सुर्ख़ियों में क्यों?
भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS)- नेविगेशन विद इंडियन कांस्टेलेशन (NavIC) को एक बड़ा आघात लगा है, क्योंकि IRNSS-1F पर लगी परमाणु घड़ी ने कार्य करना बंद किया है।
अन्य संबंधित तथ्य
- अब NavIC कांस्टेलेशन में केवल तीन उपग्रह—IRNSS-1B, IRNSS-1I और NVS-01—ही पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग (PNT) सेवाएं प्रदान करने में सक्षम रह गए हैं।
- NavIC प्रणाली के लिए निर्धारित 11 भारतीय उपग्रहों में से कुल 6 उपग्रह परमाणु घड़ियों के कारण विफल हो गए हैं।
- किसी भी नेविगेशन सैटेलाइट प्रणाली के सही ढंग से काम करने के लिए कम-से-कम 4 उपग्रहों में कार्यशील परमाणु घड़ी का होना आवश्यक होता है।
IRNSS –नेविगेशन विद इंडियन कांस्टेलेशन (NavIC) के बारे में
- यह भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा विकसित की जा रही एक स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली है।
- कवरेज: भारत के साथ-साथ इसकी सीमा से 1500 किलोमीटर तक के विस्तृत क्षेत्रों में उपयोगकर्ताओं को सटीक स्थिति की जानकारी प्रदान करना।
- मुख्य सेवाएं:
- मानक स्थिति सेवा (Standard Position Service: SPS) - सभी नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध है और L5 तथा S बैंड का उपयोग करती है।
- यह अपने सेवा क्षेत्र में 20 मीटर से बेहतर स्थिति सटीकता और 40 नैनो सेकंड से बेहतर समय सटीकता प्रदान करता है।
- निषिद्ध सेवा (RS): अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एक एन्क्रिप्टेड सेवा, जो L5 बैंड का उपयोग करती है।
- मानक स्थिति सेवा (Standard Position Service: SPS) - सभी नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध है और L5 तथा S बैंड का उपयोग करती है।
- उपग्रह समूह:
- प्रथम पीढ़ी (First Generation): इसमें कुल 7 उपग्रह शामिल थे - 3 उपग्रह भू-स्थैतिक कक्षा (GEO) में, 4 उपग्रह भू-तुल्यकालिक कक्षा में। इसके साथ ही, ग्राउंड स्टेशनों का एक नेटवर्क भी था, जो 24×7 संचालन करता था।

- IRNSS-1A भारत का पहला समर्पित नेविगेशन उपग्रह था, जिसे 2013 में प्रक्षेपित किया गया था।
- IRNSS-1F को 2016 में PSLV-C32 द्वारा उप-भू-तुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में प्रक्षेपित किया गया था।
- यह छठा नेविगेशन उपग्रह था और इसमें स्विट्जरलैंड में निर्मित रूबिडियम परमाणु घड़ी लगाई गई थी।
- IRNSS-1F को 2016 में PSLV-C32 द्वारा उप-भू-तुल्यकालिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में प्रक्षेपित किया गया था।
- द्वितीय पीढ़ी: इसमें NVS श्रृंखला के उपग्रह शामिल हैं, जिनमें सेवाओं के विस्तार के लिए अतिरिक्त रूप से L1 बैंड सिग्नल को शामिल किया गया है।
- NavIC के तहत दूसरी पीढ़ी के पांच उपग्रह—NVS-01, NVS-02, NVS-03, NVS-04 और NVS-05 की परिकल्पना की गई है, ताकि बेस लेयर कॉन्स्टेलेशन को मजबूत किया जा सके और बेहतर गुणवत्ता के साथ सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित की जा सके।
- NVS-01 को 2023 में GSLV-F12 के माध्यम से प्रक्षेपित किया गया था और इसमें पहली बार स्वदेशी परमाणु घड़ी लगाई गई थी।
- NVS-02 को 2025 में GSLV-F15 के माध्यम से प्रक्षेपित किया गया था, लेकिन यह अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच सका। इसे L1, L5 और S-बैंड के अनुरूप बनाया गया था, जिनमें नेविगेशन पेलोड होता है। NVS-01 की तरह इसमें C-बैंड में रेंजिंग पेलोड भी शामिल था।
- NavIC के तहत दूसरी पीढ़ी के पांच उपग्रह—NVS-01, NVS-02, NVS-03, NVS-04 और NVS-05 की परिकल्पना की गई है, ताकि बेस लेयर कॉन्स्टेलेशन को मजबूत किया जा सके और बेहतर गुणवत्ता के साथ सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित की जा सके।
कार्यशील IRNSS-NaVIC का महत्व
- रणनीतिक स्वायत्तता पर प्रभाव: यदि NavIC प्रभावी रूप से कार्य नहीं करता, तो भारत को फिर से अमेरिकी GPS पर पूर्ण निर्भर होना पड़ सकता है, जिससे संघर्ष के समय सेवाओं के बाधित या रोके जाने का जोखिम रहता है।
- उदाहरण: 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने GPS डेटा तक पहुँच देने से इनकार कर दिया था।

- राष्ट्रीय सुरक्षा: IRNSS सशस्त्र बलों के लिए एन्क्रिप्टेड निषिद्ध सेवा (RS) प्रदान करता है। यह मिसाइल-मार्गदर्शन, निगरानी और सैनिकों की वास्तविक समय में आवाजाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- अवसंरचना समर्थन: उदाहरण के लिए, लगभग 8700 रेलगाड़ियां NavIC सहित अन्य GNSS प्रणालियों से सुसज्जित हैं। इसके अलावा, GAGAN के साथ एकीकरण के माध्यम से विमानन क्षेत्र में भी इसका उपयोग किया जा रहा है।
- वैश्विक अंतर्संचालनीयता/इंटरऑपरेबिलिटी : SPS सिग्नल अन्य वैश्विक नेविगेशन सैटेलाइट प्रणालियों के साथ इंटरऑपरेबल हैं, जैसे कि GPS (USA), ग्लोनास/Glonass (रूस), गैलीलियो/Galileo (यूरोप) और बेईदोउ/BeiDou (चीन)।
- अन्य उपयोग: NavIC के तहत- आपदा प्रबंधन, परिवहन (स्थलीय, वायु और समुद्री), स्थान-आधारित सेवाएं और व्यक्तिगत गतिशीलता, सर्वेक्षण और भू-आकृति विज्ञान (Geodesy), वैज्ञानिक अनुसंधान समय प्रसारण और समन्वयन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सहायता प्रदान की जाती है।
NaVIC से संबंधित चुनौतियां
- कम प्रक्षेपण दर: इसरो की सीमित प्रक्षेपण क्षमता और बजटीय दबावों के कारण नेविगेशन सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन का नवीनीकरण समय पर नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप, यह प्रणाली जितनी तेजी से क्षतिग्रस्त हो रही है, उतनी तेजी से पुनः स्थापित नहीं की जा रही है।
- संगठनात्मक दबाव: राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून के अभाव में इसरो को NavIC के डिज़ाइनर और ऑपरेटर दोनों की भूमिका निभानी पड़ती है, जिससे उसके संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
- प्रबंधन निकाय का अभाव: भारत में GPS निदेशालय और यूरोपीय संघ की अंतरिक्ष कार्यक्रम एजेंसी (EUSPA) के समकक्ष किसी निकाय का अभाव है; ये दोनों निकाय क्रमशः जीपीएस और गैलिलियो उपग्रह समूहों का प्रबंधन करते हैं।
- असंगतता: सभी स्मार्टफ़ोन और नेविगेशनल गैजेट (या नेविगेटर) NavIC के साथ संगत नहीं होते हैं।
निष्कर्ष
अंतरिक्ष विभाग विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में NavIC के उपयोग का विस्तार कर रहा है, जैसे- रियल-टाइम ट्रेन ट्रैकिंग, मछली पकड़ने वाले जहाजों में संचार, यात्री सुरक्षा हेतु वाहन ट्रैकिंग, भारतीय मानक समय (IST) का प्रसारण आदि। यह सुरक्षित नेविगेशन के लिए NavIC को पूर्ण रूप से संचालित करने पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है; इसके लिए यह बेस कॉन्स्टेलेशन को पूर्ण कर रहा है, उपयोगकर्ताओं की जरूरतों के आधार पर सेवाओं को बेहतर बना रहा है और तकनीकी आत्मनिर्भरता को सुदृढ़ करने के लिए स्पेस-ग्रेड परमाणु घड़ियों जैसी स्वदेशी तकनीकों को इसमें शामिल कर रहा है।