने का प्रोत्साहन होता है कि डिजाइन और निर्माण इस प्रकार का हो जो कुशल संचालन एवं रखरखाव को सुगम बनाए।
- पारदर्शिता और जवाबदेही में वृद्धि: यह पारंपरिक खरीद के विपरीत है, जहां सार्वजनिक इकाई स्वयं ही सेवा प्रदाता और स्वयं ही उसकी निगरानी करने वाली होती है। इससे वह स्वयं की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाने में संकोच कर सकती है।
- निजी क्षेत्रक के वित्त तक पहुंच: PPP मॉडल सार्वजनिक अवसंरचना के विकास में निजी वित्त का लाभ उठाने की अनुमति देते हैं। इससे सरकार के पास उधार लिए बिना सामाजिक और अन्य प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में निवेश करने के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध रहते हैं।
- कारोबार की सुगमता को बढ़ावा: भारत का लक्ष्य PPP सुधारों के माध्यम से लॉजिस्टिक्स लागत को घटाकर 10% से नीचे लाना है।
- वर्तमान में विकसित देशों में लॉजिस्टिक्स लागत लगभग 8-9% के आसपास रहती है।
भारत के प्रमुख क्षेत्रकों में PPP (PPP in Key Sectors of India)
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PPP के समक्ष प्रमुख चुनौतियां
- अनुबंध संबंधी अनिश्चितताएं: PPP परियोजनाएं प्रायः दीर्घकालिक अवधि (जैसे 15-30 वर्ष, या परिसंपत्ति का जीवनकाल) के लिए होती हैं। इसमें भविष्य की आवश्यकताओं के अनुसार अनुबंध में संशोधन करने में भारी लागत निहित हो सकती है।
- आक्रामक बोली: निजी क्षेत्रक प्रायः अपर्याप्त गहन जांच-पड़ताल के साथ अत्यधिक आक्रामक बोली लगाता है, जिससे अव्यावहारिक प्रस्ताव सामने आते हैं और परिणामतः परियोजनाएं विफल हो जाती हैं।
- नियामक परिवेश: सरकारों और विधानों में परिवर्तन का PPP परियोजनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इससे घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय वित्तपोषण को आकर्षित करने में समस्या उत्पन्न होती है।
- मांग और पूर्वानुमान संबंधी अनिश्चितताएं: मांग का गलत पूर्वानुमान (जैसे टोल रोड पर यातायात का अत्यधिक आकलन करना) निजी भागीदार के राजस्व को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है, जिससे पहले ही 'धन की किफायती मूल्य' (Value for Money - VFM) सिद्ध करना कठिन हो जाता है।
भारत में PPP को सुदृढ़ करने हेतु प्रारंभ की गई प्रमुख पहलें (Key initiatives to strengthen PPP in India)
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PPP सुधार हेतु आगे की राह
- विजय केलकर समिति की सिफारिशें (2012):
- PPP मॉडल अपनाने वाले क्षेत्रकों के लिए स्वतंत्र नियामक निकायों का गठन किया जाना चाहिए।
- जोखिमों का तर्कसंगत आवंटन: एक ही नियम सब पर लागू किए जाने के दृष्टिकोण के स्थान पर, सभी हितधारकों को सम्मिलित करते हुए क्षेत्र-विशिष्ट और परियोजना-विशिष्ट जोखिम आवंटन किया जाना चाहिए।
- अप्रचलित मोलभाव की रोकथाम: यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब निजी भागीदार परियोजनाओं पर अपनी मोलभाव करने की शक्ति खो देते हैं। यह सामान्यतः उन अवसंरचनात्मक PPP परियोजनाओं में होता है जो 20-30 वर्षों की लंबी अवधि तक चलती हैं।
- अभिवृत्ति परिवर्तन: "लेन-देन से संबंध" की ओर बढ़ना, भागीदारों के बीच लेने-देन के भाव को अपनाना तथा दीर्घकालिक अनुबंधों के कार्यान्वयन में निहित अनिश्चितताओं और उचित समायोजनों को स्वीकार करना आवश्यक है।
- स्थिर नीति व्यवस्था, मानकीकृत अनुबंध और स्पष्ट नियामक संरचना: उदाहरण के लिए, बंदरगाहों में शुल्क विनियमन को प्रारंभ में प्रमुख बंदरगाहों के लिए शुल्क प्राधिकरण (TAMP) के माध्यम से संस्थागत बनाया गया था और बाद में बाजार की गहराई तथा प्रतिस्पर्धा में सुधार होने पर इसे वापस ले लिया गया। ऐसी स्पष्टता अन्य क्षेत्रों में भी आवश्यक है।
- संस्थागत क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्तर का संस्थान: कार्यान्वयन एजेंसियों, बैंकों/वित्तीय संस्थानों और निजी क्षेत्रक सहित सभी हितधारकों के कौशल और क्षमता संवर्धन हेतु एक समर्पित राष्ट्रीय संस्थान की आवश्यकता है।