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समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code)

30 Apr 2026
1 min

In Summary

  • उत्तराखंड के बाद गुजरात ने भी एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) विधेयक पारित किया है, जिसका उद्देश्य विवाह, तलाक और विरासत के लिए एक समान धर्मनिरपेक्ष कानून बनाना है।
  • यूसीसी के समर्थक लैंगिक समानता, राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता का हवाला देते हैं, जबकि विरोधी धार्मिक स्वायत्तता और हाशिए पर पड़े समुदायों पर इसके प्रभाव के बारे में चिंता व्यक्त करते हैं।
  • न्यायिक घोषणाएँ और अंतर्राष्ट्रीय दायित्व यूसीसी का समर्थन करते हैं, साथ ही सार्वजनिक परामर्श और क्षेत्रीय सुधारों के माध्यम से क्रमिक कार्यान्वयन के सुझाव भी देते हैं।

In Summary

सुर्ख़ियों में क्यों?

गुजरात, उत्तराखंड के बाद समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पारित करने वाला भारत का दूसरा राज्य बन गया है। 

समान नागरिक संहिता (UCC) के बारे में

  • UCC का उद्देश्य विवाह, विवाह-विच्छेद, दत्तक, उत्तराधिकार और संपत्ति जैसे मामलों में विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों को समाप्त करके एक समान, धर्मनिरपेक्ष विधिक तंत्र स्थापित करना है। इस एक समान तंत्र से समानता, राष्ट्रीय एकता और लैंगिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा।
  • संवैधानिक प्रावधान: संविधान के भाग IV में 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP) के तहत अनुच्छेद 44 यह प्रावधान करता है कि राज्य को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करना चाहिए।
  • वर्तमान स्थिति: भारत में विभिन्न धर्मों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून हैं:
    • हिंदू व्यक्तिगत कानून: हिंदू, बौद्ध, जैन और सिखों के लिए (हिंदू विवाह अधिनियम, 1955; हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 आदि)।
    • मुस्लिम व्यक्तिगत कानून: मुस्लिम स्वीय विधि (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937। यह मुसलमानों के बीच विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और भरण-पोषण से संबंधित मामलों को शासित करता है। 
    • ईसाई व्यक्तिगत कानून: भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872; विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1869।
    • पारसी व्यक्तिगत कानून: पारसी विवाह और विवाह-विच्छेद अधिनियम, 1936।
  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954: किसी भी भारतीय नागरिक को धर्म की परवाह किए बिना, सिविल कानूनों के तहत शादी करने की अनुमति देता है। इस प्रकार धार्मिक कानूनों से बाहर एक विकल्प उपलब्ध होता है।
  • हालांकि 21वें विधि आयोग (2018) ने यह स्पष्ट रूप से कहा था कि इस चरण में UCC न तो अनिवार्य है और न ही वांछनीय। हालांकि, भारत के 22वें विधि आयोग (2022) ने UCC पर जनता और धार्मिक समुदायों से राय मांगी।
  • उत्तराखंड और गुजरात के अलावा, गोवा में भी पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867 के तहत एक समान नागरिक संहिता लागू है।

UCC से जुड़े न्यायिक निर्णय

  • मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम वाद (1985): उच्चतम न्यायालय (SC) ने संसद को समान नागरिक संहिता के संबंध में कानून बनाने का निर्देश दिया।
  • सरला मुद्गल बनाम भारत संघ वाद (1995): SC ने अलग-अलग धर्मों के बीच लैंगिक समानता के लिए UCC की आवश्यकता पर बल दिया।
  • जॉन वेल्लामेट्टम बनाम भारत संघ वाद (2003): SC ने दोहराया कि UCC अलग-अलग विचारधाराओं के आधार पर होने वाले टकरावों से बचकर राष्ट्रीय एकता स्थापित करने में मदद करेगा।
  • शायरा बानो बनाम भारत संघ वाद (2017): SC ने तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत) की प्रथा को तत्काल असंवैधानिक घोषित कर दिया। यह निर्णय व्यक्तिगत कानून में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में राज्य की कार्रवाई में एक बदलाव का संकेत था।
  • जोस पाउलो कॉतिन्हो बनाम मारिया लुइज़ा वेलेंटीना परेरा वाद (2019): SC ने गोवा की नागरिक संहिता को UCC का एक "व्यावहारिक मॉडल" बताया। साथ ही, बल देकर कहा कि यह अनिवार्य नहीं कि एक समान संहिता धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन करे।

 

 

UCC के पक्ष में तर्क

  • धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा: यह सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून प्रदान करती है। इसमें धार्मिक रीति-रिवाजों पर आधारित अलग-अलग नियमों के बजाय कानूनी एकरूपता को प्राथमिकता दी जाती है।
  • लैंगिक समानता को बढ़ावा: यह महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण प्रथाओं को समाप्त करेगी, जैसे कि मुस्लिम कानून में बहुविवाह, उत्तराधिकार के असमान अधिकार और पारसी महिलाओं को अपने समुदाय से बाहर शादी करने पर विरासत में मिलने वाली संपत्ति पर प्रतिबंध आदि।
  • समान दर्जा सुनिश्चित करना: मूल अधिकारों का विरोध करने वाली धार्मिक प्रथाओं को बदलकर, UCC कानून के तहत समान सुरक्षा की गारंटी देता है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप है।
  • राष्ट्रीय एकता: "एक राष्ट्र, एक कानून" के दृष्टिकोण को लागू करने से यह सुनिश्चित होता है कि राज्य धार्मिक मामलों में तटस्थ रहे, जिससे धर्म विधि के कार्यान्वयन में बाधा न बन सके और देश एकजुट रहे।
  • अंतर्राष्ट्रीय दायित्व: भारत ने 'नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा- 1966' और 'महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय (CEDAW)- 1979' की पुष्टि की है। इसलिए वह अपने राष्ट्रीय कानून के तहत लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है।
  • युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करना: युवा आबादी का एक बड़ा हिस्सा आधुनिकता, समानता और मानवता के सार्वभौमिक सिद्धांतों का समर्थन करता है, इस प्रकार UCC उनके सामाजिक दृष्टिकोण और राष्ट्र-निर्माण की आकांक्षाओं के अनुरूप है।

UCC के विरोध में तर्क

  • धार्मिक स्वायत्तता के लिए खतरा: UCC सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को कमजोर कर सकता है और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत गारंटीकृत धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकार का उल्लंघन कर सकता है।
  • वंचित वर्गों पर प्रभाव: उदाहरण के लिए, नागा अल्पसंख्यक समुदाय ने प्रस्तावित UCC पर असंतोष व्यक्त किया है; उनका मानना ​​है कि इसे लागू करने से नागा संस्कृति और गरिमा के लिए गंभीर संकट उत्पन्न होंगे।
  • सहकारी संघवाद के विरुद्ध: UCC राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर सकता है, जिससे सहकारी संघवाद के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
  • सामाजिक अशांति: विभिन्न समुदायों की आम सहमति के बिना इसे लागू करने से सामाजिक अशांति और विरोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
  • कार्यान्वयन संबंधी मुद्दे: इसका प्रभावी प्रवर्तन और कार्यान्वयन चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेष रूप से दूरदराज के या सांस्कृतिक रूप से रूढ़िवादी क्षेत्रों में। साथ ही, इससे कानूनी विवादों में भी वृद्धि हो सकती है।

भारत में UCC के क्रियान्वयन हेतु आगे की राह

  • जन जागरूकता की आवश्यकता: एक सुविचारित विमर्श के लिए, सरकार को सभी धार्मिक समुदायों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा करनी चाहिए।
  • क्षेत्रीय सुधार: विधि निर्माताओं को विधि के कुछ विशेष क्षेत्रों, जैसे-विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विशेष क्षेत्रों में विधि के एकीकरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
    • जैसे, दत्तक और अभिभावकत्व को धर्मनिरपेक्ष ढांचों के तहत लाना चाहिए, जैसे कि किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015।
  • अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण: क्रमिक सुधारों के माध्यम से धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष कानूनों के समन्वय का मॉडल अपनाया जा सकता है।
    • जैसे, इंडोनेशिया एक बहुलवादी विधिक व्यवस्था अपनाता है, जहां मुसलमानों के लिए धार्मिक कानून लागू होते हैं, जबकि अंतरधार्मिक मामलों के लिए एक धर्मनिरपेक्ष सिविल कोड लागू किया जाता है।

निष्कर्ष

समान नागरिक संहिता समानता, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की क्षमता रखती है, लेकिन इसे धीरे-धीरे और सभी समुदायों को साथ लेकर लागू करना आवश्यक है। भारत की विविध सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संतुलित दृष्टिकोण अपनाना ही न्याय और सामाजिक सौहार्द सुनिश्चित कर सकता है।

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3

धार्मिक स्वायत्तता

किसी धार्मिक समूह या समुदाय को अपने धार्मिक मामलों को स्वतंत्र रूप से प्रबंधित करने का अधिकार।

गोवा की नागरिक संहिता, 1867

गोवा में लागू एक समान नागरिक संहिता, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने UCC का एक 'व्यावहारिक मॉडल' बताया है।

अनुच्छेद 14

भारतीय संविधान का यह अनुच्छेद कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। यह किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष या भारत के क्षेत्र के भीतर कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करता है।

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