सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में, राष्ट्रपति ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 को अपनी स्वीकृति दे दी है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 में मुख्य परिवर्तन
- इसका उद्देश्य ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में संशोधन करना है।
पहलू | विवरण |
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की संशोधित परिभाषा |
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पहचान प्रमाण पत्र जारी करना |
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सत्यापन प्राधिकरण |
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लिंग परिवर्तन |
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ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद |
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अपराध और दंड | अधिनियम में कुछ नए अपराध जोड़े गए हैं
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ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 का महत्व
- बेहतर कार्यान्वयन: संशोधित परिभाषा और पहचान प्रक्रिया 2019 के अधिनियम की अस्पष्टताओं को दूर करने में मदद कर सकती है। इससे कथित तौर पर कानून को लागू करना आसान हो जाएगा।
- मजबूत कानूनी सुरक्षा उपाय: गंभीर अपराधों के लिए श्रेणीबद्ध दंड की शुरुआत शोषण और हिंसा के विरुद्ध सुरक्षा को मजबूत करती है।
- शारीरिक अखंडता का संरक्षण: जबरन पहचान परिवर्तन और शारीरिक क्षति को दंडनीय बनाकर, यह विधेयक गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता के संवैधानिक सिद्धांत को पुष्ट करता है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 से जुड़े मुद्दे
- आत्म-पहचान के अधिकार की हानि: आत्म-पहचान से संस्थागत सत्यापन की ओर बदलाव, पहचान निर्धारण में व्यक्ति की स्वायत्तता और गरिमा को कमजोर करता है।
- संकीर्ण परिभाषा के कारण बहिष्करण: 2019 के अधिनियम के विपरीत, यह विधेयक प्रभावी रूप से ट्रांस-मेन (Trans-men), नॉन-बाइनरी (Non-binary) लोगों और जेंडर-क्वीर (Gender-queer) व्यक्तियों को कानूनी सुरक्षा से बाहर करता है।
- नौकरशाही बाधाएं: पहचान की मान्यता चिकित्सा परीक्षण और जिला मजिस्ट्रेट को दी गई सिफारिश पर निर्भर करती है। इससे देरी, विवेकाधीन निर्णय और बहिष्करण का जोखिम हो सकता है।
- मेडिकल गेटकीपिंग: विधेयक कानूनी मान्यता के लिए सर्जरी या हार्मोनल उपचार और मेडिकल बोर्ड द्वारा अनुमोदन को अनिवार्य बनाता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वायत्तता को कमजोर करता है।
- कानूनी असमानता: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ यौन शोषण को मामूली अपराधों के समकक्ष माना गया है और केवल 2 वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है, जो कि सिस-जेंडर महिलाओं के बलात्कार के लिए कड़े दंड के विपरीत है। यह भेदभावपूर्ण और असमान कानूनी संरक्षण को दर्शाता है।
भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से जुड़े अन्य मुद्दे
- डेटा की कमी: 2011 की जनगणना में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की संख्या 4.8 लाख अनुमानित थी। हालांकि, सामाजिक पूर्वाग्रह और ट्रांसजेंडर व्यक्ति की स्पष्ट परिभाषा के अभाव के कारण वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक होने की संभावना है।
- शैक्षिक बहिष्करण: भारत की जनगणना (2011) के अनुसार, राष्ट्रीय औसत 74.04% के मुकाबले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के बीच कुल साक्षरता दर 56.1% दर्ज की गई है।
- आर्थिक हाशिए पर होना: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC, 2018) के अनुसार, लगभग 96% ट्रांसजेंडर व्यक्ति रोजगार में भेदभाव का सामना करते हैं, और केवल 6% ही औपचारिक क्षेत्रक की नौकरियों में कार्यरत हैं।
- स्वास्थ्य सेवा में बाधाएं: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को लिंग-पुष्टि स्वास्थ्य सेवा तक सीमित पहुंच का सामना करना पड़ता है। इसमें लगभग 27% को उनकी लैंगिक पहचान के कारण चिकित्सा सेवाओं से वंचित कर दिया जाता है (NALSA)।
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों में HIV की व्यापकता 3.8% है , जो राष्ट्रीय औसत से लगभग 20 गुना अधिक है।
- मानवाधिकारों का उल्लंघन: व्यापक ट्रांस-फोबिया और संस्थागत भेदभाव के कारण ट्रांस व्यक्तियों को शारीरिक, यौन और मौखिक दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है।

आगे की राह
- नियमित सर्वेक्षण: ट्रांसजेंडर जनसंख्या पर एक समर्पित राष्ट्रीय सर्वेक्षण या जनगणना अपडेट आयोजित किया जाना चाहिए ताकि लक्षित कल्याणकारी योजनाएं बनाई जा सकें।
- कानूनी और संस्थागत सुधार: कानूनों को योग्यकर्ता सिद्धांतों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लिंग की मान्यता बिना किसी चिकित्सा प्रक्रिया की अनिवार्यता के आत्म-पहचान पर आधारित हो।
- योग्याकार्ता सिद्धांत (YP) मानवाधिकार मानकों की एक विस्तृत श्रृंखला और यौन अभिविन्यास एवं लैंगिक पहचान के मुद्दों पर उनके अनुप्रयोग को संबोधित करते हैं।
- YP को 29 सिद्धांतों के एक समूह के रूप में स्थापित किया गया था जिसमें भारत, अमेरिका, ब्रिटेन आदि सहित 29 हस्ताक्षरकर्ता शामिल थे। YP प्लस 10 को 2017 में अपनाया गया था।
- जागरूकता सृजन: स्कूलों और कॉलेजों में लिंग-संवेदीकरण पाठ्यक्रम शुरू किया जाना चाहिए तथा छात्रवृत्ति और छात्रावास प्रदान किया जाना चाहिए। साथ ही, सामाजिक कलंक को दूर करने एवं जागरूकता पैदा करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जाना चाहिए।
- स्वास्थ्य सेवा सुधार: स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए सेवा-पूर्व और सेवाकालीन प्रशिक्षण में LGBTQIA+ समावेशी सामग्री को शामिल किया जाना चाहिए, और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं एवं HIV रोकथाम कार्यक्रमों का विस्तार किया जाना चाहिए।
- आर्थिक अधिकारिता: विविधता-केंद्रित भर्ती प्रोत्साहन और कर लाभों के माध्यम से निजी क्षेत्रक की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सकता है। साथ ही, ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर सुनिश्चित करने हेतु स्व-रोजगार और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को बढ़ावा दिया जा सकता है।