सुर्ख़ियों में क्यों?
हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत एक मसौदा अधिसूचना जारी की है। इसका उद्देश्य पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 में संशोधन कर राज्य स्तर पर पर्यावरणीय मंजूरी में होने वाले विलंब को कम करना है।
अन्य संबंधित तथ्य
- राज्य स्तरीय निकायों (जिनका कार्यकाल 3 वर्ष होता है) के पुनर्गठन में विलंब के कारण पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) की प्रक्रिया भी धीमी हो जाती है। इससे परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पाती हैं और निवेशकों का विश्वास प्रभावित होता है।
मसौदे के मुख्य बिंदु

- प्रत्येक राज्य के लिए 'पर्यावरण प्रभाव आकलन पर स्थायी प्राधिकरण (Standing Authority on Environment Impact Assessment: SAEIA): यदि राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) काम नहीं कर रहा हो या विलंब कर रहा हो, तो SAEIA अधिकतम 1 वर्ष तक उनकी जिम्मेदारियां संभालेगा।
- प्रत्येक राज्य में पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन पर स्थायी समिति (Standing Committee on Environment Impact Appraisal: SCEIA): यदि राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC) काम नहीं कर रही हो, तो SCEIA अधिकतम 1 वर्ष तक उसका कार्य करेगी।
- यदि SEAC 120 दिनों में किसी प्रस्ताव का मूल्यांकन पूरा नहीं कर पाता, तो वह प्रस्ताव स्वतः परिवेश पोर्टल के माध्यम से SCEIA को भेज दिया जाएगा।
- वर्तमान में, यदि SEIAA या SEAC उपलब्ध नहीं होते, तो केंद्रीय स्तर की विशेषज्ञ समिति (EAC) इन कार्यों को संभालती है।
पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) के बारे में
- पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 को पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत जारी किया गया। यह भारत में विकास परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) देने का मुख्य कानूनी ढांचा है।
- यह एक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से किसी प्रस्तावित परियोजना को स्वीकृति देने से पहले उसके पर्यावरण और समाज पर पड़ने वाले सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार के प्रभावों का आकलन किया जाता है।
- ₹50 करोड़ से अधिक लागत वाली परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है।
- स्वीकृति से छूट:
- रणनीतिक महत्व की राजमार्ग परियोजनाएं (अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 100 किलोमीटर के अंदर),
- बायोमास आधारित ताप विद्युत संयंत्र (पर्यावरण अनुकूल ईंधन मिश्रण का उपयोग करने वाले 15 मेगावाट तक के संयंत्र),
- सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं, तथा
- 25 मेगावाट से कम क्षमता की जलविद्युत परियोजनाएं, आदि।
- प्रक्रिया:
- श्रेणी 'A' परियोजनाएं: ऐसी परियोजनाओं को केंद्र सरकार से पूर्व पर्यावरणीय-स्वीकृति लेनी होती है। इन पर निर्णय 15 सदस्यीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) की सिफारिश पर आधारित होती है।
- श्रेणी 'B' परियोजनाएं : इनको राज्य स्तर पर SEIAA से स्वीकृति लेनी होती है, जो राज्य विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC) की सिफारिश पर आधारित होती है। इन्हें B1 और B2 में विभाजित किया गया है (B2 श्रेणी की परियोजनाओं को EIA नहीं लेनी होती हैं)।
- महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय :
- नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ: उच्चतम न्यायालय ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन में EIA की भूमिका को मान्यता दी।
- वेल्लोर सिटीजन वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ: उच्चतम न्यायालय ने EIA के निम्नलिखित दो प्रमुख सिद्धांतों को स्वीकार किया है -
- 'प्रदूषक भुगतान करे' (Polluter Pays) और
- 'सतर्कता का सिद्धांत' (Precautionary Principle)।
- सेंटर फॉर एनवायरनमेंट लॉ बनाम भारत संघ: न्यायालय ने EIA प्रक्रिया में सार्वजनिक परामर्श के माध्यम से हितधारकों की भागीदारी के महत्व पर बल दिया।
भारत में पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) प्रक्रिया की चुनौतियां

- लालफीताशाही: पर्यावरणीय स्वीकृति (EC) में औसतन 238 दिनों का विलंब होता है। इससे 'ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस' प्रभावित होता है।
- साथ ही, कई बार बिना पर्याप्त जांच के परियोजनाओं को स्वीकृति मिल जाती है। उदाहरण के तौर पर, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के अनुसार पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए दायर 90% से अधिक परियोजनाएं स्वीकृत हो जाती हैं।
- कागजी वादों और वास्तविक स्थिति में अंतर : उदाहरण के लिए-केरल की विझिंजम पोर्ट परियोजना पर पर्यावरणीय स्वीकृति मिलने के बाद भी तटीय कटाव और विस्थापन के आरोप लगे।
- रिपोर्टों की खराब गुणवत्ता: स्टरलाइट इंडस्ट्रीज (इंडिया) लिमिटेड बनाम भारत संघ मामले में रेखांकित किया गया कि कई EIA रिपोर्ट्स में विश्वसनीय डेटा का अभाव होता है और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की कमी रहती है। उदाहरण: सरदार सरोवर परियोजना मामला।
- प्रभावित होने वाले लोगों से परामर्श में कमियां: तकनीकी रिपोर्टों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद नहीं होता है और परियोजना से प्रभावित लोगों को पर्याप्त जानकारी नहीं मिलती। उदाहरण के लिए: दाभोल पावर प्लांट मामला।
- हितों का टकराव: EIA रिपोर्ट प्रायः परियोजना प्रस्तावकों द्वारा नियुक्त सलाहकारों से तैयार कराई जाती हैं, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठता है।

- पारिस्थितिकीय संधारणीयता की तुलना में आर्थिक विकास (EoDB) को प्राथमिकता देना, उदाहरण के लिए: EIA अधिसूचना 2020 का मसौदा।
- मसौदा EIA अधिसूचना 2020 में जन सुनवाई की अवधि 30 दिन से घटाकर 20 दिन कर दी गई है। तेल और गैस क्षेत्रकों की परियोजनाओं को B2 श्रेणी में शामिल किया गया। इससे पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघनों आदि की सार्वजनिक रिपोर्टिंग से छूट मिल गई।
- कुछ मामलों में पूर्वव्यापी प्रभाव से पर्यावरणीय स्वीकृति : कुछ मामलों में पहले प्रदूषण करने और बाद में स्वीकृति प्राप्त की व्यवस्था बन जाती है, जिससे पर्यावरण को अपूरणीय नुकसान हो सकता है। (यह सतर्कता के सिद्धांत को कमजोर करता है)।
- सीमा पार प्रभाव का आकलन: EIA फ्रेमवर्क में इस मुद्दे को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए, भारत ने सीमा-पार से संबंधित EIA अभिसमय' (एस्पू कन्वेंशन 1991) का अनुसमर्थन नहीं किया है।
- अन्य चुनौतियां: कुछ मामलों में पर्यावरणीय स्वीकृति लेने से छूट देने से नियमों का कमजोर होना, वैज्ञानिक तरीके से जांच के बजाय केवल प्रक्रिया पूरी करने पर बल देना, राजनीतिक हस्तक्षेप, पर्यावरणीय स्वीकृति के बाद परियोजना की सख्त निगरानी नहीं करना, आदि।
आगे की राह
- विशेषज्ञ संस्थाओं को मजबूत करना: SEIAA/SEAC का समय पर पुनर्गठन किया जाए। विशेषज्ञ वैज्ञानिकों की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी हो ताकि केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भरता कम हो।
- सर्वोत्तम प्रणालियों से सीखना: जैसे यूनाइटेड किंगडम में एक स्वायत्त संस्था पर्यावरणीय स्वीकृति के बाद भी परियोजनाओं की निगरानी करती है और EIA को भूमि उपयोग योजना से जोड़ा जाता है।
- समावेशी जनभागीदारी: जनसुनवाई या सार्वजनिक परामर्श के लिए अधिक समय दिया जाए, रिपोर्टों को क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए और स्थानीय लोगों की चिंताओं को वास्तव में निर्णयों में शामिल किया जाए।
- अलग EIA कानून बनाना: एक स्वतंत्र कानून बनाया जाए, जिससे नियमों में बार-बार बदलाव कम हो और स्थिरता बनी रहे। उदाहरण: चीन का 2002 का पर्यावरण प्रभाव आकलन कानून।
- रणनीतिक प्रभाव आकलन को शामिल करना: EIA जहां पर्यावरण (जैसे जैव विविधता, वायु, जल) पर ध्यान देता है, वहीं रणनीतिक प्रभाव आकलन पद्धति मानव जीवन (रोजगार, संस्कृति, स्वास्थ्य) पर प्रभावों का भी आकलन करती है। इससे समग्र प्रभाव का आकलन हो पाता है।
- अन्य सुधार:
- रिमोट सेंसिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों का उपयोग करना,
- क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण अपनाना (एक क्षेत्र में कई परियोजनाओं के संयुक्त प्रभाव का आकलन) तथा
- स्वतंत्र तृतीय पक्ष द्वारा जांच और सत्यापन कराना।
निष्कर्ष
हालांकि MoEFCC की हाल की मसौदा अधिसूचना EIA प्रक्रिया की तात्कालिक समस्याओं का समाधान करने का प्रयास करती है, लेकिन वास्तविक सुधार के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण आवश्यक है। सांविधानिक दायित्व और वैश्विक प्रतिबद्धता, दोनों के रूप में, पर्यावरण प्रभाव आकलन का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास से जुड़े निर्णय सोच-समझकर लिए जाएं, ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे।