केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्रों (CETPs) को उद्योगों की 'ब्लू श्रेणी’ (Blue Category) के तहत अनिवार्य पर्यावरणीय सेवाओं (ESS) के रूप में वर्गीकृत किया है।
उद्योगों की 'ब्लू श्रेणी' के बारे में

- इसमें 'अनिवार्य पर्यावरणीय सेवाएं' (ESS) शामिल हैं।
- ESS वे सुविधाएं हैं जो घरेलू और औद्योगिक कार्यों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण को रोकने, कम करने और नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य हैं।
- मुख्य उदाहरण: सीवेज उपचार संयंत्र (STPs), अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन संयंत्र, बायोमाइनिंग और कंपोस्टिंग इकाइयां।
औद्योगिक क्षेत्रकों का वर्गीकरण
- CPCB ने प्रदूषण सूचकांक (Pollution Index - PI) के आधार पर उद्योगों को वर्गीकृत का एक तरीका विकसित किया है। यह 'एहतियाती सिद्धांत' (Precautionary Principle) पर आधारित है।
- प्रदूषण सूचकांक किसी उद्योग के जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण और अपशिष्ट उत्पन्न करने की क्षमता को देखकर तैयार किया जाता है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कुंभलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य को ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ यानी इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) घोषित किया है।

इको-सेंसिटिव ज़ोन (ESZ) क्या है?
- ESZ को पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाता है। यह पूरी तरह संरक्षित क्षेत्र से कम संरक्षण वाले क्षेत्र के बीच का परिवर्तन वाला क्षेत्र (ट्रांजीशन जोन) होता है।
- आमतौर पर यह अभयारण्य या राष्ट्रीय उद्यान के चारों ओर लगभग 10 किलोमीटर तक होता है। लेकिन हर स्थान पर इसका विस्तार अलग-अलग हो सकता है।
स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित भारत के पहले प्रदूषण नियंत्रण पोत (PCV), ICGS समुद्र प्रताप को गोवा में समुद्री बेड़े में शामिल (कमीशनिंग) किया गया।
ICGS समुद्र प्रताप की मुख्य विशेषताएं:
- यह गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा निर्मित किए जा रहे दो प्रदूषण-नियंत्रण पोतों में से पहला पोत है।
- यह भारतीय तटरक्षक बल (ICG) के बेड़े का अब तक का सबसे बड़ा पोत है।
- यह पोत निम्नलिखित आधुनिक उपकरणों से युक्त है:
- उन्नत प्रदूषण-पहचान प्रणाली,
- प्रदूषण नियंत्रण कार्रवाई हेतु समर्पित नौकाएं,
- ऑनबोर्ड प्रदूषण नियंत्रण प्रयोगशाला,
- आधुनिक अग्निशमन क्षमताएं।
Article Sources
1 sourceकेंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने भारत की रामसर सूची में 2 नई आर्द्रभूमियों के सूचीबद्ध होने की घोषणा की। ये हैं; पटना पक्षी अभयारण्य और और छारी-ढांड।
- अब रामसर अभिसमय के तहत भारत में कुल आर्द्रभूमियों की संख्या 98 हो गई है।
पटना पक्षी अभयारण्य के बारे में
- यह उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित एक संरक्षित अभयारण्य है। इसकी स्थापना 1991 में हुई थी।
- यह उत्तर प्रदेश का सबसे छोटा पक्षी अभयारण्य है।
- यहाँ कई प्रकार के जलीय पक्षी प्राप्त होते हैं, जैसे कि: लेसर विसलिंग-बतख, ग्रेलाग कलहंस, कॉम्ब बतख, रडी शेलडक, गॉडवाल, यूरेशियन विजन, इंडियन स्पॉट-बिल्ड बतख, नॉर्दर्न शोवेलर और नॉर्दर्न पिनटेल।
छारी-ढांढ आर्द्रभूमि रिजर्व के बारे में
- यह गुजरात के कच्छ जिले में शुष्क बन्नी घास के मैदानों और कच्छ के रण में नमक के दलदली मैदानों के किनारे पर स्थित है।
- कच्छी भाषा में 'छारी' का अर्थ है "खारा" और 'ढांढ' का अर्थ है "उथली आर्द्रभूमि"।
- यह कई संकटापन्न प्रजातियों का पर्यावास है। इनमें शामिल हैं; डेलमेटियन पेलिकन, ओरिएंटल डार्टर, ब्लैक-नेक्ड स्टॉर्क और इंडियन स्किमर।
- यह क्षेत्र "चिर बत्ती" (Chir Batti) या ‘भूतिया रोशनी' के लिए भी प्रसिद्ध है। यह बन्नी घास के मैदानों में अंधेरी रातों में देखी जाने वाली एक अद्भुत परिघटना है।
Article Sources
1 sourceप्रधान मंत्री ने हाल ही में काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना का उद्घाटन किया। इस परियोजना का उद्देश्य काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में वन्य-जीवों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना है।
काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के बारे में
- अवस्थिति: काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम में स्थित है। यह ब्रह्मपुत्र नदी और कार्बी (मिकिर) पहाड़ियों के बीच फैला है।
- मान्यता: यह एक राष्ट्रीय उद्यान, टाइगर रिजर्व और महत्वपूर्ण पक्षी क्षेत्र (IBA) है। 1985 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिला।
- यह क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह ऑस्ट्रेलेशिया और इंडो-एशियन फ्लाईवे के मिलन स्थल पर स्थित है।
- जैव विविधता: बाघ, हाथी, स्वैम्प डियर, जंगली भैंस, आदि।
- यहाँ भारतीय एक-सींग वाले गैंडे की सबसे अधिक संख्या पाई जाती है।
ऊर्जा और स्वच्छ वायु पर अनुसंधान केंद्र (CREA) के हालिया विश्लेषण के अनुसार, दिल्ली के वार्षिक PM2.5 प्रदूषण का कम से कम एक-तिहाई हिस्सा द्वितीयक प्रदूषकों , मुख्य रूप से अमोनियम सल्फेट के कारण होता है।
द्वितीयक प्रदूषकों (Secondary Pollutants) के बारे में
- ये प्रदूषक प्रत्यक्ष रूप से किसी स्रोत (जैसे- वाहन या विद्युत संयंत्र) से उत्सर्जित नहीं होते हैं।
- इसके बजाय ये तब बनते हैं, जब इन स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषक वायुमंडल में मौजूद अणुओं के साथ रासायनिक अभिक्रिया करते हैं। इससे एक नया प्रदूषक निर्मित होता है।
- उदाहरण के लिए: अमोनियम सल्फेट, ओज़ोन, नाइट्रोजन के ऑक्साइड आदि।
- जो प्रदूषक किसी स्रोत से सीधे पर्यावरण में उत्सर्जित होते हैं, प्राथमिक प्रदूषक कहलाते हैं।
- अमोनियम सल्फेट का निर्माण: सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) गैस वायुमंडल में ऑक्सीकृत होकर 'सल्फेट' बनाती है। इसके बाद यह सल्फेट वायुमंडल में मौजूद 'अमोनिया' के साथ अभिक्रिया करता है। इस प्रक्रिया के अंत में अमोनियम सल्फेट का निर्माण होता है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य (संशोधन) नियम, 2025 अधिसूचित किए हैं।
मुख्य विवरण
- विस्तार: उत्सर्जन में कटौती के लिए बाध्यकारी (obligated) क्षेत्रकों की सूची में चार नए क्षेत्रक जोड़े गए हैं- पेट्रोलियम रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल्स, टेक्सटाइल्स (वस्त्र), और सेकेंडरी एल्युमीनियम।
- पिछले क्षेत्रक: एल्युमीनियम, सीमेंट, लुगदी व कागज और क्लोर-क्षार (chlor-alkali)।
- लक्ष्य और समयसीमा: नए नियम 208 विशिष्ट औद्योगिक इकाइयों को अनुपालन वर्ष 2025-26 से अपनी GHG उत्सर्जन तीव्रता (GEI) कम करने का आदेश देते हैं।
- GEI, उत्पाद की प्रति इकाई पर उत्पन्न होने वाली GHGs की मात्रा है। उदाहरण के लिए- सीमेंट या एल्युमिनियम जैसे उत्पाद के प्रति टन के उत्पादन में मुक्त गैसें।
- कटौती के लक्ष्य: कुल उत्सर्जन तीव्रता में कटौती का लक्ष्य 2026-27 तक 3% से 7% के बीच रखा गया है। इस हेतु आधार वर्ष: 2023-24 निर्धारित किया गया है।
- अनुपालन तंत्र: जो इकाइयां लक्ष्य पूरा करने में विफल रहेंगी, उन्हें कमी को पूरा करने के लिए कार्बन क्रेडिट प्रमाण-पत्र (CCCs) खरीदना होगा।
- ऐसा न करने पर 'पर्यावरण क्षतिपूर्ति' दंड लगाया जाएगा, जो CCCs की औसत व्यापारिक कीमत के दोगुने के बराबर होगा।
- महत्त्व: यह कदम भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) लक्ष्यों के अनुरूप है। इनमें 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम करने और 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य शामिल है।

एक अमेरिकी जीवविज्ञानी टोबी कियर्स को माइकोराइजल नेटवर्क पर उनके शोध-कार्य के लिए टायलर पर्यावरण उपलब्धि पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया गया है।
- गौरतलब है कि टायलर पुरस्कार को पर्यावरण के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है।
माइकोराइजल नेटवर्क के बारे में
- परिभाषा: ये भूमिगत फंगल (कवक) नेटवर्क होते हैं। इनमें माइकोराइजा कवक अपनी हाइफ़ा (फंगल धागों) के माध्यम से कई पौधों की जड़ों को आपस में जोड़ते हैं।
- माइकोराइजा कवक पौधों के साथ सहजीवी संबंध (symbiotic association) बनाते हैं। इसमें पौधे कवक को कार्बोहाइड्रेट देते हैं और बदले में उन्हें जल तथा आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।
- वन पारितंत्र में उपस्थित इस भूमिगत फंगल नेटवर्क को “वुड वाइड वेब” (Wood Wide Web) कहा जाता है।
- पारिस्थितिकी तंत्र में अन्य भूमिका: ये नेटवर्क प्रतिवर्ष लगभग 13 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को मृदा में समाहित करने में मदद करते हैं।

बायोमैटेरियल्स यानी जैव-पदार्थ पारंपरिक, पेट्रोलियम आधारित उत्पादों के लिए संधारणीय विकल्प प्रदान करते हैं।
बायोमैटेरियल्स (जैव-पदार्थ) के बारे में:
- बायोमैटेरियल्स वे पदार्थ हैं जो पूरी तरह या आंशिक रूप से जैविक स्रोतों से प्राप्त होते हैं या जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से बनाई जाती हैं।
- अनुप्रयोग: बायोइंजीनियरिंग/जैव-चिकित्सा, पैकेजिंग, कृषि, स्वास्थ्य-देखभाल सेवा, वस्त्र उद्योग, आदि में।
भारत, सड़क निर्माण हेतु बायो-बिटुमेन (Bio-bitumen) का व्यावसायिक रूप से उत्पादन करने वाला विश्व का पहला देश बन गया है।
बायो-बिटुमेन के बारे में:
- यह बिटुमेन का एक वैकल्पिक रूप है, जिसे जैविक (ऑर्गेनिक) तत्वों से तैयार किया जाता है।
- उदाहरण: कृषि-अपशिष्ट, लिग्निन, बायोचार, बायो-ऑयल आदि।
- बिटुमेन: यह कच्चे तेल के आसवन (distillation) से उत्पन्न होने वाला एक काला पदार्थ है। यह अपने चिपकने वाले गुणों (adhesive properties) के लिए जाना जाता है।
- प्रमुख लाभ:
- कच्चे तेल के आयात में कमी लाई जा सकती है।
- पराली जलाने (Stubble burning) की समस्या का समाधान कर सकता है।
- जैव-अर्थव्यवस्था (Bioeconomy) को बढ़ावा दे सकता है।
- इसका उपयोग बिटुमेन के पूरक के रूप में किया जा सकता है या बाइंडर मिश्रण में बिटुमेन की मात्रा कम करने के लिए किया जा सकता है।
- अनुप्रयोग:
- सड़कों को पक्का करने में।
- जलरोधक कार्यों (Waterproofing) में, आदि।
अमेजन की डंकरहित मधुमक्खियां कानूनी अधिकार प्राप्त करने वाली पहली कीट बनीं।
डंकरहित मधुमक्खी (मेलिपोनिनी) के बारे में
- प्राचीन उत्पत्ति: यह विश्व की सबसे पुरानी मधुमक्खी प्रजाति है, जो लगभग 8 करोड़ वर्षों से अस्तित्व में है।
- शारीरिक संरचना: इनमें डंक होते हैं, लेकिन ये बहुत छोटे होते हैं और रक्षा के लिए कार्यात्मक रूप से अनुपयोगी हैं।
- विविधता: विश्व स्तर पर इनकी लगभग 500 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 170 से अधिक विशेष रूप से पेरू में पाई जाती हैं।
- उपचार: इनके शहद को "तरल स्वर्ण" कहा जाता है। यह अपने शक्तिशाली जीवाणुरोधी और सूजनरोधी गुणों के लिए मूल्यवान है।
- महत्त्व: ये प्राचीन परागणकर्ता कोको और कॉफी सहित अमेजन की 80% वनस्पतियों का पोषण करती हैं।
Article Sources
1 sourceगणतंत्र दिवस परेड 2026 में 'गलवान' और 'नुब्रा' नामक दो बैक्ट्रियन ऊंटों ने पहली बार कर्तव्य पथ पर मार्च कर इतिहास रचा।

बैक्ट्रियन ऊँट के बारे में
- इसका नाम बैक्ट्रिया से पड़ा है, जो मध्य एशिया का एक प्राचीन क्षेत्र था। यह ठंडे रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाला बड़ा, सम-खुर वाला जानवर (Even-toed ungulate) है।
- पर्यावास: यह मूल रूप से मध्य एशिया के शुष्क और ठंडे क्षेत्रों में पाया जाता है। जैसे-गोबी और तकला मकान मरुस्थल में।
- भारत में लगभग 300–400 बैक्ट्रियन ऊंट पाए जाते हैं। ये सभी लद्दाख की नुब्रा घाटी में प्राप्त होते हैं।
- शारीरिक विशेषताएँ: इसकी पीठ पर दो कूबड़ होते हैं, जिनमें चर्बी (वसा) जमा रहती है।
- जलवायु अनुकूलन: इसके शरीर पर सर्दियों में घने फर उग आते हैं। यह −30°C से 40°C तक के तापमान को सहन कर सकता है।
- संरक्षण स्थिति: IUCN लाल सूची के अनुसार यह प्रजाति क्रिटिकली एंडेंजर्ड है।
- पालतू बैक्ट्रियन ऊँट (Camelus bactrianus) को संकटापन्न प्रजाति (Threatened Species) की श्रेणी में नहीं डाला गया है।
- हालांकि, वन्य बैक्ट्रियन ऊँट (Camelus ferus - जो कि एक विशिष्ट प्रजाति है), IUCN के अनुसार संकटग्रस्त (Endangered) श्रेणी में है।
आंध्र प्रदेश सरकार 'स्पेस सिटी' परियोजना के तहत होप आइलैंड पर उपग्रह प्रक्षेपण केंद्र विकसित करेगी। यह द्वीप कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य का हिस्सा है।
होप आइलैंड के बारे में
- यह एक अपेक्षाकृत नया द्वीप है। यह गोदावरी डेल्टा के पानी द्वारा बहाकर लाई गई रेत से बनी 16 किलोमीटर लंबी 'सैंड स्पिट' (रेत की पतली पट्टी) है।
- यह काकीनाडा शहर को समुद्र की तूफान महोर्मि (Storm Surges) से बचाता है।
- यह एक प्राकृतिक 'जल अवरोधक (ब्रेक वाटर)' के रूप में कार्य करता है, जो समुद्र की लहरों को शांत रखता है। इसी कारण काकीनाडा बंदरगाह भारत के सबसे सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाहों में से एक है।
कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य के बारे में
- अवस्थिति: यह आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में स्थित है, जहाँ गोदावरी नदी और बंगाल की खाड़ी का मिलन होता है।
- यह गोदावरी मैंग्रोव वन का हिस्सा है। आंध्र प्रदेश सरकार ने इसे 1978 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया था।
पिछले सर्वेक्षण (2021–23) में भारत में अनुमानित 6,327 नदी डॉल्फिन दर्ज की गई थीं।
- वर्तमान सर्वेक्षण में गंगा और सिंधु नदी डॉल्फिन के अलावा, सुंदरवन एवं ओडिशा में पाई जाने वाली इरावदी डॉल्फिन को भी शामिल किया जाएगा।

डॉल्फिन परियोजना के बारे में
- शुरुआत: 15 अगस्त 2020 में।
- 'केंद्र प्रायोजित योजना: वन्यजीव पर्यावासों का विकास' के तहत एक योजना है।
- उद्देश्य: पर्यावास संरक्षण, वैज्ञानिक अनुसंधान और सामुदायिक जागरूकता के माध्यम से समुद्री एवं नदी डॉल्फिन के साथ-साथ संबंधित सिटासियन (डॉल्फिन, व्हेल आदि) का भी संरक्षण करना।
नदी डॉल्फिन (सुपरफैमिली: प्लैटिनिस्टोइडे)
- विशेषताएं:
- ये कार्यात्मक रूप से दृष्टिहीन होती हैं और आवागमन व शिकार के लिए इकोलोकेशन पर निर्भर करती हैं।
- इनका थूथन (snout) लंबा व पतला, पेट गोल, शरीर गठीला तथा फ्लिपर्स बड़े होते हैं।
- एक शीर्ष शिकारी के रूप में, वे नदियों के स्वास्थ्य की प्रमुख संकेतक प्रजाति हैं।
- डॉल्फिन संरक्षण के लिए शुरू की गई पहलें:
- विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन वन्यजीव अभयारण्य (बिहार) की स्थापना की गई है।
- चंबल नदी संरक्षण क्षेत्र को डॉल्फिन संरक्षण क्षेत्र के रूप में नामित किया गया है।
- अन्य: डॉल्फिन परियोजना संचालन समिति का पुनर्गठन किया गया है; डॉल्फिन और व्हेलिंग कमिश्नरों की नियुक्ति की गई है; गंगा नदी डॉल्फिन की सैटेलाइट टैगिंग की जा रही है आदि।
Article Sources
1 sourceवैज्ञानिकों ने भारत में पफरफिश विषाक्तता (Pufferfish Poisoning) के पहले मामले की पुष्टि की है।
ताजे जल की पफरफिश के बारे में
- ये मछलियां टेट्राओडोंटिडी (Tetraodontidae) कुल की लगभग 30–35 उप-प्रजातियों का समूह हैं। ये अपना पूरा जीवन ताजे जल में बिताती हैं।
- सामान्य नाम: टोडफिश, पटका फिश, बैलूनफिश और फुगु।
- प्राप्ति क्षेत्र: पश्चिमी घाट तथा गंगा, ब्रह्मपुत्र और महानदी जैसे प्रमुख नदी बेसिन।
- आहार व पर्यावास: पफरफिश सर्वाहारी होती हैं और नितलस्थ (benthic) क्षेत्र में रहती हैं।
- विशिष्टता: इनमें टेट्रोडोटॉक्सिन (TTX) पाया जाता है, जो प्रकृति में ज्ञात सबसे प्रभावकारी न्यूरोटॉक्सिन (तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचाने वाला) में शामिल है।
इस संधि को आधिकारिक तौर पर 'राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे क्षेत्रों की समुद्री जैव विविधता के संरक्षण और सतत उपयोग पर समझौते' (BBNJ समझौते) के रूप में जाना जाता है। यह कानूनी रूप से बाध्यकारी संयुक्त राष्ट्र संधि है। यह उन समुद्री क्षेत्रों को कवर करती है, जो राष्ट्रीय जल सीमा से बाहर हैं (जिन्हें "खुला समुद्र" या "High Seas" कहा जाता है)। साथ ही, यह अंतर्राष्ट्रीय समुद्री नितल क्षेत्र को भी शामिल करती है।
- हाई सीज यानी खुला समुद्र वह समुद्री क्षेत्र है, जो किसी भी देश के अधिकार-क्षेत्र से बाहर होता है। यह वैश्विक साझा क्षेत्र है, जिसका सभी देश वैध अंतर्राष्ट्रीय उद्देश्यों जैसे- नौवहन, हवाई उड़ान, समुद्र के नीचे केबल और पाइपलाइन बिछाने आदि के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। यह महासागर की सतह के दो-तिहाई से अधिक हिस्से का निर्माण करता है।
BBNJ समझौते के बारे में
- इसे 2023 में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में आयोजित“राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे क्षेत्रों की समुद्री जैव विविधता (BBNJ) पर अंतर-सरकारी सम्मेलन” द्वारा अपनाया गया था।
- यह संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (UNCLOS) का तीसरा कार्यान्वयन समझौता है। इसके अलावा, अन्य दो समझौते 1994 में UNCLOS के भाग 11 के कार्यान्वयन से संबंधित समझौता और 1995 का संयुक्त राष्ट्र मत्स्य भंडार समझौता हैं।
- उद्देश्य: राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र से परे क्षेत्रों (ABNJ) की समुद्री जैव विविधता का संरक्षण और सतत उपयोग सुनिश्चित करना।
- यह चार मुख्य मुद्दों को संबोधित करता है:
- समुद्री आनुवंशिक संसाधन, जिसमें लाभों का उचित और न्यायसंगत बंटवारा शामिल है;
- क्षेत्र-आधारित प्रबंधन उपकरण, जिसमें समुद्री संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं;
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA): किसी भी गतिविधि से पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव की जांच।
- क्षमता-निर्माण और समुद्री प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण।
- इसमें वित्त-पोषण तंत्र की व्यवस्था की गई है और संस्थागत व्यवस्थाएं निर्धारित की गई हैं। इसमें एक पक्षकारों का सम्मेलन, एक समाशोधन-गृह तंत्र और एक सचिवालय शामिल है।
- सदस्य: अब तक 83 देशों ने इस संधि की अभिपुष्टि की है। भारत ने इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं, लेकिन अभी तक इसकी अभिपुष्टि नहीं की है।

Article Sources
1 sourceयूरोपीय संघ (EU) ने 1 जनवरी, 2026 से विश्व का पहला कार्बन कर (CBAM) लागू किया। इसके तहत कार्बन-गहन उत्पादों के आयात पर कार्बन से संबंधित शुल्क लगाया जाएगा।
कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) के बारे में
- यह EU की एक नीति है। इसके तहत कम सख्त जलवायु नीतियों वाले देशों से कुछ उत्पादों के आयात पर कार्बन कर लगाया जाएगा। उदाहरण के लिए- इस्पात।
- CBAM को 2023 में संक्रमणकालीन चरण में कार्यान्वित किया गया था। यह 2026 तक पूर्ण रूप से लागू हो जाएगा।
- उद्देश्य: कंपनियों को कमजोर जलवायु नियमों वाले देशों में उत्पादन स्थानांतरित करने से रोककर कार्बन लीकेज को रोकना।
- शामिल क्षेत्रक: सीमेंट, एल्यूमीनियम, उर्वरक, लोहा और इस्पात, हाइड्रोजन व विद्युत।
- व्यापार पर प्रभाव: इस्पात, एल्यूमीनियम और सीमेंट के भारतीय निर्यात पर लागत बढ़ सकती है।
यह बदलाव वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980 (पूर्व में वन संरक्षण अधिनियम) के समेकित दिशा-निर्देशों में संशोधन करके लागू किया गया है।
प्रमुख संशोधन

- यह सरकारी या गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा किए जाने वाले 'सहायता प्राप्त प्राकृतिक पुनरुत्पादन', जिसमें वनीकरण और वृक्षारोपण शामिल है, को "वानिकी गतिविधियों" के रूप में मानने की अनुमति देता है।
- इसके परिणामस्वरूप, ऐसी गतिविधियों पर प्रतिपूरक वनीकरण की अनिवार्यता और निवल वर्तमान मूल्य (NPV) का भुगतान लागू नहीं होंगे।
- प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation: CA): इसका अर्थ है गैर-वन उद्देश्यों के लिए वन भूमि के उपयोग के बदले में किया गया वनीकरण।
- यह वन भूमि के नुकसान की भरपाई के लिए 'भूमि के बदले भूमि' तथा 'वृक्षों के बदले वृक्ष' के नियम को अनिवार्य बनाता है और गैर-वन भूमि पर संपन्न किया जाता है।
- निवल वर्तमान मूल्य (NPV): यह एक अनिवार्य शुल्क है, जिसका उद्देश्य कार्बन प्रच्छादन (carbon sequestration), जल पुनर्भरण और जैव विविधता जैसी पारिस्थितिकी-तंत्र सेवाओं के नुकसान की भरपाई करना है।
- प्रतिपूरक वनीकरण और NPV के माध्यम से एकत्र की गई धनराशि को राज्य प्रतिपूरक वनीकरण कोष प्रबंधन और योजना प्राधिकरण (CAMPA) में जमा किया जाता है। CAMPA को प्रतिपूरक वनीकरण कोष (CAF) अधिनियम, 2016 के तहत स्थापित किया गया है।
- प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation: CA): इसका अर्थ है गैर-वन उद्देश्यों के लिए वन भूमि के उपयोग के बदले में किया गया वनीकरण।
- राज्य सरकार ऐसे वृक्षारोपण के उपयोग और राजस्व साझा करने के लिए एक रूपरेखा तैयार कर सकती है।
हाल ही में, सरकार ने एक नया डिजिटल प्लेटफॉर्म, 'भारतीय कृषि में जलवायु अनुकूलन का मानचित्र' (ACASA-इंडिया) लॉन्च किया। यह किसानों की जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने और बेहतर योजना बनाने में मदद करेगा।
- इसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के नेतृत्व वाली 'राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान और विस्तार प्रणाली' (NARES) ने 'बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया' (BISA) – CIMMYT के सहयोग से विकसित किया है। इसका उद्देश्य जलवायु-अनुकूल कृषि के लिए स्थान-विशिष्ट और डेटा-आधारित अनुकूलन योजना तैयार करना है।
- ACASA-इंडिया से प्राप्त अंतर्दृष्टि सरकारी एजेंसियों को जलवायु जोखिम न्यूनीकरण और विस्तार के अवसरों के लिए भविष्य की निवेश संबंधी आवश्यकताओं को निर्धारित करने में मदद करेगी।

राष्ट्रीय जलवायु अनुकूल कृषि नवाचार (NICRA) के बारे में:
- शुरुआत: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा वर्ष 2011 में।
- उद्देश्य:
- भारतीय कृषि की जलवायु परिवर्तन के प्रति सुभेद्यता को कम करना और लचीलापन/ अनुकूलन (Resilience) बढ़ाना; तथा
- किसानों के खेतों पर जलवायु-अनुकूल तकनीकों का सत्यापन और प्रदर्शन करना।
जलवायु अनुकूल कृषि (CRA) क्या है?
इसका अर्थ कृषि में ऐसी अनुकूलन और शमन प्रथाओं को अपनाना है, जो जलवायु के आघातों (जैसे- सूखा, बाढ़ आदि) को सहन करने तथा उनसे तेजी से उबरने की क्षमता बढ़ाती हैं।CRA की आवश्यकता क्यों है?
- पैदावार के नुकसान को रोकना: जलवायु परिवर्तन से पैदावार में 4.5% से 9.0% तक की कमी आ सकती है। इससे प्रति वर्ष लगभग 1.5% GDP का नुकसान हो सकता है।
- आजीविका की सुरक्षा: लगभग 57% ग्रामीण परिवार आय के लिए खेती पर निर्भर हैं।
- वर्षा आधारित क्षेत्रों की संवेदनशीलता: भारत का 51% निवल बोया गया क्षेत्र वर्षा पर आधारित है, जो कुल खाद्यान्न का लगभग 40% उत्पादन करता है। यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक सुभेद्य है।
- खाद्य सुरक्षा: भारत कुपोषण, बच्चों में कम वजन और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी जैसी बढ़ती समस्याओं का सामना कर रहा है, जिन्हें कृषि सुधार के बिना हल करना कठिन है।
Article Sources
1 sourceकेंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने हाल ही में पर्यावरण (संरक्षण) निधि नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं। इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण निधि (Environmental Protection Fund) के उपयोग में सुधार करना है।
पर्यावरण संरक्षण निधि के बारे में
- विधिक स्वरूप: यह निधि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा 16 के तहत गठित की गई है। यह राशि भारत के लोक लेखा में जमा की जाती है।
- निधि के स्रोत: इसमें वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981; जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत वसूले गए जुर्माने जमा होते हैं।
- आवंटन: 75% धनराशि राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को दी जाती है, जबकि 25% धनराशि केंद्र सरकार के पास रहती है।
- निधि का उपयोग: पर्यावरण निगरानी नेटवर्क की स्थापना, प्रदूषित स्थलों की सफाई, पर्यावरण को स्वच्छ रखने वाली प्रौद्योगिकियों में अनुसंधान एवं विकास (R&D) हेतु।
- निगरानी: इसका प्रबंधन परियोजना प्रबंधन इकाई द्वारा किया जाता है। इसका नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा ऑडिट की जाती है।
- संस्थाओं की क्षमता बढ़ाना: इस निधि का उपयोग केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड्स (SPCBs) जैसी विनियामक संस्थाओं को मजबूत बनाने में भी किया जाता है।
अध्ययन इस तथ्य पर जोर देता है कि ग्रीन हाउस गैसों की बढ़ती सांद्रता और सल्फेट एरोसोल में कमी के कारण 2025 में वैश्विक महासागरों का गर्म होना निरंतर जारी रहा।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
- 2025 में, महासागरों ने अतिरिक्त 23 ज़ेटाजूल (ZJ) ऊष्मा अवशोषित की, जो 1960 के दशक के बाद से अब तक का सबसे उच्चतम स्तर है।
- ग्रीनहाउस गैसों द्वारा रोकी गई अतिरिक्त ऊष्मा का लगभग 90% हिस्सा महासागरों द्वारा अवशोषित किया जाता है। यह पुष्टि करता है कि महासागर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने वाले प्राथमिक माध्यम (बफर) हैं।
- 2025 में वैश्विक समुद्री सतह का औसत तापमान अब तक के दर्ज रिकॉर्ड में सबसे अधिक रहा। यह 1981-2010 के औसत से लगभग 0.5°C अधिक था)।
महासागरीय तापन के प्रमुख प्रभाव
- महासागरीय स्तरीकरण में वृद्धि: सतह का जल गर्म होने से जल की परतों का आपस में मिलना कम हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप, गहरे जल में ऑक्सीजन की आपूर्ति कम हो जाती है, सतह तक पोषक तत्वों का पहुंचना बाधित हो जाता है और महासागरीय उत्पादकता में गिरावट आती है।
- समुद्री हीट वेव्स में वृद्धि: इसके कारण कोरल ब्लीचिंग (प्रवाल विरंजन), प्रवाल रोग और समुद्री प्रजातियों के प्रवास व प्रजनन पैटर्न में बदलाव आ सकता है।
- तीव्र तूफान: गर्म महासागर वायुमंडल को अधिक उष्णता और आर्द्रता प्रदान करते हैं। इससे चक्रवात व तूफान अधिक तीव्र हो सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, भारी वर्षा एवं बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।
- समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को खतरा: पोषक तत्वों में कमी से पादपप्लवक (Phytoplankton) को खतरा होता है, जो समुद्री खाद्य श्रृंखला का आधार हैं।

Article Sources
1 sourceयह रिपोर्ट कार्ड नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने जारी किया है। यह स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है कि आर्कटिक क्षेत्र शेष विश्व की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है।
आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

- आर्कटिक सतह की वायु का तापमान: विगत वर्ष (अक्टूबर 2024 - सितंबर 2025) के दौरान 1900 के बाद से अब तक का सर्वाधिक तापमान दर्ज किया गया है।
- पिछले 10 वर्ष आर्कटिक के इतिहास के 10 सबसे गर्म वर्ष रहे हैं।
- अटलांटिफिकेशन (Atlantification): निचले अक्षांशों से असामान्य जल गुणों और जीवों का मध्य आर्कटिक महासागर में प्रवाह बढ़ रहा है।
- यह आर्कटिक महासागर के स्तरीकरण (stratification) को कमजोर करता है। इससे ऊष्मा का स्थानांतरण बढ़ता है, समुद्री बर्फ पिघलती है और समुद्री परिसंचरण पैटर्न के समक्ष खतरा उत्पन्न होता है।
- नदियों में रस्टिंग होना: आर्कटिक अलास्का में 200 से अधिक जलक्षेत्रों (watersheds) में सतह का जल नारंगी हो गया है। ऐसा पिघलते हुए पर्माफ्रॉस्ट से लौह धातु के निकलने के कारण हो रहा है, जो मछलियों और स्थानीय समुदायों को जलापूर्ति को प्रभावित कर रहा है।
- आर्कटिक में हरित आवरण उत्पन्न होना: इस परिवर्तन के बारे में पहली बार 1990 के दशक के अंत में पता चला था। यह बदलाव टुंड्रा वनस्पतियों की प्रचुरता और उत्पादकता में एक दीर्घकालिक वृद्धि है।
- इसका आर्कटिक परिदृश्य, वन्यजीव पर्यावास, जैव विविधता, पर्माफ्रॉस्ट की स्थिति और वहां के लोगों की आजीविका पर दूरगामी प्रभाव पड़ रहा है।
Article Sources
1 sourceसंयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के जल, पर्यावरण और स्वास्थ्य संस्थान ने 'वैश्विक जल दिवालियापन (Global Water Bankruptcy) पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है।
- जल दिवालियापन: यह मानव-जल प्रणाली की वह स्थायी संकट-पश्चात स्थिति है, जिसमें दीर्घकालिक जल उपयोग नवीकरणीय अंतर्वाहों (renewable inflows) और सुरक्षित निष्कर्षण सीमाओं से अधिक हो जाता है। इसके कारण जल संसाधनों का ऐसा क्षरण हुआ है, जिनका इनका अब पुनर्भरण होना लगभग असंभव है।
- रिपोर्ट के अनुसार, जल और प्राकृतिक पूंजी के महत्वपूर्ण हिस्से {जैसे- नदियां, झीलें, जलभृत (aquifers), आद्रभूमियां, मृदा तथा ग्लेशियर} इतने क्षतिग्रस्त हो गए हैं कि उनके पूर्णतः पुनर्स्थापित होने की अब कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है।
- जल दिवालियापन के विपरीत, जल तनाव ((water stress) वह स्थिति है, जिसमें जल आपूर्ति की तुलना में उसकी मांग अधिक होती है, लेकिन इसके प्रभावों का काफी हद तक निराकरण किया जा सकता है।
- जल संकट (water crisis) वह स्थिति है, जहां अचानक उत्पन्न होने वाली बाधाओं के कारण जल प्रणालियां अस्थायी रूप से अपनी क्षमता से अधिक हो जाती हैं, लेकिन आपातकालीन और पुनर्स्थापन उपायों के माध्यम से उन्हें बहाल किया जा सकता है।
जल दिवालियापन के लिए उत्तरदायी मुख्य कारक
- धीमी गति से होने वाला क्षय: सतही और भौमजल का लगातार अत्यधिक उपयोग धीरे-धीरे भंडारण एवं गुणवत्ता को खराब करता है। अक्सर शुरुआती चेतावनी संकेतों को तब तक नजरअंदाज किया जाता है, जब तक कि सुधार की सीमा पार न हो जाए।
- अवसंरचनाओं का अधिक विस्तार: बड़े बांध और जल स्थानांतरण परियोजनाएं संधारणीय सीमाओं से परे विस्तार को बढ़ावा देती हैं।
- पारिस्थितिक परिसमापन: आर्द्रभूमियों, बाढ़ के मैदानों, वनों और मृदा को इस तरीके से परिवर्तित या नष्ट किया जा रहा है, जिससे अल्पकालिक उत्पादकता तो बढ़ती है, लेकिन दीर्घकालिक जल भंडारण, निस्पंदन (filtration) और बफरिंग क्षमता समाप्त हो जाती है।
- जलवायु-प्रेरित संकट: जलवायु परिवर्तन विश्वसनीय आपूर्ति को कम करके तथा पहले से ही अत्यधिक शोषित जल प्रणालियों में अस्थिरता बढ़ाकर मौजूदा तनाव को और तीव्र कर देता है।

Article Sources
1 sourceकेंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन तीव्रता लक्ष्य (संशोधन) नियम, 2025 अधिसूचित किए हैं।
मुख्य विवरण
- विस्तार: उत्सर्जन में कटौती के लिए बाध्यकारी (obligated) क्षेत्रकों की सूची में चार नए क्षेत्रक जोड़े गए हैं- पेट्रोलियम रिफाइनरी, पेट्रोकेमिकल्स, टेक्सटाइल्स (वस्त्र), और सेकेंडरी एल्युमीनियम।
- पिछले क्षेत्रक: एल्युमीनियम, सीमेंट, लुगदी व कागज और क्लोर-क्षार (chlor-alkali)।
- लक्ष्य और समयसीमा: नए नियम 208 विशिष्ट औद्योगिक इकाइयों को अनुपालन वर्ष 2025-26 से अपनी GHG उत्सर्जन तीव्रता (GEI) कम करने का आदेश देते हैं।
- GEI, उत्पाद की प्रति इकाई पर उत्पन्न होने वाली GHGs की मात्रा है। उदाहरण के लिए- सीमेंट या एल्युमिनियम जैसे उत्पाद के प्रति टन के उत्पादन में मुक्त गैसें।
- कटौती के लक्ष्य: कुल उत्सर्जन तीव्रता में कटौती का लक्ष्य 2026-27 तक 3% से 7% के बीच रखा गया है। इस हेतु आधार वर्ष: 2023-24 निर्धारित किया गया है।
- अनुपालन तंत्र: जो इकाइयां लक्ष्य पूरा करने में विफल रहेंगी, उन्हें कमी को पूरा करने के लिए कार्बन क्रेडिट प्रमाण-पत्र (CCCs) खरीदना होगा।
- ऐसा न करने पर 'पर्यावरण क्षतिपूर्ति' दंड लगाया जाएगा, जो CCCs की औसत व्यापारिक कीमत के दोगुने के बराबर होगा।
- महत्त्व: यह कदम भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) लक्ष्यों के अनुरूप है। इनमें 2030 तक GDP की उत्सर्जन तीव्रता को 45% तक कम करने और 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने का लक्ष्य शामिल है।

