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डेटा सेंटर्स (Data Centres)

30 Apr 2026
1 min

In Summary

  • निवेश, कर प्रोत्साहन और इंडियाएआई मिशन जैसी सरकारी पहलों और डेटा स्थानीयकरण नीतियों जैसे कारकों के कारण भारत की डेटा सेंटर क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होने का अनुमान है।
  • चुनौतियों में पानी और बिजली की उच्च मांग, जलवायु परिवर्तन के कारण बुनियादी ढांचे से जुड़े जोखिम, भौगोलिक एकाग्रता, जटिल नियम और प्रतिभा की कमी शामिल हैं।
  • आगे बढ़ने का रास्ता सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, एकीकृत संसाधन योजना, उन्नत कूलिंग प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना, हरित मानकों को लागू करना और कौशल की कमी को दूर करना है ताकि भारत को वैश्विक डेटा सेंटर हब बनाया जा सके।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

भारत में डेटा सेंटर की क्षमता लगभग 375 मेगावाट (2020) से बढ़कर लगभग 1500 मेगावाट (2025) हो गई है। 

डेटा सेंटर्स के बारे में

  • डेटा सेंटर किसी इमारत के भीतर एक समर्पित और सुरक्षित या केंद्रीकृत स्थान है, जहां बड़ी मात्रा में डेटा को एकत्रित, संग्रहीत, संसाधित (process), वितरित या उस तक पहुंच प्रदान करने के उद्देश्य से कंप्यूटिंग और नेटवर्किंग उपकरणों को केंद्रित किया जाता है।
  • भारत की स्थिति:
    • डेटा सेंटर क्षमता: 2030 तक चार से पाँच गुना बढ़ने का अनुमान है।
    • डेटा सेंटर बाजार का मूल्य: 4.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर (2023) से बढ़कर 11.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक (2032) पहुंचने का अनुमान है।
    • निवेश: 2019 और 2025 के बीच, वैश्विक और घरेलू, दोनों तरह के निवेशकों से प्राप्त निवेश की प्रतिबद्धता लगभग 95 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गई।

भारत में डेटा सेंटर्स के विकास को बढ़ावा देने वाले कारक

  • बजट 2026-27 में घोषित पहलें:
    • कर प्रोत्साहन (Tax Incentives): पात्र विदेशी कंपनियों को, जो भारत के डेटा सेंटर सेवाओं का उपयोग करके वैश्विक ग्राहकों को क्लाउड सेवाएं प्रदान करती हैं, उन्हें 2047 तक कर में छूट दी जाएगी।
    • सेफ हार्बर (Safe Harbour): यदि भारतीय डेटा सेंटर किसी विदेशी कंपनी की संबद्ध इकाई (related entity) के रूप में कॉस्ट-प्लस मॉडल पर कार्य करता है, तो लागत पर 15% का सेफ हार्बर मार्जिन प्रदान किया जाएगा।
    • मुख्य इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षमताओं को सुदृढ़ करना: भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 के लिए ₹1,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। साथ ही, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग योजना (ECMS) का बजट बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ कर दिया गया है। 
  • डेटा सेंटर के लिए अवसंरचना दर्जा (2022): 5 मेगावाट से अधिक आईटी लोड वाले डेटा सेंटर को अवसंरचना का दर्जा मिलने से उन्हें संस्थागत ऋण तक आसान पहुंचकम ब्याज दरों पर वित्तपोषण और विदेशी निवेश आकर्षित करने में सुविधा मिलती है। 
  • डेटा स्थानीयकरण और संप्रभुता:  
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के निर्देश के अनुसार भुगतान प्रणालियों का डेटा देश के भीतर ही संग्रहित किया जाना आवश्यक है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित की जा सके।
    • डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 डेटा सुरक्षा और जिम्मेदार डेटा उपयोग के लिए शासन संरचना को मजबूत करता है। 
  • एआई डेटा सेंटर पर फोकस: इंडिया AI मिशन (India AI Mission) के तहत सरकार एआई के लिए अनुकूलित अवसंरचना विकसित कर रही है। इसके साथ ही सब्सिडी वाले कंप्यूटर संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं और स्वदेशी (सॉवरेन) एआई मॉडल के विकास को समर्थन दिया जा रहा है। 
  • ड्राफ्ट डेटा सेंटर नीति (2020): इसमें डेटा सेंटर इकोनॉमिक ज़ोन (DCEZs) स्थापित करने और सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम लागू करने की सिफारिश की गई थी। 
  • ई-गवर्नेंस: राष्ट्रीय क्लाउड अवसंरचना जी आई क्लाउड (मेघराज) {GI Cloud (MeghRaj)} स्थापित की गई है, जो राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के माध्यम से ई-गवर्नेंस सेवाओं के लिए सुरक्षित, स्केलेबल और लचीली क्लाउड सुविधाएं प्रदान करती है। 
    • आधारभूत डिजिटल पहलें जैसे आधार (1.36 अरब से अधिक उपयोगकर्ताओं का समर्थन), यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) और ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC) मजबूत डेटा सेंटर अवसंरचना पर अत्यधिक निर्भर हैं।
  • अन्य सहायक कारक:
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित डिजिटल अर्थव्यवस्था में वैश्विक स्तर पर डेटा की तेजी से वृद्धि हो रही है।
    • सास/SaaS (Software as a Service) बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है और 2025 तक इसके 35 बिलियन डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
    • डिजिटल इंडिया पहल के तहत विभिन्न क्षेत्रों में तीव्र डिजिटलीकरण हो रहा है।
    • भारत के उभरते स्टार्ट-अप इकोसिस्टम द्वारा एंटरप्राइज क्लाउड अपनाने में तेजी आई है।
    • नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के विस्तार और शांति/SHANTI अधिनियम जैसी पहलों के माध्यम से विश्वसनीय ऊर्जा समाधान सुनिश्चित किए जा रहे हैं।

भारत में डेटा सेंटर क्षमता के विस्तार के समक्ष चुनौतियां

  • जल की आवश्यकता: 100 मेगावाट के एक विशाल (हाइपरस्केल) डेटा सेंटर को ठंडा रखने के लिए प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर पानी की आवश्यकता हो सकती है, जिससे पहले से ही जल-संकट झेल रहे शहरों जैसे चेन्नई और बेंगलुरु में गंभीर जल संकट उत्पन्न हो सकता है। 
  • अत्यधिक विद्युत मांग: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, डेटा सेंटरों से विद्युत की मांग 2030 तक लगभग दोगुनी होने की संभावना है। 
    • इसके लिए 24×7 स्थिर और निर्बाध विद्युत आपूर्ति आवश्यक होगी। साथ ही, विशेषकर एआई डेटा सेंटरों की अत्यधिक उच्च लोड क्षमता का प्रबंधन करने के लिए भारत की ग्रिड क्षमता को उन्नत करना जरूरी है।
  • अवसंरचना जोखिम: यदि भारत में डेटा सेंटर का निर्माण जलवायु-संवेदनशील योजना के बिना किया जाता है, तो इससे गंभीर संचालनात्मक और वित्तीय नुकसान हो सकते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के अधिकांश जिले अत्यधिक बाढ़ (72%) और अत्यधिक ताप (57%) के जोखिम का सामना करते हैं। 
  • भौगोलिक संकेंद्रण: भारत की 70% से अधिक परिचालन क्षमता प्रमुख वित्तीय और तकनीकी केंद्रों मुख्य रूप से मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद में केंद्रित है।
  • जटिल विनियमन: डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए भूमि उपयोग परिवर्तन, अग्नि सुरक्षा मंजूरी, पर्यावरणीय स्वीकृति और भवन मानकों जैसे अनेक अनुमोदनों की आवश्यकता होती है। इससे परियोजनाओं का जोखिम और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। 
  • विशेषज्ञों की कमी: आधुनिक डेटा सेंटरों के लिए आवश्यक अत्यधिक विशेषज्ञ पेशेवरों की कमी है, जैसे महत्वपूर्ण अवसंरचना साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ और डेटा सेंटर अवसंरचना प्रबंधन (DCIM) विशेषज्ञ।

भारत को वैश्विक डेटा सेंटर हब बनाने के लिए आगे की राह

  • एकल खिड़की स्वीकृति (सिंगल-विंडो क्लीयरेंस): भूमि अधिग्रहण, भवन स्वीकृति, ग्रिड कनेक्टिविटी और अग्नि सुरक्षा मंजूरी जैसी प्रक्रियाओं के लिए एकल खिड़की प्रणाली अपनाई जानी चाहिए, ताकि परियोजनाओं के क्रियान्वयन को तेज किया जा सके। 
  • एकीकृत भूमि–जल–ऊर्जा समन्वित योजना: नए डेटा सेंटरों के स्थान चयन के लिए संसाधन-आधारित मास्टर प्लान अपनाया जा सकता है, जिसमें भूमि आवंटन से पहले ग्रिड की तैयार स्थिति, स्थानीय भूजल दबाव और जलवायु जोखिमों का मूल्यांकन किया जाए।
  • उन्नत शीतलन (कूलिंग) तकनीकों को बढ़ावा देना: डायरेक्ट-टू-चिप कूलिंग, डायइलेक्ट्रिक प्लेट कूलिंग और इमर्शन कूलिंग जैसे विकल्प जल और विद्युत की खपत को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
  • अनिवार्य हरित मानक: स्वैच्छिक अनुपालन से आगे बढ़कर लागू करने योग्य सततता मानकों को अपनाना आवश्यक है। 
    • सरकार LEED (लीडरशिप इन एनर्जी एंड एनवायर्नमेंटल डिज़ाइन) जैसे वैश्विक प्रमाणनों को बढ़ावा दे सकती है।
  • कौशल की कमी को दूर करना: विश्वविद्यालयों और आईटीआई (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों) में विशेष पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं, ताकि अगली पीढ़ी के विशेषीकृत डेटा सेंटर इंजीनियर्स और संचालकों को प्रशिक्षित किया जा सके।

निष्कर्ष

भारत का डेटा सेंटर इकोसिस्टम तेजी से विस्तार कर रहा है। यह दर्शाता है कि भारत एक वैश्विक डिजिटल केंद्र के रूप में उभर रहा है, जिसे नीतिगत समर्थन, बढ़ती डेटा मांग और तकनीकी प्रगति ने गति दी है। हालांकि, ऊर्जा, जल, अवसंरचना और कौशल से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना सतत विकास के लिए आवश्यक है। हरित तकनीकों, सरल विनियमों और क्षमता निर्माण पर केंद्रित समन्वित दृष्टिकोण भारत को एक मजबूत और प्रतिस्पर्धी वैश्विक डेटा सेंटर गंतव्य के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण होगा। 

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डेटा सेंटर अवसंरचना प्रबंधन (DCIM)

यह डेटा सेंटर के सभी घटकों जैसे सर्वर, स्टोरेज, नेटवर्किंग, पावर और कूलिंग के एकीकृत निगरानी और प्रबंधन के लिए हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और सेवाओं का एक सेट है।

LEED (लीडरशिप इन एनर्जी एंड एनवायर्नमेंटल डिज़ाइन)

यह इमारतों के डिजाइन, निर्माण, संचालन और रखरखाव के लिए एक ग्रीन बिल्डिंग प्रमाणन प्रणाली है, जिसे स्थिरता और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA)

एक स्वायत्त अंतर-सरकारी संगठन जो 1974 में 1973 के तेल संकट के बाद स्थापित हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों को सुरक्षित और निरंतर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में सहायता के लिए ऊर्जा विश्लेषण, डेटा, नीतिगत सुझाव और समाधान प्रदान करना है। भारत इसका एक सहयोगी सदस्य है।

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