सुर्ख़ियों में क्यों?
वर्तमान में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच खुले संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, जिससे दोनों देशों के संबंध लगातार बिगड़ते जा रहे हैं।
पृष्ठभूमि

- 2021 और 2025 के बीच, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) ने पाकिस्तान में कई हमले किए। इसे पाकिस्तानी तालिबान के नाम से भी जाना जाता है। यह अफगान तालिबान की एक वैचारिक शाखा है।
- TTP का उदय 2007 में हुआ था। यह अफगानिस्तान के तालिबान से अलग है, लेकिन तालिबान के साथ इसके गहरे वैचारिक, सामाजिक और भाषाई संबंध हैं।
- पाकिस्तान ने 'ग़ज़ब लिल-हक़' ऑपरेशन शुरू किया, जबकि अफगानिस्तान ने 'रद्द अल-जुल्म' ऑपरेशन चलाया। ये कार्रवाइयां तोपखाने की गोलीबारी, जमीनी हमलों, हवाई और ड्रोन हमलों के जवाब में की गईं, जिनमें महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया।
- क़तर और तुर्की ने तालिबान और पाकिस्तान की सरकारों के बीच एक अस्थायी शांति स्थापित करने में मदद की, लेकिन बाद में, सऊदी अरब की मध्यस्थता से हुई बातचीत 2025 के अंत तक टूट गई।
- भारत की अनुक्रिया: भारत ने अफगानिस्तान की भूमि पर पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमलों की निंदा की, जिनसे जनहानि और नागरिक अवसंरचना को नुकसान पहुंचा है। साथ ही, भारत ने अफगानिस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अपने समर्थन को दोहराया है।
अफगानिस्तान-पाकिस्तान संघर्ष के मुख्य कारण
- TTP का मुद्दा: 2021 में सत्ता में लौटने के बाद तालिबान पर बार-बार यह आरोप लगाया गया कि वे अफगान भूमि पर TTP के उग्रवादियों को शरण दे रहे हैं, जिसे अफगानिस्तान नकारता रहा है।
- डूरंड लाइन से संबंधित अनसुलझा सीमा विवाद: यह 1893 में ब्रिटिश इंडिया और अफगानिस्तान के बीच खींची गई 2,600 किलोमीटर की सीमा है, जिसे अफगानिस्तान एक थोपा हुआ औपनिवेशिक सीमांकन मानता है जबकि पाकिस्तान इसे अपनी संप्रभु सीमा मानता है।
- पश्तून राष्ट्रवाद: अफगानिस्तान ने एक ऐसे पश्तून राज्य की मांग की थी, जो अफगानिस्तान में रहने वाले पश्तून कबीलों को नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (NWFP) और बलूचिस्तान में रहने वालों से जोड़ सके।
- पाकिस्तान के लिए, अफगानिस्तान के दावे स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य थे क्योंकि ये पाकिस्तान के भूभाग के एक बड़े हिस्से की मांग करने के बराबर थे।
संघर्ष के निहितार्थ
- बदलते सत्ता समीकरण: तालिबान के भीतर आंतरिक विभाजन और पाकिस्तान के साथ उनके टकराव भारत के प्रति उनके रुख को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे देश में भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों पर असर पड़ सकता है।
- दक्षिण एशिया के लिए सुरक्षा खतरे: पाकिस्तान से जुड़े सीमा-पार आतंकवाद के इतिहास को देखते हुए, यह संघर्ष भारत के लिए सीमा-पार उग्रवाद और प्रॉक्सी प्रतिद्वंद्विता का जोखिम बढ़ा देता है।
- इसके अलावा, पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है, तथा चीन तथा रूस दोनों ही उसके प्रमुख रक्षा साझेदार हैं; जिससे परमाणु प्रसार को लेकर चिंताएं उत्पन्न होती हैं।
- भारत-पाकिस्तान संबंधों में और गिरावट: काबुल में भारत के प्रभाव को पाकिस्तान को "घेरने" के प्रयास और एक खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
- अन्य चिंताएं: क्षेत्रीय व्यापार और कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव; शरणार्थियों की संख्या में वृद्धि; आदि।
भारत के लिए आगे की राह
- सॉफ्ट-पावर कूटनीति का लाभ उठाएं: सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए अफगानिस्तान में भारत की मानवीय और बुनियादी ढांचागत उपस्थिति लंबे समय से रही है।
- उदाहरण के लिए, सलमा बांध (अफगान-भारत मैत्री बांध) के रखरखाव जैसी मानवीय परियोजनाओं के माध्यम से भारत की वहां मजबूत उपस्थिति है।
- खुफिया जानकारी को सुदृढ़ करना: भारत को ठोस खुफिया जानकारी और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के आधार पर अपने जुड़ाव के दायरे की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए, ताकि वह अपने पड़ोस में कट्टरपंथ के प्रसार या प्रॉक्सी प्रतिस्पर्धाओं में उलझने से खुद को सुरक्षित रख सके।
- यथार्थवादी दृष्टिकोण: पश्चिमी सीमा से कट्टरपंथ या आतंकवाद के प्रसार को रोकने तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए तालिबान नेतृत्व के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखना आवश्यक है।
- कनेक्टिविटी पहलें: तालिबान के साथ घनिष्ठ जुड़ाव के माध्यम से, भारत भारत-अफगानिस्तान एयर फ्रेट कॉरिडोर और चाबहार बंदरगाह परियोजना को पुनः शुरू और विस्तारित कर सकता है।
- नए समीकरण: पुराने सहयोगियों (अफगान तालिबान और पाकिस्तान) के बीच बढ़ते मतभेद और नए साझेदारों (भारत और अफगान तालिबान) के बीच बढ़ती नजदीकियों के चलते देशों को पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों के प्रति अपनी रणनीतिक नीति और रुख को पुनः संतुलित करना पड़ रहा है।
निष्कर्ष
भारत को अपनी खुफिया जानकारी एकत्र करने और प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना चाहिए, ताकि वह क्षेत्र में अपनी रणनीतिक उपस्थिति बढ़ा सके, अफगानिस्तान के माध्यम से कनेक्टिविटी परियोजनाओं से लाभ उठा सके, और कट्टरपंथ के प्रसार या प्रॉक्सी प्रतिस्पर्धाओं में उलझने से खुद को सुरक्षित रख सके।