ओडिशा के बाद गोवा और झारखंड का स्थान आता है।
वर्गीकरण | प्रमुख राज्यों का प्रदर्शन (सामान्य श्रेणी) | उत्तर पूर्वी (NE) और हिमालयी राज्यों का प्रदर्शन |
अचीवर | ओडिशा, इसके बाद गोवा और झारखंड का स्थान आता है। | अरुणाचल प्रदेश, इसके बाद उत्तराखंड का स्थान आता है। |
फ्रंट रनर | गुजरात, इसके बाद महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक का स्थान आता है। |
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परफॉर्मर | मध्य प्रदेश, इसके बाद हरियाणा, बिहार, तमिलनाडु और राजस्थान का स्थान आता है। | त्रिपुरा, इसके बाद मेघालय, असम, मिजोरम और सिक्किम का स्थान आता है। |
एस्पिरेशनल | केरल, इसके बाद पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और पंजाब का स्थान आता है। | नागालैंड, इसके बाद हिमाचल प्रदेश और मणिपुर का स्थान आता है। |
FHI किस प्रकार विवेकपूर्ण और सतत राजकोषीय नीतियों को प्रोत्साहित करता है?
- प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा: राज्यों की सार्वजनिक रैंकिंग स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म देती है।
- साक्ष्य-आधारित राजकोषीय नीति निर्माण: कमियों की पहचान करके और सर्वोत्तम प्रथाओं को उजागर करके, यह सूचकांक नीति निर्माताओं को राजकोषीय शासन को सुदृढ़ करने में सहायता करता है।
- अनुकूलित नीतिगत ढाँचा: विभिन्न क्षेत्रों की विशिष्ट संरचनात्मक विशेषताओं (जैसे पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के विशिष्ट राजकोषीय पोर्टफोलियो) को ध्यान में रखते हुए, FHI संदर्भ-विशिष्ट अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।
- लक्षित हस्तक्षेपों को सक्षम बनाना: यह प्रत्येक राज्य की राजकोषीय शक्तियों, कमजोरियों और समग्र प्रोफ़ाइल को रेखांकित करता है, जिससे कि उनकी राजकोषीय स्थिति में सुधार के लिए अनुकूल सुझाव प्रदान किया जा सके।
- विकास को बढ़ावा देना: पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में राजकोषीय प्रबंधन को सुदृढ़ करने से राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन, पूर्वोत्तर विशेष अवसंरचना विकास योजना और हरित विकास मिशन जैसी पहलों की सफलता में तेजी आ सकती है।
राज्यों के लिए प्रमुख सिफारिशें

- राजस्व संग्रह में सुधार: यह मुख्य रूप से जीएसटी आधार को व्यापक बनाकर और स्वयं की कर क्षमता को बढ़ाकर किया जा सकता है। दूसरी ओर राजकोषीय लचीलेपन को बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध व्यय पर अंकुश लगाया जा सकता है।
- घाटे को नियंत्रित करना और ऋण को स्थिर करना: सब्सिडी को युक्तिसंगत बनाना, व्यय के मानक मदों को अपनाना, पूंजीगत व्यय की गुणवत्ता और संरचना में सुधार करना तथा मध्यम अवधि की राजकोषीय योजनाओं को अपनाना।
- लगातार दबाव झेल रहे राज्यों के लिए लक्षित समेकन उपाय: जैसे कि ऑफ-बजट उधार पर सख्त नियंत्रण तथा बेहतर नकदी और ऋण प्रबंधन करना।
- साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण को समर्थन: उन्नत सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणालियों, CAG-सत्यापित डेटा के माध्यम से अधिक पारदर्शिता तथा FHI जैसे सहकर्मी तुलनात्मक उपकरणों का उपयोग करना।
निष्कर्ष
राज्य के व्यय दायित्वों के व्यापक दायरे और प्रमुख सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में उनकी भूमिका को देखते हुए, राज्य वित्त का व्यवस्थित आकलन राजकोषीय अनुशासन, संसाधनों के कुशल आवंटन और दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। रिपोर्ट में सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करने, राजकोषीय आंकड़ों में अधिक पारदर्शिता लाने और ऑफ-बजट उधारियों की कड़ी निगरानी करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है।