ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 (SOLID WASTE MANAGEMENT RULES, 2026) | Current Affairs | Vision IAS

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ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2026 (SOLID WASTE MANAGEMENT RULES, 2026)

01 Mar 2026
1 min

In Summary

  • केंद्रीय मंत्रालय ने चक्रीय अर्थव्यवस्था और ईपीआर को एकीकृत करते हुए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (एसडब्ल्यूएम) नियम, 2026 को अधिसूचित किया।
  • प्रमुख प्रावधानों में अनिवार्य चार-स्तरीय पृथक्करण, थोक अपशिष्ट उत्पादक की जवाबदेही, केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल और उद्योगों द्वारा आरडीएफ का उपयोग शामिल हैं।
  • नियमों के तहत लैंडफिलिंग को गैर-पुनर्चक्रणीय, गैर-ऊर्जा पुनर्प्राप्त करने योग्य अपशिष्ट और अक्रिय सामग्री तक सीमित किया गया है, ऑडिट अनिवार्य किए गए हैं, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति शुरू की गई है, और पहाड़ी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (एसडब्ल्यूएम) की समस्या का समाधान किया गया है।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

केंद्रीय  पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026 को अधिसूचित किया है। ये नियम ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2016 की जगह लागू होंगे।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियम, 2026 के बारे में

  • किसके अंतर्गत अधिसूचित: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत अधिसूचित ये नियम 1 अप्रैल, 2026 से पूर्ण रूप से लागू होंगे।
  • संशोधित नियम: इन नियमों में चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Producer Responsibility–EPR) के सिद्धांतों को सम्मिलित किया गया है। 

SWM नियम, 2026 के मुख्य प्रावधान

  • ठोस अपशिष्ट  को इनके उत्पादन स्रोत पर ही अनिवार्य रूप से चार श्रेणियों में अलग-अलग किया जाएगा (इन्फोग्राफिक देखिए)।
  • थोक अपशिष्ट उत्पादक (BWGs) की परिभाषा: इसमें सरकारी विभाग, स्थानीय निकाय, आवासीय सोसायटियां जैसी इकाइयां शामिल हैं। इनकी निम्नलिखित जिम्मेदारियां होंगी:
    • पर्यावरण-अनुकूल तरीके से अपशिष्ट का संग्रह, परिवहन एवं निस्तारण सुनिश्चित करना।
    • जहाँ संभव हो, गीले अपशिष्ट का उत्पादन स्थल पर ही प्रसंस्करण (निस्तारण) करना चाहिए, अथवा विस्तारित थोक अपशिष्ट उत्पादक उत्तरदायित्व (Extended Bulk Waste Generator Responsibility-EBWGR) प्रमाणपत्र प्राप्त करना चाहिए।
      • EBWGR फ्रेमवर्क थोक अपशिष्ट उत्पादकों को उनके द्वारा उत्पन्न ठोस अपशिष्ट के लिए जवाबदेह ठहराता है।
  • केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल: यह पोर्टल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के सभी चरणों की निगरानी हेतु तैयार किया गया है। इन चरणों में शामिल हैं; अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाओं का पंजीकरण, मंजूरी, लेखा परीक्षा, आदि।
  • उद्योगों द्वारा 'अपशिष्ट व्युत्पन्न ईंधन (Refuse Derived Fuel: RDF)' का उपयोग: सीमेंट संयंत्रों एवं 'अपशिष्ट-से-ऊर्जा' संयंत्रों सहित अन्य औद्योगिक इकाइयों को अपशिष्ट व्युत्पन्न ईंधन का उपयोग करना अनिवार्य किया गया है।
  • अपशिष्ट व्युत्पन्न ईंधन का उत्पादन उच्च उष्मीय मान (Calorific Value) वाले नगरपालिका ठोस अपशिष्ट को कतरन एवं निर्जलीकरण करके किया जाता है। इन अपशिष्टों में मुख्यतः ऐसे प्लास्टिक, कागज और वस्त्र शामिल होते हैं जिनका पुनर्चक्रण नहीं किया जा सकता है। 
  • लैंडफिल के उपयोग को सीमित करना: लैंडफिल का अनिवार्य रूप से वार्षिक लेखा-परीक्षा की जाएगी। सभी पुराने अपशिष्ट (लेगेसी वेस्ट) डंपसाइट्स की पहचान और आकलन करके बायोमाइनिंग एवं बायोरिमेडिएशन की व्यवस्था की जाएगी।
    • लैंडफिल का उपयोग अब केवल ऐसे अपशिष्टों के लिए सख्ती से सीमित कर दिया गया है, जिन्हें न तो पुनर्चक्रित किया जा सकता है और न ही जिनसे ऊर्जा उत्पादन हो सकता है। निष्क्रिय (नुकसान-रहित) अपशिष्ट पदार्थों को लैंडफिल में डालने की अनुमति है।
  • पहाड़ी क्षेत्रों और द्वीपों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM): उदाहरण के तौर पर, स्थानीय निकाय पर्यटकों से उपयोगकर्ता शुल्क वसूल सकते हैं। ये संस्थाएं उपलब्ध अपशिष्ट प्रबंधन सुविधाओं की क्षमता के आधार पर पर्यटकों के आगमन की संख्या निर्धारित कर सकती हैं।
  • पर्यावरणीय प्रतिपूर्ति (Environmental Compensation-EC): उपर्युक्त नियमों का अनुपालन न होने की स्थिति में 'प्रदूषक द्वारा भुगतान सिद्धांत' के आधार पर पर्यावरणीय प्रतिपूर्ति से संबंधित प्रावधान लागू होगा। 

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में चुनौतियां

  • अपशिष्ट उत्पादन में वृद्धि: तीव्र शहरीकरण, जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक विकास तथा बदलती जीवनशैली के कारण अपशिष्ट उत्पादन में वृद्धि दर्ज की जा रही है।
    • कुल अपशिष्ट उत्पादन के बढ़कर 2030 तक 165 मिलियन टन और 2050 तक 436 मिलियन टन होने का अनुमान है।
  • संचालन संबंधी कमियां: अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े लोगों या संस्थाओं के बीच समन्वय की कमी है। साथ ही, अपशिष्ट उत्पादन के स्रोत पर अपशिष्ट को अलग-अलग नहीं किया जाता है। इन वजहों से अपशिष्ट संग्रह एवं निस्तारण की दक्षता प्रभावित होती है।
    • केवल 60–70% अपशिष्ट का ही संग्रह हो पाता है, और मात्र 15–20% अपशिष्ट का ही निस्तारण किया जाता है।
  • अवसंरचनाओं की कमी: अपशिष्ट के प्रसंस्करण एवं निगरानी हेतु सुविधाओं की कमी है; अधिक पूंजी की आवश्यकता वाली अवसंरचना परियोजनाओं के लिए नगरपालिकाओं के पास वित्तीय संसाधन नहीं है, आदि।
    • केवल लगभग 39% अपशिष्ट का ही वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण हो रहा है, जबकि अधिकांश शहरी क्षेत्र खुले में कचरा फेंकने या कम प्रभावी उपचार सुविधाओं पर निर्भर हैं।
  • तकनीकी चुनौतियां: अपशिष्ट के निस्तारण में तकनीकी खामियां, अपशिष्ट को उपयोगी संसाधन में बदलने में कम अनुसंधान एवं विकास (R&D), तथा कुशल मानव संसाधन की कमी जैसी चुनौतियां मौजूद हैं। इन वजहों से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) के आधुनिकीकरण में समस्या उत्पन्न होती है।
  • विनियामक और नियमों के अनुपालन से जुड़ी समस्याएं: नियमों को लागू करने के लिए उपयुक्त तंत्र की कमी है, अपशिष्ट प्रबंधन के सभी चरणों की निगरानी रखने में जवाबदेही की कमी है, तथा विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व सिद्धांत के क्रियान्वयन में समस्या मौजूद है।
  • अन्य चुनौतियां: इनमें शामिल हैं; अपशिष्ट के प्रसंस्करण से जुड़ी इकाइयों का आर्थिक रूप से लाभकारी न होना, पुनर्चक्रण बाजार का ठीक से विकसित न होना; अपशिष्ट को अलग-अलग करने के प्रति लोगों की लापरवाही; तथा पुराने जमा कचरे (लेगेसी वेस्ट) का लगातार बढ़ना आदि।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) के लिए वर्तमान कानूनी ढाँचा

  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
  • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016
  • ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2022
  • निर्माण एवं विध्वंस (C&D) अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 {पर्यावरण (निर्माण एवं विध्वंस) अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2025, 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे।}
  • जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016

भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) हेतु प्रमुख पहलें

  • स्वच्छ भारत मिशन (SBM 2.0): इसके उद्देश्य हैं; ठोस अपशिष्ट निस्तारण क्षमता का विस्तार करना, अपशिष्ट उत्पादन के स्रोत पर अलग-अलग करने को बढ़ावा देना तथा वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को लागू करना।
  • स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 का उद्देश्य 2026 तक सभी शहरों को कचरा-मुक्त बनाना है।
  • डंपसाइट रिमेडिएशन एक्सेलेरेटर प्रोग्राम (DRAP): अक्टूबर 2026 तक "लक्ष्य: शून्य डंपसाइट" प्राप्त करना। यह 5P ढांचे पर आधारित है—राजनीतिक नेतृत्व (Political Leadership), लोक वित्त (Public Finance), साझेदारी (Partnerships), जनभागीदारी (People's Participation) और परियोजना प्रबंधन (Project Management)। 
    • अब तक 62% से अधिक पुराने अपशिष्ट का निस्तारण किया जा चुका है।
  • सिटी इन्वेस्टमेंट्स टू इनोवेट, इंटीग्रेट एंड सस्टेन 2.0 (CITIIS 2.0): इसका उद्देश्य चक्रीय अर्थव्यवस्था, एकीकृत अपशिष्ट प्रबंधन तथा जलवायु-अनुकूल शहरी परियोजनाओं के क्रियान्वयन को बढ़ावा देना है।
  • गोबरधन (GoBARDHAN – Galvanizing Organic Bio-Agro Resources Dhan): इसका उद्देश्य कृषि, पशुपालन और शहरी क्षेत्रों से उत्पन्न जैविक अपशिष्ट को जैव-ऊर्जा (जैसे बायोगैस) और जैविक उर्वरकों में परिवर्तित करना।

 

आगे की राह 

  • विनियामक ढांचे को मजबूत करना: भवनों के निर्माण को मंजूरी देते समय निर्माण एवं विध्वंस (C&D) अपशिष्ट के प्रबंधन करने की शर्त शामिल करनी चाहिए, प्रौद्योगिकी संचालित निगरानी प्रणालियां विकसित करनी चाहिए, और विभिन्न प्रशासनिक स्तरों पर नियमों में समानता लानी चाहिए।  
  • अवसंरचना क्षमता बढ़ाना: इनमें शामिल हैं; विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट निस्तारण इकाइयों में निवेश करना, सभी शहरों में अपशिष्ट से उपयोगी-पदार्थ पुनर्प्राप्ति सुविधा स्थापित करना, वैज्ञानिक तरीके से सेनेटरी लैंडफिल विकसित करना, और अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पादन संयंत्र लगाना।
  • प्रौद्योगिकी और नवाचार का उपयोग: GPS और RFID आधारित डिजिटल निगरानी प्रणाली का उपयोग करना; AI आधारित अपशिष्ट  प्रबंधन तकनीक विकसित करना; तथा अपशिष्ट के पुनः उपयोग, अपशिष्ट से उपयोगी सामग्री प्राप्त करने और अपशिष्ट स्थल को उपयोग लायक बनाने पर अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए।
  • संस्थाओं के बीच समन्वय बढ़ाना: शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) में विशिष्ट अपशिष्ट प्रबंधन प्रकोष्ठ बनाना, विभागों के बीच समन्वय समितियाँ बनाना, प्रशिक्षण के माध्यम से नगरपालिका के कर्मचारियों की क्षमता बढ़ाना, और सार्वजनिक–निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • पुनर्चक्रण बाजार का विकास: इसमें पुनर्चक्रित उत्पादों के लिए गुणवत्ता मानक तय करना, पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग पर कर छूट देना, अनौपचारिक क्षेत्रक के श्रमिकों को पुनर्चक्रण प्रणाली में शामिल करना, तथा सरकारी संस्थाओं द्वारा वस्तुओं की खरीद में पुनर्चक्रित सामग्री के उपयोग को अनिवार्य करना जैसे उपाय किए जाने चाहिए।
    • उदाहरण के लिए: पुनर्चक्रण उद्योगों पर केंद्रित इको-इंडस्ट्रियल पार्क की मंजूरी देनी चाहिए।
  • वित्तीय संसाधन सुनिश्चित करना: अपशिष्ट उत्पादन की मात्रा के आधार पर उपयोगकर्ता शुल्क लगाना, हरित वित्तपोषण और जलवायु निधि की उपलब्धता सुनिश्चित करना, अलग से अपशिष्ट प्रबंधन निधि बनाना, और ग्रीन बॉण्ड जैसे नए वित्तीय साधनों का उपयोग करना जैसे उपाय किए जा सकते हैं।
  • पुराने अपशिष्ट (लेगेसी वेस्ट) की समस्या का समाधान: बायो-माइनिंग के माध्यम से डंपसाइट्स से निपटना चाहिए, तय समय-सीमा के तहत उन्हें बंद कर देना चाहिए, ऐसे स्थलों की भूमि का उपयोग उपयोगी कार्यों के लिए करना चाहिए, तथा ऐसे स्थलों पर लंबे समय तक निगरानी रखनी चाहिए। 

अपशिष्ट निस्तारण की सर्वोत्तम पद्धतियां

  • इंदौर मॉडल: लगातार 7 वर्षों तक भारत का सबसे स्वच्छ शहर रहा। निरंतर जनभागीदारी के माध्यम से सभी घरों से अपशिष्ट संग्रह करने का लक्ष्य हासिल किया गया।
  • अनुपम मॉडल (नई दिल्ली): अनुपम कॉलोनियां ऐसी आवासीय कॉलोनियां हैं जहाँ विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली सफलतापूर्वक लागू की गई है। इसकी निगरानी विशेष स्वच्छता निरीक्षकों द्वारा की जाती है।
  • स्वच्छ/SWaCH (ठोस अपशिष्ट संग्रहण और निस्तारण) पुणे मॉडल : सहकारी संगठन के माध्यम से अनौपचारिक क्षेत्र के कचरा बीनने वालों को घर-घर कचरा संग्रह करने की औपचारिक प्रणाली में शामिल किया गया।

 

निष्कर्ष

शहरी शासन को सुदृढ़ बनने तथा संधारणीय अपशिष्ट प्रबंधन पद्धतियों को बढ़ावा देना चाहिए। इससे अपशिष्ट प्रबंधन को पर्यावरण की स्वच्छता बनाए रखने, संसाधनों के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने और 'नेट ज़ीरो 2070' जैसे भारत के दीर्घकालिक लक्ष्यों की प्राप्ति में मदद मिल सकती है।

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स्वच्छ/SWaCH (ठोस अपशिष्ट संग्रहण और निस्तारण) पुणे मॉडल

यह पुणे का एक मॉडल है जहाँ सहकारी संगठन के माध्यम से अनौपचारिक क्षेत्र के कचरा बीनने वालों को घर-घर कचरा संग्रह की औपचारिक प्रणाली में एकीकृत किया गया है।

अनुपम मॉडल (नई दिल्ली)

यह एक मॉडल है जहाँ आवासीय कॉलोनियों में विकेन्द्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली सफलतापूर्वक लागू की गई है। इसकी निगरानी विशेष स्वच्छता निरीक्षकों द्वारा की जाती है।

इंदौर मॉडल

यह भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का एक सफल मॉडल है, जिसे लगातार सात वर्षों तक भारत के सबसे स्वच्छ शहर का दर्जा प्राप्त हुआ है। यह मॉडल निरंतर जनभागीदारी के माध्यम से सभी घरों से अपशिष्ट संग्रह प्राप्त करने पर आधारित है।

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